हिंदी साहित्य के आंके-बांके
एक ने हिंदी के कई साहित्यकारों को सांप्रदायिक कह दिया, तो हंगामा हो गया। आजू-बाजू खड़े हिंदी के सोशल साहित्यिक ‘सूरमा’ अपने-अपने हरबे-हथियार लेकर कूद पड़े…

सुधीश पचौरी,हिंदी साहित्यकार
एक ने हिंदी के कई साहित्यकारों को सांप्रदायिक कह दिया, तो हंगामा हो गया। आजू-बाजू खड़े हिंदी के सोशल साहित्यिक ‘सूरमा’ अपने-अपने हरबे-हथियार लेकर कूद पड़े।
जल्दी ही थर्ड पार्टी मैदान में, फिर तो चौथी, पांचवीं, छठी, सातवीं से लेकर पचासवीं पार्टी तक आ जुटीं। सोशल मीडिया के विवादजीवी मंचों में हिंदी के अधिकांश लेखक या तो पहली पार्टी हैं या दूसरी, तीसरी से लेकर सौवीं पार्टी तक हैं। जितनी पार्टी, उतने विचार, उतनी आलोचना, उतनी प्रत्यालोचना, सहमतियां-असहमतियां। देखते-देखते हिंदी जगत दो- तीन-चालीस-पचास फाड़ हो जाता है। किसी की कोई लाइन, कोई कमेंट, विचार, कटाक्ष हिंदी साहित्य के एक मुखर हिस्से को एक-दो दिन के लिए बिजी कर देता है।
चर्चा में आने के लिए कोई किसी दिन किसी को छेड़ देता है और तुरंत अखाड़े खुल जाते हैं। फिर सारी बहस ‘तू-तू मैं-मैं’ और कपड़ा फाड़ लड़ाई में बदल जाती है। मुद्दा जहां का तहां पड़ा रह जाता है। सोशल मीडिया का यह जनतंत्र, ‘फ्री फॉर ऑल’ और ‘नो होल्ड बार’, यानी हर दांव ओके वाला। एकदम खुला-खिला जनतंत्र है, जहां छोटा-बड़ा कोई नहीं। यहां अस्सी साला सीनियर तक बीस बरस के युवा लेखकों से ‘स्ट्रीट फाइट’ करते दिखते हैं। कोई तीखी-टिप्पणी, तीखी प्रतिक्रिया, चुभता विचार या चुभती समीक्षा हिंदी को उठाने, लड़ाने और दो-तीन फाड़ करने के लिए काफी है।
इन दिनों हिंदी के अधिकांश लेखक इस कदर नाजुक मिजाज हैं कि यदि किसी ने एक लेखक की रचना या विचार से जरा भी असहमति जताई या जरा भी दोष-दर्शन किया, तो उसकी खैर नहीं। तुरंत जवाबी गोला आएगा, जो आपकी सात पुश्तों को ‘ईरान या लेबनान’ बना देगा। एक विचार-युद्ध शुरू हो जाएगा। हिंदी का नया गाली कोश खुल जाएगा, जिसमें भोजपुरी, अवधी, ब्रजी व टपोरी के गाली कोश भी मिक्स हो जाएंगे। पर्सनल पॉलिटिकल हो जाएगा, पॉलिटिकल पर्सनल हो जाएगा। जेंडर, जाति, धर्म, सब आमने-सामने ताल ठोकते दिखेंगे।
किसी को किसी का चेहरा पसंद नहीं, तो किसी को किसी की बॉडी लैंग्वेज पसंद नहीं, किसी को किसी के लुक्स पसंद नहीं, तो किसी को किसी की नजर पसंद नहीं, किसी को किसी का लिखा पसंद नहीं, तो किसी को किसी के लिखे पर लिखा पसंद नहीं, किसी को किसी का व्यवहार, तो किसी को किसी का घर पसंद नहीं।
किसी को किसी की नौकरी पसंद नहीं, तो किसी को किसी का कुत्ता पसंद नहीं। किसी को किसी का खास मंच पर जाना पसंद नहीं, तो किसी को किसी के साथ मंच शेयर करना पसंद नहीं। किसी ने किसी का बॉयकॉट किया, तो ‘बॉयकॉटित’ ने ‘बॉयकॉटिए’ को जली-कटी सुना दी। इस पर बॉयकॉटिए या उसके किसी लठैत का जवाब कि तेरी कौन सी रचना है, जो तेरी है? तू तो नंबर वन का ‘चोट्टा’ है।
इस नैतिक युद्ध में बहुत से थर्ड पार्टी बनकर अपनी-अपनी चिलम सुलगाने लगते हैं। पहला- कल तक तो ये दोनों ‘हम प्याला हम निवाला’ थे, आज क्या हो गया? दूसरा- कल तक दोनों एक-दूसरे की जय-जय में लगे रहते थे, जहां देखो, वहीं शंकर-जयकिशन सी जुगलबंदी करते नजर आते थे, अब क्या हो गया? क्या कोई आइटम बीच में आ गया या आ गई? तीसरा- पढ़े तो साथ-साथ, दिल्ली आए तो साथ-साथ, चार-चार बार कंपटीशन दिए, तो साथ-साथ और फेल हुए तो साथ-साथ, लिखना शुरू किए तो साथ-साथ, पहली किताब आई तो साथ-साथ, रिव्यू कराए तो साथ-साथ और अब एक-दूसरे की पोल खोल रहे हैं, तो सच ही होगा।
हे पाठक, आप इसे ‘सीरियसली’ न लें। यह हिंदी की ‘नूरा-कुश्ती’ है, जो हर रोज होती है। यहां सभी ‘आंके-बांके’ हैं, जो एक दिन लड़ते हैं, दूसरे दिन गले मिलते हैं और फिर कुछ दिन बाद लड़ने लगते हैं।
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