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सख्त आर्थिक फैसलों का समय

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आम चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की शानदार जीत के बाद सियासी पंडितों द्वारा और कई खुले पत्रों के माध्यम से वित्त मंत्री को यह सलाह दी जा रही है कि सरकार की आर्थिक प्राथमिकताएं क्या-क्या होनी चाहिए। हालांकि, इनमें यह नहीं बताया जा रहा है कि नई सरकार को क्या-क्या करना चाहिए, बल्कि कहा यह जा रहा है कि आने वाले दिनों में क्या-क्या संभावना है। जिस तरह का मजबूत जनादेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला है, उससे वह आर्थिक मोर्चे पर साहसिक फैसले लेने में सक्षम हैं, लेकिन इसने बड़ी उम्मीदों को भी हवा दी है। ऐसे में, सरकार के लिए यह परिस्थिति एक अवसर भी है और चुनौती भी। मजबूत आर्थिक फैसले लेने में सरकार को बाहरी और घरेलू, दोनों तरह की चुनौतियों का सामना करना होगा। बाहरी चुनौतियों की बात करें, तो वैश्विक आर्थिक विस्तार और व्यापार विकास, दोनों की गति अब मंद पड़ने लगी है। बल्कि बीते कुछ महीनों में भयावह वैश्विक घटनाओं के कारण इस गिरावट का जोखिम भी बढ़ चला है। अमेरिका और चीन का व्यापार युद्ध तेजी से एक कटु जंग में बदल रहा है, जबकि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों का फिर से लगना और अमेरिका-सऊदी-इजरायल गठबंधन के साथ उसके टकराव से पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ गया है। उधर, यूरोप में ब्रेग्जिट की उलझन भी अब तक कायम है।

आंतरिक मोर्चे पर भी हालात गंभीर हैं। तमाम मैक्रोइकॉनॉमिक संकेतक अब विकास में गिरावट का इशारा करने लगे हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), कृषि, उद्योग, निवेश और व्यापार में विकास वास्तविक अर्थों में घटा है। निजी उपभोग में तेजी बेशक अब भी ज्यादा है, लेकिन इसमें भी अब कमी आने लगी है। इसके अलावा, पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे का नतीजा भी उच्च बेरोजगारी की हमारी आशंकाओं को पुष्ट कर रही है, जबकि गंभीर कृषि संकट ग्रामीण भारत के लिए सामान्य हो चला है। इन तमाम चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का देखते हुए शुरुआती संकेत यही दिख रहे हैं कि सरकार विकास को पुनजीर्वित करने, रोजागर सृजन और कृषि संकट को दूर  करने के लिए किसानों को आय समर्थन देने पर अपना ध्यान देगी। यह प्रयास कितना सफल होगा, यह पूरी तरह से उसके द्वारा उठाए गए कदमों पर निर्भर करेगा।

विकास का नवजीवन पूरी तरह से निवेश और निर्यात में वृद्धि पर निर्भर करेगा। निवेश को गति देने की एक आवश्यक शर्त यह है कि ‘कॉस्ट ऑफ मनी’ (उधार ली गई धनराशि पर भुगतान की गई ब्याज दर) कम की जाए। मौद्रिक नीति से जुड़ी समिति सही दिशा में आगे बढ़ रही है। कई केंद्रीय बैंक टेलर नियम (केंद्रीय बैंकों के लिए प्रस्ताविक दिशा-निर्देश कि आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें किस तरह अपनी ब्याज दरों में तब्दीली करनी चाहिए) के बहाने यही सुझाव देंगे कि रेपो दर को लगभग पांच फीसदी तक लाया जाना चाहिए। लेकिन अकेले इसी से ब्याज दरें कम नहीं होंगी। चूंकि सरकार सबसे बड़ी कर्जदार है और सरकारी बैंक मुख्य वित्तीय मध्यस्थ, इसीलिए जब तक सरकारी प्रतिभूतियों और राष्ट्रीय लघु बचत योजनाओं पर उच्च प्रशासनिक लागत कम नहीं की जाएगी, तब तक ‘कॉस्ट ऑफ मनी’ में कमी नहीं आएगी। इसके अलावा, क्रेडिट और निवेश चक्र को भी प्रभावी रूप से गति देनी होगी, जिसके लिए जरूरी है कि ब्याज दर से जुड़े कदमों को उन प्रयासों से जोड़ा जाए, जो बैंकों के डूबत कर्ज को दूर करने के लिए हों। जरूरी यह भी है कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां जिन मुश्किलों का सामना कर रही हैं, उन्हें भी दूर किया जाए। वैसे, यह एक मुश्किल काम जान पड़ता है।

