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9 अगस्त, 2020|5:03|IST

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पाकिस्तान की सरपरस्ती में हक्कानी

सुशांत सरीन, पाकिस्तान मामलों के विशेषज्ञ

अमेरिका इन दिनों हक्कानी नेटवर्क को निशाने पर लेता दिख रहा है। पिछले हफ्ते उसने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाके पर पहले ड्रोन हमले करके हक्कानी कमांडर सहित तीन दहशतगर्दों को ढेर किया। फिर तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के छह नेताओं पर प्रतिबंध भी लगाए। साफ है कि अफगानिस्तान में गठबंधन सेनाओं पर हुए हमले को वह अब हल्के में लेने को तैयार नहीं। हालांकि अमेरिका अपने लक्ष्य में कितना सफल होगा, इस पर संदेह है। दरअसल, तालिबान के साथ बातचीत का रास्ता भी खुला रखा गया है। इसी विकल्प पर पाकिस्तान गंभीरता से काम कर रहा है। इसका अर्थ है कि इस्लामाबाद दहशतगर्दी खत्म करने के नाम पर फिर से धूल झोंकने की कोशिश में है। डर यह है कि कहीं अमेरिका भी उसके झांसे में न आ जाए?  

हक्कानी नेटवर्क पर पिछले कई वर्षों से अमेरिका की नजर रही है। 1980 के दशक में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने इस गुट का इस्तेमाल तब के सोवियत संघ के खिलाफ किया था। जलालुद्दीन हक्कानी की अगवानी तो व्हाइट हाउस में भी की जा चुकी है। हालांकि अभी तक यह साफ नहीं है कि हक्कानियों का मूल ठिकाना कहां है? जिस जदरान कबीले से यह गुट ताल्लुक रखता है, वह अफगानिस्तान में भी है और पाकिस्तान में भी। माना यह जाता है कि हक्कानी मूल रूप से अफगानिस्तान के हैं, मगर पाकिस्तान के कुछ इलाकों पर इनका व्यापक असर है। पाकिस्तान की सीमा में यह नेटवर्क दो दशक पहले दाखिल हुआ और वहीं का होकर रह गया। 

हक्कानी नेटवर्क का पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ करीबी रिश्ता रहा है। अमेरिकी सेना प्रमुख तक ने इसकी तस्दीक की थी कि हक्कानी मूल रूप से आईएसआई का ही एक अंग है। हालांकि अल-कायदा और पाकिस्तान के अंदर मौजूद तालिबान गिरोहों से भी इसके अच्छे संबंध रहे हैं। हक्कानी का पूरा साम्राज्य आपराधिक गतिविधियों पर निर्भर है। नशा कारोबार, जबरन वसूली, तस्करी, हथियारों का गैर-कानूनी व्यापार जैसे कामों में इसका दखल रहा है। इसीलिए यह नेटवर्क आर्थिक रूप से मजबूत है। अफगानिस्तान में तालिबानी हुकूमत खत्म होने के बावजूद इसने अपनी वफादारी नहीं बदली है। इसकी पुष्टि इससे भी होती है कि जब तालिबान की कमान मुल्ला मंसूर को सौंपी गई, तो उसके सहायक के रूप में सिराज हक्कानी को चुना गया था। बावजूद इसके अमेरिका ने हमेशा तालिबान और हक्कानी को अलग-अलग तंजीमों में बांटा है। इसके पीछे उसकी राजनीतिक व कूटनीतिक मजबूरियां हो सकती हैं।

रही बात पाकिस्तान की, तो हक्कानियों का उसने हर वक्त साथ दिया है। जब तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान पर कार्रवाइयां की जा रही थीं, तो उस पर नजर रखने और दबाव बनाने के लिए पाकिस्तानी फौज हक्कानियों की मदद ले रही थी। बदले में इसके नेताओं को सुरक्षित पनाह दी गई। न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार डेविड रोड ने इसका खुलासा अपने एक लेख में भी किया है। रोड का साल 2008 के नवंबर में अपहरण कर लिया गया था। करीब सात महीने के बाद जब वह किसी तरह भागकर तालिबानी चुंगल से छूटे, तो उन्होंने बताया कि किस तरह हक्कानी और तालिबान मिलकर काम कर रहे हैं? और पाकिस्तानी फौज किस तरह इन्हें मदद पहुंचा रही है? 

