फोटो गैलरी

Hindi News ओपिनियन तिरछी नज़रहिंदी की लड़ाई कहां लड़ेंगे घुसपैठिए

हिंदी की लड़ाई कहां लड़ेंगे घुसपैठिए

हिंदी कुछ नहीं कहती, वह पिटती रहती है, कुटती रहती है, दिन-रात बेइज्जत होती रहती है, फिर भी किसी से कुछ नहीं कहती। कभी कोई धौल-चपत कर जाता है, कभी कोई बेइज्जत कर जाता है, कभी कोई पत्थर मार जाता है...

हिंदी की लड़ाई कहां लड़ेंगे घुसपैठिए
Pankaj Tomarसुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकारSun, 10 Dec 2023 12:38 AM
ऐप पर पढ़ें

हिंदी कुछ नहीं कहती, वह पिटती रहती है, कुटती रहती है, दिन-रात बेइज्जत होती रहती है, फिर भी किसी से कुछ नहीं कहती। कभी कोई धौल-चपत कर जाता है, कभी कोई बेइज्जत कर जाता है, कभी कोई पत्थर मार जाता है, तो कभी कोई उस पर कीचड़ उछाल देता है,कभी कोई गाली देने लगता है, तो कभी उसकी हंसी उड़ाने लगता है कि हिंदी भी कोई भाषा है? वह तो बोली है, बोलियों की बोली है।
अब तक हिंदी को ‘उत्तर की भाषा’, ‘गोबर-पट्टी की भाषा’ कहा जाता था, अब उसे ‘गोमूत्र राज्यों’ की भाषा कहा जाने लगा है। दक्षिणी ज्ञानियों की देखा-देखी कुछ उत्तर वाले भी हिंदी को कोसने वालों को सराहने लगते हैं। वे भी मानने लगते हैं कि अक्ल सिर्फ दक्षिण में रहती है, यानी उत्तर वाले निरे कमअक्ल होते हैं। और एक महाबुद्धि ने तो हिंदी क्षेत्र के डीएनए को हीन बताकर, अपने दक्षिणी डीएनए को श्रेष्ठ बता दिया। ऐसे महाज्ञानियों ने इस बार भाषा के मामले को नस्लवादी बना दिया। हिंदी की नस्ल नकली, बाकी की असली। गजब का हिटलरवादी तर्क!  

हिंदी फिर भी उन्हें कुछ नहीं कहती। उसका स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि वह सब सह लेती है। इतिहास देखें। पहले उर्दू वाले उसे ठोकते रहे। हिंदी व हिन्दुस्तानी का साहित्य का इतिहास लिखने वाले ‘गार्सां द तासी’ भी हिंदी को ठोकते रहे और फिर अंग्रेजी वाले ठोकते रहे। फिर भी हिंदी बनती रही, बढ़ती रही। आज दुनिया भर में हिंदी का बोलबाला है। अकेले भारत में हिंदी भाषा-भाषियों की आबादी पचास-साठ करोड़ से अधिक होगी। 
हिंदी भारत के बडे़ मार्केट की सबसे बड़ी भाषा है। वह खरबों के उपभोक्ता बाजार चलाती है, अरबों के मनोरंजन उद्योग चलाती है और भारत की राजनीति को भी वही चलाती है! फिर भी जब चाहे, जो चाहे, उसे दो लात लगाकर चला जाता है। तब भी वह किसी से कुछ नहीं कहती और न कोई हिंदी वाला ही किसी से शिकायत करता है कि उसे क्यों गरियाया जा रहा है?
इसके बरक्स जरा किसी अन्य भाषी से उसकी भाषा के बारे में कोई उल्टा-सीधा कहकर तो देखे, तुरत करारा जवाब मिलेगा। उस भाषा का हर लेखक-बुद्धिजीवी डंडे लेकर अपनी भाषा के पीछे खड़ा हो जाएगा और हमलावर को ऐसी खरी-खोटी सुनाएगा कि वह उसकी भाषा पर हमले करना हमेशा के लिए भूल जाए। एक बार गिरीश कर्नाड ने टैगोर के नाटकों को कमतर कह दिया, तो सारा बंगाल उनके पीछे पड़ गया था, लेकिन हिंदी को कोई भी कूट ले, एक हिंदी लेखक नहीं बोलता! क्यों? इसलिए कि हिंदी में कोई असली हिंदी लेखक है ही नहीं, ज्यादातर हिंदी के घुसपैठिए हैं। अगर हिंदी के असली लेखक होते, यानी अपनी मातृभाषा को प्यार करने वाले होते, तो हिंदी को लतियाने वालों को एक जवाबी लात तो लगाते।  

अगर इनमें से एक भी हिंदी के प्रति प्रतिबद्ध होता, तो इन ‘हिंदी हेटर्स’ को यूं ही नहीं जाने देता। ये हिंदी की खाते हैं, लेकिन अंग्रेजी की गाते हैं और जब हिंदी को कोई कूटे, तो चुप लगा जाते हैं। कई हिंदी वाले तो हिंदी को ही कोसने लगते हैं। एक हिंदी कवि ने तो कहा ही था कि उसे हिंदी का कवि होने का अफसोस है। कुछ ऐसे भी हिंदी वाले हैं, जो अंग्रेजी से हिंदी में एहसान करते हुए आते हैं। वे ‘हिंदी को सभ्य बनाने’ के लिए आते हैं, और कुछ ऐसे भी हैं, जो यह कहते हैं कि हिंदी तो पिटती ही रहती है, इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जो नया हो। अगर इतने पर भी कोई हिंदी वाला न बोले, तो काहे का हिंदी लेखक!
अपनी मातृभाषा हिंदी को प्यार करने वाला मेरा मन कर रहा है कि ऐसे हर ‘हिंदी हेटर’ से आज कहूं, बहुत हुआ श्रीमान्, अब ‘शट अप’! मेरा मन कह रहा है कि ऐसी हर तू का जवाब तू से दूं और गालिब के शेर को कुछ बदलकर कहूं- ‘हम भी मुंह मजबान रखते हैं, काश पूछो कि मुद्दआ क्या है?’

 

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें