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अपनी ही पहल के नतीजे से सहमे ट्रंप

जोरावर दौलत सिंह, फैलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च

अमेरिका और उत्तर कोरिया की नजदीकियां थम गई हैं। कम से कम अभी के लिए तो ऐसा ही लग रहा है। यदि कुछ महीने पहले प्योंगयांग से सीधी बातचीत का अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का (बिना पूर्व-तैयारी के) फैसला एक आश्चर्य के रूप में देखा गया था, तो बीते गुरुवार को वार्ता रद्द करने का एलान कोई सिर खपाने वाली घटना भी नहीं थी। आखिरकार ट्रंप की विदेश नीति उनके कार्यकाल की शुरुआत से ही उनके दंभ और सुरक्षा प्रतिष्ठान की युद्धकारी सोच के बीच ढुलमुल तरीके से घूमती रही है। लगभग हर मौकों पर हमने ट्रंप को अपनी सरकार के नैसर्गिक वैश्विक नजरिये और प्रभावी राजनीतिक अभिजात्य वर्ग के आगे झुकते देखा है।

अगर हम इस तर्क को मानते हैं कि ट्रंप राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र को लेकर दबाव में हैं, जिस पर अब भी व्यापक तौर पर परंपरावादियों का दबदबा है, तो सवाल यह है कि नीतियां बनाने वाले गुट का गणित आखिर है क्या? देखा जाए, तो परंपरावादी बदलाव से डरते हैं। एकध्रुवीय ताकत होने के नाते अमेरिका सभी भू-राजनीतिक व भू-आर्थिक मामलों में दबदबा रखा करता था। मगर हालिया वर्षों के बदलाव से उसकी यह क्षमता डिगने लगी है, जो उसके लिए किसी मनोवैज्ञानिक सदमे से कम नहीं है। एक उभरती हुई बहुध्रुवीय दुनिया में अमेरिका की फीकी पड़ती ताकत असल में उसके लिए विश्व में खुद को रणनीतिक रूप से पुनर्मूल्यांकन का मौका होना चाहिए था। लेकिन असलियत में वहां के प्रतिष्ठान ने वैश्विक सत्ता-संतुलन के किसी भी सार्थक व्यवस्था को नकार दिया, जबकि 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के समय एक लोकप्रियतावादी विरोध-प्रदर्शन भी हुआ था, जिसने ट्रंप की व्हाइट हाउस की राह प्रशस्त की थी।

रही बात उत्तर कोरिया की, तो उसके लिए देश की सुरक्षा और शासन का अस्तित्व कितना महत्वपूर्ण है, यह कोई छिपा तथ्य नहीं है। दूसरे तमाम मामलों की तरह वहां परमाणु हथियारों को सुरक्षा का एकमात्र विश्वसनीय माध्यम माना गया है। साल 2006 के बाद से, जब प्योंगयांग ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था, परमाणुकरण की प्रक्रिया निरंतर बढ़ती रही। साथ-साथ विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता के रूप में बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण भी किया जाता रहा। पर जुलाई, 2017 में किए गए आईसीबीएम परीक्षण के बाद अमेरिका की नींद खुली। उत्तर कोरिया के लोग महसूस करने लगे थे कि सिर्फ सीधा व प्रत्यक्ष खतरा ही अमेरिका को बातचीत के लिए बाध्य कर सकता है। और यह सोच काम करती दिखी। निश्चय ही, बीजिंग और रूस ने उत्तर कोरिया को प्रेरित किया था, क्योंकि ये दोनों देश उत्तर कोरिया के पड़ोसी हैं और कोरियाई प्रायद्वीप की स्थिरता व पहले शीत युद्ध का अधूरा अध्याय बंद होना दोनों के हित में है। दक्षिण कोरिया की घरेलू राजनीति ने भी इसे आगे बढ़ाने में भरपूर मदद की। कुल मिलाकर, समझौते की प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक सार्थक क्षेत्रीय माहौल बना हुआ था। 

