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सरकार दिल्ली को पूरा पानी देने में नाकाम 

उत्तर भारत के ज्यादातर इलाकों में बढ़ती गरमी के साथ जल संकट गहराने लगा है। मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली में भी जलापूर्ति चर्चा का विषय है। आखिर कैसे हो स्थायी समाधान? दिल्ली में समाधान के लिए लोकसभा में..

सरकार दिल्ली को पूरा पानी देने में नाकाम 
Monika Minalअटल बिहारी वाजपेयीFri, 24 May 2024 10:54 PM
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अध्यक्ष महोदय, भारत की राजधानी में केंद्रीय सरकार की नाक के नीचे दिल्ली के बीस लाख से भी अधिक नागरिक पिछले अठारह घंटे से बिना पानी के तड़प रहे हैं। इससे इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारा शासन कितनी दक्षता से काम कर रहा है। मैं इस विवाद में राजनीति को घसीटना नहीं चाहता, क्योंकि जो भी संकट पैदा हो गया, उसका सम्मिलित प्रयत्नों से मुकाबला किया जाना चाहिए, पर इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि जो भी आपदा खड़ी हुई है, उसके लिए प्रकृति को इतना दोष नहीं दिया जा सकता, जितना कि जिम्मेदार व्यक्तियों को। यह विपत्ति मानवजनित है। यमुना नदी सदा अपनी धारा बदलती है, सरकार के इन दावों के बावजूद कि नदियों पर नियंत्रण किया जा रहा है और नदियों को पालतू बनाया जा रहा है, लेकिन यह धारा बदलने का उसका काम केवल इसी साल का नहीं है। पांच-छह महीने पहले नदी की धारा बदल गई थी और उस समय मुर्दों को जलाने के लिए पानी नहीं था। आज नदी की धारा फिर बदल गई है और आज जिंदों को जिंदा रखने के लिए पानी नहीं है। 
सारी जिम्मेदारी नदी पर छोड़ने से काम नहीं चलेगा। जब नदी की धारा बदल रही है, तो शासन का यह कर्तव्य था कि... वह समयोचित कदम उठाता, पर सरकार अपने कर्तव्य का पालन करने में पूरी तरह से असफल सिद्ध हुई है और इस बात की जांच की जानी चाहिए कि इसके लिए कौन उत्तरदायी है। सचिवालय उत्तरदायी है; सचिवालय के कर्मचारी उत्तरदायी हैं। स्वास्थ्य मंत्री इसके लिए उत्तरदायी हैं और उन्हें सदन को इस बात का उत्तर देना चाहिए कि ऐसी स्थिति क्यों पैदा होने दी गई? ...1955 में भी नदी ने अपनी धारा बदली थी। नजफगढ़ नाले की गंदगी पीने के पानी में मिल गई थी और परिणामस्वरूप व्यापक पैमाने पर एक रोग फैला था।...
हम आशा करते थे कि इस दुर्घटना से सरकार की आंखें खुलेंगी, पर ऐसा मालूम होता है कि सरकार ने पुराने अनुभवों से लाभ न उठाने का निश्चय कर लिया है और उसका परिणाम यह है कि आज फिर दिल्ली की जनता के सामने एक भयंकर संकट पैदा हो गया है। हम सब जानते हैं कि सरकार खाने के लिए लोगों को पूरा अनाज नहीं दे सकती, शरीर ढंकने के लिए पूरा वस्त्र नहीं दे सकती और आज स्थिति यह आ गई है कि सरकार लोगों को पीने के लिए पानी भी नहीं दे सकती है। अगर सरकार में थोड़ी लज्जा होती, तो वह चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाती, पर आज शायद यहां पर चुल्लू भर पानी भी नहीं है, इसलिए मैं ऐसा नहीं कहता कि उसे डूब मरना चाहिए।
सवाल यह है कि जब एक संकट पैदा हो गया है, तो उस संकट की पूर्व-सूचना क्यों नहीं दी गई? ...भविष्य में ऐसा संकट फिर पैदा न हो, ऐसी परिस्थिति पैदा न हो, इसके लिए उपाय अपनाए जाने चाहिए, पर गत वर्षों में इस संबंध में सरकार ने जिस ढंग से काम किया है, उससे यह आशा नहीं होती कि भविष्य में इस प्रकार की परिस्थिति पैदा होने से रोकी जा सकेगी।... 
यमुना में पानी आया था, तो यहां बाढ़ आ गई और दिल्ली के सरकारी भवनों में छह-छह फीट पानी भर गया। अब नदी थोड़ी सी पीछे सरकी, तो दिल्ली में जल का संकट पैदा हो गया है। क्या दिल्ली के भाग्य का निर्णय यमुना नदी करेगी या हमारे सामने बैठे हुए सरकार के सदस्य करेंगे?...
आज जो भी परिस्थिति पैदा हो गई है, उसके लिए किसी को आगे बढ़कर जिम्मेदारी लेनी चाहिए, ...और अपनी भूल को स्वीकार करना चाहिए। उसे इस सदन को और दिल्ली की जनता को विश्वास में लेना चाहिए और यह आश्वासन देना चाहिए कि जो भी परिस्थिति उत्पन्न हो गई है, उसकी पुनरावृत्ति नहीं होने दी जाएगी। ...मैंने सबेरे से पानी नहीं पिया है, इसलिए मैं ज्यादा भाषण नहीं कर सकता। धन्यवाद।
    (लोकसभा में दिए गए उद्बोधन से)