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ओपिनियनवियना हमले का हमारे लिए सबक

अभिजीत अय्यर मित्र, सीनियर रिसर्च फेलो, आईपीसीएसPublished By: Madan Tiwari
Tue, 03 Nov 2020 10:15 PM
वियना हमले का हमारे लिए सबक

ऑस्ट्रिया में सोमवार की देर शाम हुआ आतंकी हमला चौंकाता है। दहशतगर्दों ने राजधानी वियना के उस हिस्से में गोलियां बरसाईं, जहां सरकारी इमारतें और तमाम सांस्कृतिक केंद्र हैं। यह धनाढ्यों का इलाका माना जाता है या फिर काम के सिलसिले में वे यहां आते-जाते रहते हैं। चूंकि मंगलवार को देश में फिर से लॉकडाउन लगाए जाने की घोषणा की गई थी, इसलिए सोमवार को यहां अच्छी-खासी भीड़ जमा थी। राहत की बात सिर्फ यह है कि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जान-माल के बहुत ज्यादा नुकसान की खबर नहीं है, मगर यह हमला कई सवाल खड़े कर रहा है। पिछले एक हफ्ते में फ्रांस के बाद यह दूसरा आतंकी हमला है, जिसमें कट्टरपंथियों की तरफ उंगली उठ रही है, तो क्या पश्चिमी देशों में इस्लामिक आतंकवाद फिर से सिर उठाने लगा है? और, दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ऑस्ट्रिया ने किसी अन्य देश में शायद ही दखलंदाजी की है, जैसा कि फ्रांस के आतंकी हमले के बारे में कहा जाता है कि वह उसकी सीरियाई नीति का नतीजा हो सकता है, तो वियना को निशाना बनाने का आखिर क्या मकसद है? 

इस हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने ली है, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हुई है। हालांकि, वीडियो फुटेज से यही पता चलता है कि दहशतगर्द स्थानीय नहीं थे, और संभवत: चेचन या सीरियाई हो सकते हैं। यहां के कई लोग ऑस्ट्रिया में मौजूद हैं। चेचन्या से पलायन पिछली सदी के आखिरी दशक में गृह युद्ध के कारण हुआ था, जबकि सीरिया में अमेरिका-आईएस जंग में। कहा तो यह भी जाता है कि चेचन्या की रमजान कादिरोव सरकार को रूस का परोक्ष समर्थन हासिल है और उसी की शह पर कट्टरपंथियों को खाद-पानी दिया जा रहा है, ताकि वे मॉस्को के काम आ सकें। मगर यूरोपीय देश पहुंचने के बाद इनमें अलग ही किस्म की कट्टरता देखी जा रही है। 

तो क्या शरणार्थियों को शरण देने का यूरोपीय देशों का फैसला गलत था? अभी इसका ठीक-ठीक जवाब नहीं दिया जा सकता है, लेकिन इस पहलू को नजरंदाज भी नहीं किया जा सकता। ऑस्ट्रिया का ही उदाहरण लें। यहां तुर्की की एक बड़ी आबादी मौजूद है। उन्होंने यहां नस्लवाद का दंश भी झेला है, क्योंकि 1950-60 के दशक में मजदूर के रूप में उन्हें बुलाया गया था। उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। मगर आतंकवादी हमलों में उनकी संलिप्तता नहीं रही है। दरअसल, मानव विज्ञान कहता है कि पहली दुनिया के मुल्कों में जब दूसरी या तीसरी दुनिया के देशों के बाशिंदे आते हैं, तो उन्हें यहां की रीति-नीति में घुलने-मिलने में काफी दिक्कतें होती हैं। पहली दुनिया के देशों में लोग शायद ही एक-दूसरे पर बंदूकें उठाते हैं। वहां ‘हिंसा का अधिकार’ सरकारों को हासिल है। इसीलिए लोग स्वयं उलझने के बजाय पुलिस के पास जाना पसंद करते हैं। मगर तीसरी दुनिया के राष्ट्रों में ऐसा नहीं होता। यूरोपीय देशों ने शरणार्थियों के लिए घर के दरवाजे खोलते वक्त इस पहलू को नजरंदाज कर दिया। 