निर्यात की बात करें, तो सुखद खबर यह है कि भारतीय उत्पादकों को अब वैश्विक आपूर्ति शृंखला में प्रवेश मिल रहा है। इसे मजबूती देने के लिए जरूरी है कि हाल के वर्षों में टैरिफ दरों में की गई छेड़छाड़ को ठीक किया जाए। इसके साथ ही वास्तविक प्रभावी विनिमय दर की मूल्य वृद्धि को रोकने के लिए एक सक्रिय विनिमय दर नीति भी बनानी होगी। लॉजिस्टिक और कम्युनिकेशन में सुधार भी जरूरी है, ताकि देशी निर्यातकों को उचित मौका मिले। हालांकि, यह भी मुश्किल काम है।
सरकार को बेरोजगारी और ग्रामीण संकट जैसी चुनौतियों से जल्द निपटना होगा। परियोजनाओं और योजनाओं के मामले में मोदी सरकार बेहतर स्थिति में है, लेकिन सारगर्भित नीति के मामले में ऐसा नहीं है। इसीलिए व्यापक रोजगार मुहैया कराने वाले ग्रामीण बुनियादी ढांचे, खासतौर से सड़क, लघु सिंचाई, ग्रामीण आवास आदि में सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा देना सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर होना चाहिए। ग्रामीण संकट का तत्काल हल निकालने के लिए आय सहायता कार्यक्रम जरूरी है। लेकिन इन कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करते समय सरकार को यह ध्यान रखना होगा कि भूमि के स्वामित्व के आधार पर यदि ऐसी योजनाएं बनाई जाती हैं, तो वे सीमांत किसानों और खेतिहर मजदूरों को राहत नहीं दे पाएंगी, जबकि यही सबसे ज्यादा संकट में हैं।

समझना यह भी जरूरी है कि ये अल्पकालिक राहत उपाय उन संरचनात्मक सुधारों के विकल्प नहीं हैं, जो मध्यम से दीर्घावधि में उत्पादक रोजगार वृद्धि को गति देने के लिए जरूरी हैं। फिर भी, इन राहत उपायों को अमलीजामा पहनाने और बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा देने के लिए हमें ढेर सारे पैसों की दरकार होगी। इस लागत को आखिर कैसे पूरा किया जाएगा? 2018-19 में सरकार ने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा करने के लिए अपनी खर्च-वृद्धि को पिछले वर्ष की 15 फीसदी से घटाकर 9.2 फीसदी कर दिया। बेशक यह वह दोबारा नहीं कर सकती, लेकिन राज्य सरकारों (ज्यादातर राज्यों में भाजपा की ही सरकार है) के साथ मिलकर वह नॉन-मेरिट सब्सिडी (पूरे समाज की बजाय उसके कुछ हिस्से को दी जाने वाली सब्सिडी) में कुछ कटौती करके सार्वजनिक खर्च को नया रूप जरूर दे सकती है। यह सब्सिडी जीडीपी की कुल 5.7 फीसदी है। कर रियायतों और कर छूट में भी कटौती की जा सकती है, जो जीडीपी की पांच फीसदी हैं। तो क्या यह उम्मीद की जाए कि नई सरकार राजकोषीय अनुशासन को लागू करने के लिए अपने इस जनादेश का इस्तेमाल करेगी? यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Time To Take Tough Economic Decision Hindustan Opinion Column on 24th June