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हमारी विदेश नीति की पाकिस्तान दुविधा

Zorawar Daulat Singh

बीते एक दशक के निर्बाध लोकतंत्र ने भारतीय मानस में उम्मीद जगाई कि पाकिस्तान बदल रहा है और वहां के नागरिक-सैन्य संबंधों को इतिहास के आईने में देखना शायद गलत हो। इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ के नेतृत्व में सत्ता का ताजा और शांतिपूर्ण हस्तांतरण भी कुछ लोगों को ऐसा ही लग रहा है, जैसे सेना के प्रभुत्व से निकलकर कोई राजनेता आम जनता के बीच से चुनाव जीतकर आगे आया है। वे इसे राजनीति को सेना की छाया से उबरने का एक और प्रमाण मान रहे हैं। और चूंकि राजनेताओं के पास भारत से टकराने का कोई स्पष्ट आधार नहीं है, इसलिए पाकिस्तान का यह लोकतंत्रीकरण उप महाद्वीप की भू-राजनीति को बदलने वाला साबित होगा। अब ऐसे मूल्यांकन के लिए क्या कोई आधार है?

हमें नागरिक-सैन्य मॉडल पर बात करते हुए थोड़ी सतर्कता या कहें कि कुछ जटिलता का परिचय देना चाहिए, जो कई बार भारतीय सोच को कमतर करती है। यह नहीं भूलना चाहिए कि यह मुहम्मद अली जिन्ना ही थे, जो 1947 में कश्मीर पर हमला करने वाले पहले नागरिक नेता थे। दूसरे, पाकिस्तान में लोकतंत्र की तलाश हमेशा से एक खासा जटिल मसला रहा है। जुल्फिकार अली भुट्टो के दौर के पाकिस्तान को हम सैन्य संरचना पर एक असल नागरिक पड़ाव मान सकते हैं। लेकिन तब हालात कुछ और थे। 1971 के युद्ध में करारी शिकस्त के बाद पाकिस्तानी सेना अपनी साख पूरी तरह खो चुकी थी। फिर भी, ऐसे तमाम अनुकूल हालात के बावजूद पाकिस्तान के भीतर फिर से जमीन व्यवस्थित करने की भारतीय कोशिशों को सफलता नहीं मिली। भट्टो अपनी कमजोरी का इस्तेमाल कर सद्भावना और एक नए पाकिस्तान की उम्मीद कायम करने में तो सफल रहे ही, दिल्ली की युद्ध-उपरांत मुद्रा को नरम करने में भी सफल थे।

पाकिस्तानी सेना ने अतीत के सबक के साथ 1980 के दशक में बहुत सधे और सोचे-समझे तरीके से पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के साथ संतुलन साधने के लिए राजनेताओं का एक नया नेटवर्क खड़ा कर दिया। जैसा कि क्रिस्टोफ जैफ्रेलॉट लिखता है,‘पंजाब में जियाउल हक की छत्रछाया में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत से 1990 के चुनाव अभियान तक नवाज शरीफ ने जो कुछ राजनीतिक सफलता हासिल की, उसके पार्श्व में सैन्य समर्थन ही था।’ लेकिन अगर वह सुरक्षा प्रतिष्ठान के सबसे प्रमुख और चर्चित चहेते थे, तो भी सैन्य संरक्षण का सुख हासिल करने वाले कम से कम ऐसे अकेले शख्स तो नहीं ही थे।’ इसी प्रकार, इमरान खान को भी पाकिस्तान के ‘डीप स्टेट’ कहे जाने वाले उस तंत्र का एक और रणनीतिक निवेश (मोहरा)  के रूप में ही देखा जाना चाहिए, जो पूर्ववर्ती दो राजनीतिक दलों पीएमएल-एन और पीपीपी के एकाधिकार को तोड़कर यहां तक आने में सफल हुआ है। यदि मजबूत असैन्य राजनीतिक अभिजात का कोई प्रतिनिधि पाकिस्तानी सेनाओं को वापस बैरकों में भेजने में सफल रहे, तो भारतीय नीति-निर्माता इसका न सिर्फ स्वागत करेंगे बल्कि प्रोत्साहित भी करेंगे, लेकिन यह सब दो मौलिक मान्यताओं पर निर्भर करेगा। 

