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मंगलाचरण मतलब पॉजिटिव थिंकिंग

कब से सोच रहा हूं कि आलोचक का धंधा छोड़कर कवि हो जाऊं। आलोचना में अब कुछ नहीं धरा। अच्छा हो कवि बन जाऊं। कविता करूं और दाद पाऊं। खूब नाम कमाऊं। यों भी स्वभाव से आशु-लेखक हूं। रात बिरात सोते जागते, जब कहें तब, जितना कहें उतना, जैसा कहें वैसा, जिस पर कहें उस पर लिख सकता हूं। फिर उसकी समीक्षा भी लिख सकता हूं। उसे चढ़ा सकता हूं, गिरा सकता हूं। जैसा पैसा वैसा तमाशा। समीक्षक और कवि, दोनों एक साथ होने का यही फायदा है।
अब तक माना जाता था कि असफल कवि आलोचक होता है, जबकि सच यह है कि ‘सफल आलोचक ही एक सफल कवि भी होता है’। इस तर्क से मैं ‘टू इन वन’ हूं।

यों अपने मुंह मियां मिट्ठू क्यों बनना? लेकिन बात आ गई है, तो बता रहा हूं कि ‘आशु आलोचक तो हूं ही, ‘आशु कवि’ भी हूं। बरसों का अभ्यास है। आप शब्द दें, मैं कविता कर दूंगा-छंद, बेछंद, ‘तुकांत’, ‘अतुकांत’ जब और जैसा चाहें लिखवाएं। आजमा के देख लें। इधर आपने कहा और उधर कविता हुई। एकदम गूगल छाप आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस वाली। कल को जब रोबोट कविता करने लगेंगे, तो आप चकित होंगे और उनसे कविता कराएंगे। इसीलिए अलग से बताना पड़ रहा है कि जब मेरे जैसा असली कवि मौजूद है, तो रोबोट की क्या जरूरत! आज के कवि छंद क्या जानें, जबकि अपुन ‘पिंगल शास्त्र’ के पंडित हैं। दोहा, चौपाई, सवैया तो बाएं हाथ का खेल समझिए। मुक्तक से लेकर महाकाव्य तक, वह भी आपकी दी गई ‘टाइम लिमिट’ में लिख सकता हूं।

यह तो रही ‘प्रोफेशनल कवि’ की बात। इन दिनों मैं कुछ ‘आउट ऑफ द बॉक्स’ कविता भी करना चाहता हूं। क्लासिक किस्म का महाकाव्य लिखना चाहता हूं। महाकवि होने के लिए ‘महाकाव्य’ लिखना जरूरी है। ज्ञानीजन जानते हैं कि महाकाव्यों में सबसे पहले ‘इष्ट देव’ या ‘शाहेवक्त’ की स्तुति की जाती है। इससे कवि को अपने ‘इष्ट’ का सपोर्ट मिलता रहता है। आज के कवि इस महामार्ग से भटक कर जिस-तिस की वंदना करते रहते हैं। इसीलिए रोते रहते हैं, मैं रोदूं कवि नहीं होना चाहता, इसलिए इन दिनों अपने ‘इष्टदेव’ को खोज रहा हूं, ताकि उसकी स्तुति में एक सुंदर ‘मंगलाचरण’ लिख सकूं।

‘मंगलाचरण’ का मतलब है ‘पॉजिटिव थिंकिंग’ की शुरुआत। उदाहरण के लिए, सूरदास ने एक छोटा-सा ‘मंगलाचरण’ छंद इस तरह लिखा है, ‘चरन कमल बंदौ हरि राई।/ जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, आंधर को सब कछु दरसाई॥/ बहिरो सुनै, मूक पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई।/ सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तेहि पाई॥ —-’ 

सूरदास की इस ‘पॉजिटिव थिंकिंग’ से जैसे ही मैंने सुर मिलाया, मेरी भी ‘पॉजिटिव थिंकिंग’ हो गई और अपने ‘टॉप’ के ‘इष्ट’ की खोज में निकल पड़ा और अंत में अचानक मुझे अपने ‘इष्ट’ के रूप में ‘ट्रंप’ नजर आए। ट्रंप के इष्ट देव के रूप में आते ही चारों तरफ मंगल होने लगे। मेरे ‘लेपटॉप’ से मंगलाचरण फूट निकला, ‘एक दिन अचानक ग्रीनलैंड खरीदने की पवित्र कामना रखने वाले और इस कामना के ठुकरा दिए जाने के बाद तनिक भी क्रोध न करने वाले, कश्मीर पर थर्ड पार्टी बनने की चाहना रखने वाले और क्षण में कोरिया के किम को धमकाने व अगले ही क्षण उनसे गले मिलने वाले, अपने ट्विटर टिप्पणियों से अखिल विश्व का दिनरात मनोरंजन करने वाले ‘ट्रंप देव’ हम सबका आगे भी मनोरंजन करते रहें-’।

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  • Web Title:Hindustan Sunday Tirchi Nazar Column August 25th