DA Image
31 अक्तूबर, 2020|11:59|IST

अगली स्टोरी

साहित्य का नया मल्टीप्लेक्स

एक मित्र से हाल-चाल पूछा, तो बोले, बढ़िया है। आजकल खूब लिख रहा हूं। रोज एक कविता हो जाती है। कभी दो, तो कभी तीन कविताएं भी हो जाती हैं। मैंने कहा, मुबारक हो! आपका तो एक और संकलन तैयार हो गया? वह हुलसकर बोले, एक क्या, पूरे पांच संकलन तैयार हैं। सोचता हूं, एक और तैयार करके ‘छह’ कर दूं। कोरोना के छह महीने के ‘छह संकलन’ और लोकार्पित कर रिकॉर्ड बना दूं।
इसे कहते हैं, आ बैल मुझे मार। अब झेलो बेटे, छह-छह संकलन! एक संकलन में न्यूनतम सौ कविताएं, तो छह में छह सौ तो होंगी ही। पढ़ते रहो बेटा और गाते रहो कविश्री के कसीदे! अगर कसीदे न गाए, तो पाओ कविश्री के ‘शाप’! लेकिन आदत से लाचार मैं रिस्क के बावजूद रोज किसी न किसी मित्र साहित्यकार से पूछता हूं कि क्या हाल-चाल हैं और फिर, अफसोस करता हूं कि अब झेलो बेटा, हजारों-लाखों कविता-कहानी संकलनों की मार!
यूं ‘लॉकडाउन’ अभी पूरी तरह नहीं खुला है, और जहां खुला है, वहां भी ‘कंडिशंस एप्लाइड’ हैं, लेकिन जब सब कुछ अनलॉक हो जाएगा, तब मालूम पड़ेगा कि कोरोना ने हिंदी साहित्य का एक ‘स्वर्णयुग’ रच दिया है! यह सच है कि कोरोना ने सब को डराया, हर काम बंद कराया, लेकिन साहित्य में लॉकडाउन न करा पाया। बल्कि, कोरोना काल में साहित्य और अधिक ‘अनलॉक’ हो गया। इन छह-सात महीनों में तो सरस्वती ऐसी बरसी है कि जल-थल-नभ, सब साहित्य से आप्लावित हो गए हैं। इसे कहते हैं, संकट से साहित्य छुड़ावे! 
आजकल कोई दिन में एक कविता लिखता है, तो कोई दो लिखता है और कोई सुबह-दोपहर-शाम के हिसाब से तीन-तीन कविताएं लिखता है। कोई सप्ताह में एक कहानी लिखता है, तो कोई सप्ताह में दो लिखता है, तो कोई तीन-तीन लिखकर ढेर लगा देता है। सोशल मीडिया में डालकर समीक्षा कराके, लाइक करवाकर और मौका लगते ही ‘वेबीनार’ करवाकर 15 सेकंड की अमरता का आनंद लेता है।
साहित्य पर इतनी कृपा तो ‘आपातकाल’ तक ने नहीं की। कुछ जेल-डायरियां आ गईं, कुछ सताने की कथाएं आ गईं, कुछ पत्रकारों की किताबें आ गईं, एंटी-आपात कवियों ने तानाशाही और फासिज्म के खिलाफ लिखा, लेकिन उन 19 महीनों में भवानी भाई की रोज की तीन कविताओं को छोड़ कुल मिलाकर एक-दो दर्जन काव्य संकलन और इतने ही कथा संकलन आ पाए। लेकिन कोरोना के डर ने और उससे निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन ने और बाद की क्रमिक ‘अनलॉकिंग’ ने सभी नागरिकों को इस कदर संवेदनशील बना डाला कि छह महीने में ही कविता, कहानी व समीक्षा इंडस्ट्री में ऐसा ‘सुपर बूम’ आया कि साहित्य का एक नया ‘मल्टीप्लेक्स’ ही खुल गया! और अब, हालात ये हैं कि आपने इधर किसी से ‘हेलो’ किया, तो जवाब देने वाले ने आपको अपने संकलनों से हिलाया! इसीलिए कोरोना काल को मैं रचनात्मक साहित्य का सर्वाधिक ‘उर्वर युग’ मानता हूं। यही साहित्य का ‘न्यू नॉर्मल’ है।
अब साहित्य के तीन ही युग होंगे- एक, पूर्व-कोरोनाकालीन साहित्य, दूसरा, कोरोनाकालीन साहित्य और तीसरा, उत्तर-कोरोनाकालीन साहित्य! और जिस दिन टीका आ जाएगा, सब नॉर्मल हो जाएगा, तो उस दिन लाखों पुस्तकें लोकार्पण का इंतजार कर रही होंगी।
मैं इसलिए और भी डरा हुआ हूं, क्योंकि साहित्य को छोड़ भी दूं, तब भी यह कोरोना-साहित्य मुझे नहीं छोड़ने वाला।

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:hindustan tirchhi nazar column 1 november 2020