हाय! क्वालिटी का कबाड़ा हो गया

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किसी को तीन पुस्तकों पर तीन सम्मान मिल चुके हैं। किसी को चार पुस्तकों पर चार। किसी-किसी को तो एक ही किताब पर दो-दो पुरस्कार मिल चुके हैं और किसी को एक ही रचना पर तीन सम्मान। इन दिनों जितने लेखक हैं, उनसे ज्यादा सम्मान हैं…

हाय! क्वालिटी का कबाड़ा हो गया

सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार

किसी को तीन पुस्तकों पर तीन सम्मान मिल चुके हैं। किसी को चार पुस्तकों पर चार। किसी-किसी को तो एक ही किताब पर दो-दो पुरस्कार मिल चुके हैं और किसी को एक ही रचना पर तीन सम्मान। इन दिनों जितने लेखक हैं, उनसे ज्यादा सम्मान हैं।

हिंदी में जितनी प्रतिभा इन दिनों बरस रही है, उतनी पिछले सौ साल में न बरसी थी। मैं इन नए लेखकों की प्रतिभा पर मुग्ध हूं। जब ‘ओपिनिंग’ में ही इतने छक्के-चौके लगाए हैं, तो आगे कितने न लगाएंगे? सच! नए लेखकों की उपलब्धियां पुराने रचनाकारों को लजाने वाली हैं। पहले लेखक जिंदगी भर घिसते रहते, कोई पूछने वाला न होता। जब सम्मान न थे, तब रचना थी। जब तक कम थे, तब तक भी रचना की ‘क्वालिटी’ थी। लेखक क्वालिटी पर ध्यान देते थे, पर जैसे ही सम्मान बढ़े, क्वालिटी का कबाड़ा हो गया।

इतिहास देख लें। आदिकाल, मध्यकाल में कितने सम्मान थे? एक न था, लेकिन क्वालिटी कविता थी, जो आज तक है। रीतिकाल में कवि के आश्रयदाता (फाइनेंसर) रहे, पर क्वालिटी कविता भी रही। बाद में एकाध सम्मान हुआ, तब भी क्वालिटी रही। जब से सम्मानों की बाढ़ आई है, लेखक का सारा दम रचना की जगह सम्मान लपकने में लगने लगा। अब रचना बाद में आती है, सम्मान पहले आता है।

कई लेखक तो एलान करके चलते हैं कि आज यह सम्मान लिया है, कल उसे लूंगा और अगले बरस उसको भी लेकर रहूंगा। जो नहीं ले पाते, वे फौरन सोशल मीडिया में वर्ग-संघर्ष और जाति-संघर्ष की आलोचना की दुनाली लेकर साहित्य के चंबल में कूद जाते हैं।

आज हिंदी समाज जग रहा है। उसके पास इतना पैसा आ रहा है कि उसकी साहित्येषणा जगने लगी है। कहीं कोई अपनी साहित्यानुरागी नानीश्री के नाम से पांच-दस हजार का साहित्य सम्मान घोषित करता है और लेखक दौड़ लगाने लगते हैं, तो कहीं कोई लेखक बनते-बनते रह गए अपने दादाश्री या पिताश्री के नाम से सम्मान घोषित कर देता है और उसका अल्पज्ञात शहर ‘साहित्यिक नक्शे’ पर छा जाता है।

अब सिर्फ दिल्ली, इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ, पटना, भोपाल ही साहित्यिक अड्डे नहीं रहे, ‘बी’ और ‘सी’ श्रेणी के शहर भी साहित्यिक व सभ्य होने लगे हैं। सोशल मीडिया पर मुफस्सिल लेखकों की जमातें खड़ी हो रही हैं, जो साहित्य के नक्शे बदल रही हैं, इसीलिए हर छोटे-बड़े शहर में ‘लिट फेस्ट’ होने लगे हैं।

लिट फेस्ट साहित्य को ‘ग्लैमराइज’ करता है। उसमें शामिल लेखक, लेखक न रहकर साहित्य का सेलिब्रिटी बन जाता है। उसका प्रभामंडल बन जाता है। कई लेखक गर्व से बताते हैं कि अभी उस लिट फेस्ट में गया, अब इसमें जा रहा हूं, तीन दिन बाद उसमें जाने वाला हूं। हिंदी क्षेत्र में छोटे-बड़े कोई सौ-सवा सौ लिट फेस्ट तो हो ही जाते हैं और उतने ही सम्मान भी हैं।

वे जमाने गए, जब किसी अखबार में अपने साहित्य समारोह की एक लाइन छपवाने के लिए आप तरसा करते थे। अब सब आपके हाथ हैं। आज लेखक भी बदल गया है। वह अब लेखक मात्र नहीं, बल्कि अपना प्रकाशक, प्रचारक, वितरक, समीक्षक व अपने गले में अपनी माला डाल सम्मान कराने वाला ‘ऑल इन वन’ है।

हिंदी में अलंकार युग की वापसी हो रही है। कभी अलंकार काव्य की आत्मा था, आजकल अलंकार (सम्मान) लेखक की आत्मा है। आज इकन्नी-दुअन्नी वाले सम्मानों पर हर युवा की नजर रहती है। अगर इस बरस उसने दिल्ली वाला लिया है, तो अगले साल भोपाल वाला व उससे अगले बरस बनारस वाला ले लेगा। इस तरह एक दिन ‘अकादेमी’ तक पहुंच जाएगा।

सम्मानों की इतनी भरमार है कि लेखक एक-दूसरे को ‘तीन वाला, पांच वाला, सात वाला’ के नाम से जानते हैं। इसी क्रम में एक ग्यारह वाला भी है। ऐसा ही रहा, तो एक दिन कोई यशस्वी सम्मानों की ‘हाफ सेंचुरी’ भी मारेगा।

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