सबसे पहले, तो उस नागरिक अभिजात को वास्तव में पाकिस्तान को एक सकारात्मक राष्ट्रवाद की दिशा में फिर से परिभाषित करने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा। पर्यवेक्षक जानते हैं कि पाकिस्तानी राष्ट्रवाद में एक भारत विरोधी पहचान आम समस्या है, जो खुद को धर्मनिरपेक्ष भारत के विपरीत खड़ा देखती है। अतीत में बोए गए नकारात्मकता के इन बीजों को सैन्य प्रतिष्ठान ने भरपूर खाद-पानी देकर अपने व्यापक राजनीतिक-आर्थिक हितों का ईंधन बना लिया। लेकिन लोकतंत्र के इस पिछले दशक में भी राजनेताओं में पाकिस्तान को लेकर न तो प्रगतिशील सोच दिखी, न ही ऐसा इरादा, जो पाकिस्तान की मूल अवधारणा पर सवाल उठाता दिखता। पाकिस्तान के लिए वैकल्पिक पहचान की परिकल्पना की बजाय उनकी रुचि मुख्य रूप से स्वहित और अस्तित्व बचाए रखने में ही ज्यादा रही।

दूसरी बात, यह माना जाता है कि सेना ‘सिविल-मिलिट्री सिस्टम’ का खेल नहीं खेल सकती, या राष्ट्रीय हित के अपने अधिकार या प्रतिद्वंद्वी अवधारणाओं की किसी भी चुनौती को सफलतापूर्वक बेअसर नहीं कर सकती है। न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और मीडिया के साथ पाकिस्तानी सेना का सफल गठजोड़इसका प्रमाण है कि यह वास्तव में पाकिस्तान के समग्र राजनीतिक क्षितिज पर एक भूमिका तो निभाना चाहती है, लेकिन परदे के पीछे रहकर। वह एक ऐसे अनजान मध्यस्थ की भूमिका चाहती है कि काम भी चलता रहे और साख भी न बिगड़े। अक्तूबर 2017 के गैलप सर्वेक्षण में पाया गया कि वहां 82 प्रतिशत लोग किसी राजनीतिक संस्थान की तुलना में सेना पर ज्यादा भरोसा करते हैं, भले ही एक बड़ी संख्या (62 प्रतिशत) ऐसे लोगों की थी, जिन्होंने राजनीतिक व्यवस्था के तौर पर लोकतंत्र में ही आस्था दिखाई थी। हालांकि ऐसी अनुकूल रेटिंग मार्शल लॉ के साथ ही बहुत तेजी से गायब हो जाती है, जैसा परवेज मुशर्रफ के शासन काल में सेना को पहली बार महसूस हुआ था।

पाकिस्तान के अतीत में ऐसे सबूत नहीं मिलते, जब किसी राजनेता ने अपने हितों की कीमत पर सेना से टकराव मोल लिया हो। वहां का राजनीतिक अभिजात सेना के साथ तालमेल बनाकर चलने में ज्यादा सहज महसूस करता रहा है। पाकिस्तानी विद्वान आयशा सिद्दीका की थीसिस के अनुसार, सैन्य-नागरिक संबंध- यानी जहां राजनेता शायद ही कभी सेना की प्राथमिकताओं या प्रगति की भूमिका पर सवाल उठाते हों, बल्कि दोनों समूह मिलकर अर्थव्यस्था की सामूहिक लूटपाट करते हैं, और जो अतीत की अपेक्षा कहीं अधिक व्यावहारिक बना रहता है। 

पाकिस्तान के हालिया चुनावों ने एक और परिष्कृत प्रणाली का संकेत दिया है, जिसे ‘हाइब्रिड’ राज्य कहा जा सकता है। यानी जहां मार्शल लॉ की खामियों से परिचित सैन्य शासन ने एक वैकल्पिक ढांचा तैयार कर आगे बढ़ाया है, जिसमें सेना और समाज के बीच एक बफर बना दिया गया है। जहां असली चेहरे तो पीछे रहते हैं और लोगों की प्रतिक्रियाओं और जायज शिकायतों की जिम्मेदारी राजनेताओं पर आयद होती है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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  • Web Title:zorawar daulet singh article in hindustan on 10 august