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हिंदी साहित्य के गैंगस्टर और गैंगरीन

जून की 4 तारीख आ रही है और मेरे प्राण सूली पर अटके हैं। मुझे अपने से अधिक मित्र लेखकों की चिंता खाए जा रही है। एक से एक प्रतिभाशाली हैं। जितने प्रतिभाशाली हैं, उससे भी अधिक सौभाग्यशाली हैं। पर्याप्त..

हिंदी साहित्य के गैंगस्टर और गैंगरीन
Monika Minalसुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकारSat, 18 May 2024 09:49 PM
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जून की 4 तारीख आ रही है और मेरे प्राण सूली पर अटके हैं। मुझे अपने से अधिक मित्र लेखकों की चिंता खाए जा रही है। एक से एक प्रतिभाशाली हैं। जितने प्रतिभाशाली हैं, उससे भी अधिक सौभाग्यशाली हैं। पर्याप्त चर्चित हैं। अतिशय परिचित हैं। सबसे अधिक रिसर्चित हैं। कई नामी बुद्धिजीवी माने जाते हैं। कई प्रबुद्धजीवी और कई कुबुद्धिजीवी भी माने जाते हैं।
कई हिंदी के ‘टॉप’ के कवि-कथाकार हैं, देश-विदेश में उनके नाम हैं, पत्र-पत्रिकाओं में चर्चित हैं, सोशल मीडिया में छाए रहते हैं। कई के हजारों, तो कई के लाखों फॉलोअर्स हैं। कई सर्वमान्य, तो कई महामान्य हैं। कई कवियों के कवि हैं, कई गुरुओं के भी गुरु, उस्तादों के भी उस्ताद हैं। कई लेखक बनाने की गलतफहमी में जीते हैं, तो कई लेखिका बनाते हुए मार खाते हैं। 
कइयों का साहित्य में हुकुमनामा चलता है। कई साहित्य के मार्गदर्शक-मंडल हैं। कई साहित्य के मंडल और कमंडल हैं और कई साहित्य के डंठल हैं। कई साहित्य के निर्माता-निर्देशक हैं। कई कइयों के ‘फादर-फिलॉसफर- गाइड’ हैं। कई कइयों को समर्पित हैं। सब एक-दूसरे पर कविता-कहानी लिख-लिखकर एक-दूसरे को अमर कर चुके हैं, फिर एक-दूसरे को कई बार मार भी चुके हैं। कई साहित्य के ‘गैंगस्टर’ हैं और कई ‘गैंगरीन।’ 
कई अकादेमी से ज्ञानपीठ की ओर अपना मुखारविंद किए दिखते हैं, तो कई  साहित्य के ‘ट्रस्टी’ बन उसकी अंत्येष्टि करते-कराते रहते हैं। कई साहित्य के न्यासी हैं, तो कई फांसी। कई एकदम शरणागत वत्सल हैं। जो भी उनकी शरण में आ जाता है, वह साहित्य का परम पद पा जाता है। वह साहित्य में छा जाता है और कई बार वही साहित्य को खा जाता है। ये सभी लीलापुरुष हैं और सभी ‘छीलापुरुष’ हैं। सबसे बड़ी बात, सभी मेरे अभिन्न हैं। इनमें से कई मेरे एकदम अपने हैं और कई तो ‘मेरे हमदम मेरे दोस्त’ हैं, इसीलिए मुझे चिंता है। 
कइयों के कविता संकलनों, कहानी संकलनों और उपन्यासों को मैंने पढ़ा है, सराहा है। कोई-कोई मेरी सराहना से कराहा भी है। कई के ‘रिव्यू’ किए हैं, तो कइयों को ‘रफू’ भी किया है और कइयों को साहित्य से रफा-दफा भी किया है।
सभी हिंदी के पुराने पापी हैं। मैं उनसे भी सवाया पापी हूं, इसीलिए चिंतित हूं कि 4 जून को अगर इनकी पसंद की कविता न हुई, तब इनका क्या होगा? मैं अपने इन्हीं फेसबुक योद्धाओं के लिए चिंतित हूं और इसीलिए मेरा ‘गब्बर’ मन बार-बार पूछता रहता है कि 4 जून को तेरा क्या होगा कविता रूपी कालिया?
क्या तब यह मानना पडे़गा कि इतनी झूठी कविता-कहानी कभी नहीं हुई, जितनी पिछले दिनों सोशल मीडिया में हुई? इतने नकली साहित्यकार कभी न हुए, जितने पिछले दस वर्ष में हुए? उन्होंने जो कहा, वह तो न हुआ, उसका उल्टा जरूर हुआ। ऐसा एक बार हुआ, दूसरी बार हुआ, अब कहीं तीसरी बार भी न हो जाए! तब तो मानना पडे़गा कि पिछले दस साल की कविताएं, कहानियां आदि सत्य की जगह एक झूठ को रचती रहीं, कहती रहीं, सहती रहीं।
सच! अगर ऐसा हुआ, तो साहित्य से लोगों का भरोसा उठ जाएगा। साहित्य का आईना ही टूट जाएगा। हम टूटा आईना लिए बैठे होंगे। यह आईना टूटा क्यों? शायद इसलिए कि साहित्य साहित्य न रहा, वह सत्य का अन्वेषी न रहा और  ‘पावर पॉलिटिक्स’ का पिछलग्गू हो गया। राजनीतिक घृणा साहित्यिक घृणा बन गई। यह नफरत साहित्य को खा गई।
मैंने कितना समझाया कि साथी! तू साहित्य को साहित्य ही रहने दे, उसे राजनीति न बना। राजनीति की ‘घृणा’ को कविता में न ला और ‘हेट’ की कविता तो हरगिज न कर, क्योंकि हेट से क्रोध पैदा होता है, क्रोध से बुद्धिनाश होता है और बुद्धिनाश से प्राणनाश होता है। यही बात भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कही है, लेकिन मैं क्या करूं, अनसुनी की यारों ने और खेत रहे!