संभव है कि ऑस्ट्रिया अपनी इसी चूक का खामियाजा भुगत रहा हो। ऐसा इसलिए भी, क्योंकि सोमवार को हमला अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर नहीं, ऑस्ट्रियाई सरकार पर किया गया था। गोलीबारी डैन्यूब नदी के इस पार की गई, जबकि नदी के उस पार अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी, संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन, व्यापक परमाणु-परीक्षण-प्रतिबंध संधि संगठन जैसी तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के मुख्य कार्यालय हैं। अगर दहशतगर्दों की मंशा अंतरराष्ट्रीय समुदाय को निशाना बनाने की होती, तो वे वियना के पुराने हिस्से में हमला नहीं करते। वैसे, सुरक्षा एजेंसियों के सामने यह भी उलझन होगी कि इन आतंकियों तक हथियार पहुंचे कैसे? अभी तक जो सूचना आई है, उससे यही पता चलता है कि एके 47 या उसी के तरह के किसी घातक हथियार से हमले किए गए। चूंकि ऑस्ट्रिया में बंदूक-संस्कृति नहीं है, इसलिए कयास है कि तस्करी के माध्यम से ये हथियार देश में लाए गए होंगे। बेशक ऑस्ट्रिया की जिन राष्ट्रों के साथ सीमाएं लगती हैं, उन्हें धोखा देना या उनसे काम निकलवाना आसान है, लेकिन सुरक्षा एजेंसी के सामने सवाल यह होगा कि ‘स्मगलिंग रूट’ के पास बड़े-बड़े यूरोपीय शहर होने के बावजूद आतंकियों ने वियना को क्यों चुना? 

यह हमला एक और पहलू को सामने लाता है। जेहाद को बढ़ावा देने वाले मुल्कों में जब शांति पसरती है, तो पश्चिमी देशों व भारत जैसे उदारवादी राष्ट्रों में आतंकी गतिविधियां बढ़ जाती हैं। अफगानिस्तान में ही सोवियत संघ के खिलाफ जेहाद जब खत्म हुआ, तो कश्मीर में जेहादी गतिविधियों की शुरुआत हो गई। सीरिया, लीबिया, अफगानिस्तान या मुस्लिम दुनिया में जब कभी गृह युद्ध पर जीत हासिल की जाती है, वहां से आतंकवादी दूसरे देशों में पहुंचने लगते हैं। 

ऐसे में, निशाने पर भारत भी है, लिहाजा अपनी सुरक्षा को लेकर हमें खास सावधानी बरतनी चाहिए। यहां मुंबई जैसा हमला हो चुका है। पहले के हमलों में लोगों को अधिकाधिक निशाना बनाया जाता था, लेकिन अब समाज में वैमनष्य बढ़ाने की साजिश ज्यादा दिखती है। इससे बचने के लिए जरूरी है कि इस्लामिक समाज के अंदर से सुधार हो। हर समाज में सुधार तभी आया है,जब उसने खुद पहल की है। मगर दिक्कत यह है कि मुस्लिम समाज केअंदर जो भी सुधारवादी सामने आते हैं, उन्हें ही निशाना बनाने की कोशिश होती है। समाज की इस समस्या को प्राथमिकता से दूर करना चाहिए।  

बेशक, हमें अपनी सुरक्षा को लेकर खास सावधानी बरतनी चाहिए। बचने का कोई तयशुदा रास्ता तो नहीं है, पर चीन की उइगर नीति की कुछ लोग तारीफ करते हैं। मगर यह नीति भी सही नहीं जान पड़ती। दस-पंद्रह वर्षों के लिए बेशक चीन ने इस्लामिक आतंकवाद के पर काट दिए हैं, लेकिन बाद में इसके सामाजिक दुष्परिणाम भयावह साबित हो सकते हैं। ऐसे में, बेहतर यही है कि सामाजिक ताने-बाने को मजबूत किया जाए। पूरी दुनिया के स्तर पर सद्भाव बनाकर रखने की जरूरत है। आतंकवादी हमेशा साजिश में रहते है कि दुनिया में अशांति फैल जाए। बेशक, एक मजबूत सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी दहशतगर्दी को विफल कर सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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