अमेरिका-उत्तर कोरिया के समझौते की रूपरेखा भी काफी व्यावहारिक थी। आर्थिक प्रतिबंध हटने व अमेरिका के साथ संबंध सामान्य होने के बदले प्योंगयांग अंतर-महाद्वीपीय परमाणु हथियारों की अपनी दौड़ बंद कर देता। नतीजतन, उत्तर कोरिया को पाकिस्तान की तरह एक क्षेत्रीय परमाणु ताकत के रूप में सीमित रखने में अमेरिका सफल होता। इससे उत्तर-पूर्व एशियाई क्षेत्र स्थिर होता और दो महत्वपूर्ण सहयोगियों दक्षिण कोरिया और जापान की सुरक्षा मजबूत होती। चीन-अमेरिका संबंध को मजबूती मिलती है। इससे उत्तर कोरिया और वहां के शासन को भी मान्यता मिलती, अस्तित्व का आश्वासन मिलता और खुद को आर्थिक रूप से बदलने का उसे मौका मिलता। क्या ये नतीजे ऐसे थे, जो अमेरिकी हित के प्रतिकूल होते? ऐसा जरूरी नहीं है। 

यह सही है कि असंगत सौदेबाजी की मुद्राएं दोनों तरफ देखी गई थीं। जैसे, पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर अमेरिका का कड़ा रुख और बुनियादी व्यवस्था बनाए रखने की उत्तर कोरिया की मंशा। इस मंशा के तहत अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुछ (अपरिभाषित) परमाणु हथियार रखने का उत्तर कोरिया अधिकार चाहता था। मगर समस्या इससे कहीं अधिक गहरी है। असल में, अमरिका के राजनीतिक और सुरक्षा प्रतिष्ठान पर काबिज परंपरावादी यथास्थिति को बदलने से डरते हैं, ताकि नए क्षेत्रीय समीकरण न बन जाएं। जैसे, संभव है कि चीन व रूस प्रायद्वीप की इस स्थिरता व शांति का लाभ उठाकर अपनी महत्वाकांक्षी भू-आर्थिक योजनाओं को गति देते। इसी तरह, तनाव व संघर्ष के साये से दूर होने के बाद दोनों कोरिया के नागरिकों के पास कई अच्छे विकल्प होते। संक्षेप में कहें, तो सचमुच इसकी संभावना थी कि अमेरिका उत्तर-पूर्व एशिया पर अपना दबदबा खो देता।

बहरहाल, दोनों तरफ से आए बयानों से यही पता चलता है कि बातचीत का दरवाजा स्थाई रूप से बंद नहीं हुआ है। ट्रंप ने किम जोंग-उन के लिए सम्मान बनाए रखा है और कहा है कि कैसे दोनों नेताओं के बीच ‘एक अद्भुत बातचीत आकार ले रही थी’। वह भविष्य में किम से मिलने को लेकर ‘बहुत ज्यादा’ उत्सुक भी हैं। उन्होंने यहां तक कहा है कि ‘रद्द हुई वार्ता भविष्य में फिर हो सकती है’। उत्तर कोरिया का 25 मई का बयान भी समान रूप से उत्साह पैदा करने वाला है। प्योंगयांग ने नई दिशा खोजने वाले एक ‘बोल्ड’ ट्रंप और उनके कट्टरपंथी सलाहकारों के बीच का स्पष्ट अंतर बताया है। व्हाइट हाउस के बयान की तरह ही प्योंगयांग ने यह कहते हुए अपनी विज्ञप्ति समाप्त की कि वह ‘किसी भी वक्त’ किसी भी रूप में ‘अमेरिका के साथ बैठने का इरादा’ रखता है। जाहिर है, इसने ट्रंप को प्रेरित किया कि वह प्योगयांग के बयान को ‘गर्मजोशी भरा और सकारात्मक’ बताएं। यह ‘टिकाऊ शांति और समृद्धि बनाने’ में ‘मुख्य भूमिका’ निभा सकता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:zorawar daulet singh article in Hindustan on 28 may