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जटिल रिश्तों का अगला कदम

जोरावर दौलत सिंह, फैलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च

भारत-चीन संबंध हमेशा से बहुत जटिल रहे हैं। समाज विज्ञान में प्रचलित मुहावरे ‘प्रतिस्पद्र्धा-सहयोग-विवाद’ के लिहाज से देखें, तो हम इसके अंतर्विरोधों या विरोधाभासी प्रवृत्ति को समझ सकते हैं। 2017 ने यह सब होते हुए देखा- बेल्ट ऐंड रोड पहल (बीआरआई) पर भारत का सख्त ऐतराज, शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में भारत का प्रवेश, उत्तरी सीमा पर डोका ला का नाटकीय संकट, ब्रिक्स में बहुपक्षीय सहयोग का बढ़ता माहौल और आर्थिक भागीदारी को बढ़ावा देना। दोनों देशों के रिश्तों का सबसे अच्छा उदाहरण हिमालय में खड़ा हुआ तनाव है, तीन दशक में पहली बार दोनों देश इस तरह आमने-सामने आए।

भारत-चीन संबंधों में आए इस पेच का आखिर राज क्या है? इसके सूत्र किसी घाटी या ऊपरी हिमालय की सकरी सड़कों में नहीं मिलेंगे, बल्कि इसके सूत्र बड़े ही व्यवस्थित तरीके से निर्मित उन नकारात्मक छवियों में छिपे हैं, जिनका निर्माण दोनों पक्षों ने कभी परस्पर विदेश नीतियों, तो कभी भू-राजनीतिक भरोसे के संकट के तौर पर किया। भारत जहां उप-महाद्वीप में चीन द्वारा आर्थिक और राजनीतिक कद बढ़ाने के प्रयास को उसके अतिक्रमण और पड़ोसी द्वारा अपनी प्रभुसत्ता पर सवाल के रूप में देख रहा था, वहीं चीन अपने प्रमुख रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों अमेरिका और जापान के साथ भारत की बढ़ती और गहरी सैन्य भागीदारी को अपनी सुरक्षा के भविष्य के लिए चुनौती मान रहा था। इस बात से आश्वस्त होते हुए कि अब एक मुखर नीति ही इस दिशा में कारगर होगी, दिल्ली और बीजिंग, दोनों ने ही बीते दो वर्षों में परस्पर संतुलन बनाने की दिशा में काम शुरू किया और कई बार इसके लिए दबाव की रणनीति भी अपनाई है। भारत का अमेरिका की ओर, तो चीन का पाकिस्तान की ओर कुछ इस तरह झुकाव देखने में आया, जैसा कि शीतयुद्ध के दौरान भी नहीं देखने को मिला था।  

इन सबके बावजूद दोनों पक्षों को न तो कोई रियायत मिली, न ही द्विपक्षीय बातचीत की शर्तों में कोई सुधार आया। मसलन, एनएसजी सदस्यता, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, जलविद्युत सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण मसले थे, जहां चीन से कोई पुख्ता आश्वासन  मिलना चाहिए था, लेकिन नहीं मिला। बीआरआई पर भारत के बहिष्कार के साथ ही चीन ने उसे न सिर्फ अपनी एक महत्वाकांक्षी अंतरराष्ट्रीय पहल के विरोधी के तौर पर देखा, बल्कि एशिया में अपने लिए सबसे अविश्वसनीय और असहयोगी पड़ोसी भी मानने लगा। बीजिंग ने यह भी माना कि दक्षिण एशिया और हिंद महासागर में अपनी चीन विरोधी रणनीति में भारत अब खुलकर बाहरी ताकतों को शामिल करने लगा है। भारत के तिब्बत कार्ड ने इसमें और इजाफा किया। इस बेबुनियाद स्पद्र्धा और भारतीय व चीनी हितों के बढ़ते टकराव के बीच डोका ला ने एक ऐसे बिंदु पर ला खड़ा किया, जहां नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग, दोनों को ही महसूस हुआ कि इन नीतियों से कुछ हासिल होने वाला नहीं और इसमें कुछ बदलाव की जरूरत है।  

