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हिंदी साहित्य में गैंग्स ऑफ फांसेपुर

मेले की सबसे खुफिया खबर अपने एक मित्रवत खुफिया एजेंट ने दी। फोन पर कहा- ‘सर जी, आप तो यहां थे नहीं... इस बार के मेले की सबसे बड़ी खबर साहित्य में ‘गैंग्स’ के अवतार की है।’ मैंने कहा, क्या बकवास करते...

हिंदी साहित्य में गैंग्स ऑफ फांसेपुर
Pankaj Tomarसुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकारSat, 24 Feb 2024 10:44 PM
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मेले की सबसे खुफिया खबर अपने एक मित्रवत खुफिया एजेंट ने दी। फोन पर कहा- ‘सर जी, आप तो यहां थे नहीं... इस बार के मेले की सबसे बड़ी खबर साहित्य में ‘गैंग्स’ के अवतार की है।’ मैंने कहा, क्या बकवास करते हो? मेले का नाम बदनाम न करो, साहित्यकारों को साहित्यकार ही रहने दो, कोई नाम न दो। इतने दिनों बाद तो मेला लगता है, लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, यही तो मित्र-संस्कृति है!’ 
खुफिया मित्र बोले- ‘वह जमाना गया। अब तो सब कुछ ‘गैंग्स और फांसेपुर’ तय करता है कि कौन क्या लिखेगा? कौन कहां से छपेगा या नहीं छपेगा, किसका रिव्यू कौन करेगा और उसमें क्या लिखा होगा? नहीं तो धांय...धांय’!  
मैंने उनसे कहा, ‘मगर साहित्य तो मन की मौज है, मुक्तात्मा का छंद है, किसी कीमत पर वह अपनी आजादी गिरवी नहीं रख सकता, इसलिए हिंदी साहित्य में ऐसे गैंग्स का क्या काम? साहित्य तो सबके हित की सोचता है, वह किसी का अहित नहीं करता।
मित्र कहना तो चाहता था कि ‘आप मूर्ख हैं’, लेकिन कहा कि ‘आप बहुत भोले हैं।’ जब समाज में गैंग्स हो सकते हैं, तो साहित्य में क्यों नहीं हो सकते? साहित्य आखिर समाज का दर्पण ही तो है। मैंने उन्हें समझाया- ‘साहित्यकार और क्रिमिनल में कुछ फर्क तो करो! कहां बेचारा साहित्य और कहां गैंग्स ऑफ फांसेपुर के क्रिमिनल्स!’
मित्र का जवाब आया, ‘सर जी! एक गैंग्स ऑफ फांसेपुर हो, तो बताऊं, आजकल तो दर्जनों गैंग्स हैं- फनपुरिया गैंग, लिखनवी गैंग, एलाबादी गैंग, छटना गैंग, भोजनपुरिया  गैंग, सूरमा भोपाली गैंग, फौजियाबादी गैंग, दिल्लवी गैंग और काठीवाड़ी गैंग भी है। इन दिनों तो एक नया पुतलीबाई गैंग भी उभर रहा है। ऐसे दर्जनों गैंग हैं, जो साहित्य में एक्टिव हैं, छाए हुए हैं।’ 
मैंने पूछा कि जब इतने सारे गैंग्स हैं, तो इनके बहुत से ‘भाई’ भी होंगे। मित्र ने छूटते कहा- ‘मरवाओगे क्या? नाम लिया और गए काम से। किसी का नाम न लें सर!’
कुछ ही देर बाद, एक गैंग के भाई ने सीधे मेरे मोबाइल पर कहा, ‘अपन के भाई ने एक लंबी कविता लिखेली है, उसका ‘लुक्कार्पण’ होना है। आपको बोलना है। कार्ड पर आपका नाम जा रहा है। कल टाइम से मेले में पहुंच जाना।’ मैंने कहा- ‘भाई जी, मैं तो देश के बाहर हूं, कैसे आ सकता हूं?’ 
जवाब आया, ‘भाई ने कह दिया कि आना है, तो आना है, नहीं तो जहां हो, वहीं खलास कर दिए जाओगे।’  
मैं गिड़गिड़ाया, ‘सर आप ही सोचें, कैसे आ सकता हूं दस घंटे का रस्ता है?’ उधर से आवाज कड़क थी, ‘तू लटक के आ,भटक के आ, मटक के आ या चटक के आ... जैसे भी आ, मगर आ। नामवर उस्ताद ने भाई को तेरा ही नाम दिया था। भाई उनको बहुत मानते थे। इसलिए तेरे कू आना ही है... सदियों बाद अपना कोई भाई कविता के क्षेत्र में आएला है। इस बरस के सारे नोबेल, बुकर, ग्रामी, सब अपने भाई टीपू टपकेला की कविता के नाम होंगे।’ 
लेकिन... 
‘लेकिन-वेकिन कुछ नहीं। साहित्य की आंखों के मिटे हुए सुरमे! मेले में टाइम से पहुंच जाना बस!’ भाई जी के पास बैठी छप्पन छुरी बोली- ‘अबे नखरे न मार! भाई जी पर्सनली चाहते हैं कि तू आए और उनकी कविता की तारीफ में कुछ बोले। उसके बाद राज्यसभा की सीट, सारे रतन-फतन तेरे!’ 
मैं समझ गया कि साहित्य ‘गैंग्स ऑफ फांसेपुर’ में बदल चुका है। उसकी शराफत का मुलम्मा उतर चुका है। साहित्य में रहना है,  तो अपना भी गैंग बनाना होगा। कविता, गैंग्स का गीत होगी, आलोचना गोली की ठांय-ठांय होगी और साहित्य का मतलब धांय-धांय, धुआं-धुआं होगा। आज के साहित्य का गैंग्स ऑफ झांसेपुर ऐसा ही है! 

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