अच्छी बात है कि दोनों ही नेतृत्व एक-दूसरे की कोशिशों को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की मंशा रखते हैं। भारत-चीन मतभेद दूर कर उन्हें राजनीतिक परिपक्वता और रिश्तों के समग्र ढांचे में बहाल करने का दौर शुरू हुआ है। सुषमा स्वराज और वांग यी की हालिया बैठक से निकले संदेश एक निर्देश की तरह थे। अब तक ‘आधा गिलास खाली’ की कहानी आगे बढ़कर ‘आधा गिलास भरा है’ तक पहुंच गई है। भारतीय विदेश मंत्री का बयान कि- ‘हमारी समानताएं, हमारे मतभेदों पर भारी हैं’ या चीनी विदेश मंत्री का बयान- ‘हमारे आम हित हमारे मतभेदों से कहीं दूर हैं’ बहुत कुछ कहते हैं। सच है कि हम पहले भी ऐसे वक्तव्य सुनते आए हैं, लेकिन यह भी सच है कि इस वक्त संदर्भ नए हैं, क्योंकि दोनों ही नेतृत्व संबंधों की जटिलता के इस दौर में स्थिरता वापस लाने की उम्मीद कर रहे हैं।

चीन के साथ रिश्तों को पुनर्जीवन देने के सरकार के फैसले ने उस सामरिक समुदाय को नए तरह से सोचने का मौका दे दिया है, जो इसके नए-नए अर्थ निकालने को बेचैन है। दिल्ली वास्तव में एक ऐसी नीति को ठोक-बजा रही थी, जिसका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला। सबसे पहले तो सरकार के अंदर बैठे यथार्थवादी लोग भी यह समझने लगे हैं कि चीन के साथ प्रतिकूल संबंधों से कुछ नहीं हासिल होने वाला और यह सुरक्षा संबंधी दुश्वारियां बढ़ाने वाला होगा, जिसे न तो भारत खुद हल कर सकने की स्थिति में है, न ही वे बाहरी शक्तियां इसमें सहायक हो पाएंगी, जो उप-महाद्वीप में चीन के बढ़ते प्रभुत्व पर लगाम लगाने को उत्साहित दिखाई देती रही हैं। दूसरा, भारत-चीन तनाव पाकिस्तान को मजबूत होने का अवसर देता है, जबकि सच यह है कि चीन खुद भी संतुलित क्षेत्रीय भूमिका में दिखते हुए दिल्ली के साथ एक रचनात्मक समीकरण बनाना ही पसंद करेगा। तीसरे, भारत-चीन विवादास्पद संबंध अमेरिका और जापान के साथ भारत की सौदेबाजी क्षमता को भी प्रभावित करता है। दिल्ली ने यह भी महसूस किया होगा कि बीजिंग के साथ उनके मतभेदों के बावजूद वाशिंगटन और टोक्यो, दोनों ही वास्तव में चीन के साथ अपनी परस्पर निर्भरता को महत्व देते हैं। कोरियाई परमाणु मुद्दा और उत्तर पूर्व एशियाई भू-राजनीति बदलने के प्रयासों पर चीन-अमेरिका सहयोग सिर्फ एक उदाहरण है। जापान भी चीन के साथ अपने 300 बिलियन डॉलर के व्यापारिक संबंधों के साथ सुनिश्चित कर देना चाहता है कि वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है। उसने बीआरआई में भी सशर्त सहयोग की पेशकश कर रखी है। 

भारत सरकार भी स्वीकार कर रही है कि चीन के साथ आर्थिक सहयोग का वादा भू-राजनीतिक स्थिरता के माहौल में ही सकारात्मक नतीजे दिला सकता है। स्वाभाविक है कि द्विपक्षीय संबंधों में अनिश्चितता नए आर्थिक खिलाड़ियों को मैदान में कूदने का अवसर देगी। मोदी ने चीन के साथ एक भव्य ‘विकासपरक साझेदारी’ की जैसी कल्पना की थी, अब उसे फिर से व्यावहारिक रूप देने की कोशिश शुरू हुई है। सौभाग्य से अब दोनों राजधानियों के बीच साझा भरोसे का माहौल बना है कि शत्रुता के भाव से दोनों के हितों को ठेस पहुंची है। लेकिन अभी बहुत कुछ होना बाकी है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:zorawar singh article in Hindustan on 25 april