हक्कानियों का उत्तरी वजीरिस्तान में बड़ा नेटवर्क था। पाकिस्तान इस इलाके में सैन्य कार्रवाई का दावा करता है, पर हकीकत में फौजी कार्रवाई से पहले उसने यहां से हक्कानियों, गुड तालिबान और अपने हित के तमाम आतंकियों को हटा दिया था। बाद में हक्कानियों का ठिकाना कुर्रम एजेंसी बना, जहां इन दिनों अमेरिका ड्रोन हमले कर रहा है। कुर्रम एजेंसी से सटे हुए अफगानिस्तान के प्रांत- खोस्त, पक्तिया और पक्तीका अब इस गुट के आधार-क्षेत्र हैं।

पाकिस्तान और हक्कानी एक-दूसरे की जरूरत हैं। हक्कानियों को संरक्षण देकर पाकिस्तान दूरगामी हित साधने की सोच रहा है। वह मानता है कि आने वाले समय में अफगानिस्तान में तालिबानी हुकूमत काबिज हुई, तो हक्कानियों के रूप में उसे भरोसेमंद साथी मिलेंगे और उनके जरिए वह अफगान हुकूमत को प्रभावित कर सकेगा। उधर, हक्कानियों को भी अपने तमाम गैर-कानूनी कामों के लिए पाकिस्तान की खुफिया व फौजी तंत्र की जरूरत है। वे उनके संरक्षण में खुद को जिंदा भी रख सकते हैं।

जाहिर है, पाकिस्तान और हक्कानियों की यह दोस्ती भारत के हित में नहीं है। अफगानिस्तान में भारतीयों को निशाना बनाने की घटनाओं में हक्कानियों की भूमिका देखी गई है। अमेरिका ने अपनी खुफिया जांच में भी पाया है कि आईएसआई ने हक्कानियों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया है। यह अफगानिस्तान के लिए भी सुखद स्थिति नहीं है। हक्कानी उसकी स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। यही कारण है कि अमेरिका लगातार पाकिस्तान पर हक्कानियों पर बंदिश लगाने का दबाव बनाए हुए है। इसकी एक वजह यह भी है कि वह तालिबान को वार्ता की मेज पर देखना चाहता है। चूंकि तालिबान के लिए हक्कानी जंगी सिपहसलार तैयार करने का काम करता है, इसलिए हक्कानी पर कार्रवाई करके अमेरिका तालिबान पर अपना दबाव बनाना चाहता है। पाकिस्तानी इमदाद बंद करने वाले कानून में भी उसने हक्कानी नेटवर्क की चर्चा की है, तालिबान की नहीं।

हालांकि हक्कानियों पर कार्रवाई करना (दिखावे के लिए ही सही) पाकिस्तान के लिए आसान नहीं है। अव्वल तो हक्कानी उसी का पाला गुट है, और फिर यदि उस पर कार्रवाई हुई, तो फौजी-प्रतिष्ठानों में विद्रोह के स्वर उभर सकते हैं। इतना ही नहीं, भविष्य में अफगानिस्तान में तालिबान मजबूत बना, तो वहां उसे मुंह की खानी पड़ सकती है। हक्कानियों पर कार्रवाई से मुल्क के अंदर भी आतंकी वारदात बढ़ सकती हैं, जिसे संभालना इस्लामाबाद के लिए आसान नहीं होगा। इनमें से अधिकतर बातें बेशक फसाना हों, पर कुछ में तो सच्चाई जरूर है। 
दरअसल, पाकिस्तान के लिए हक्कानी नेटवर्क गले में फंसी ऐसी हड्डी बन चुका है, जिसे निगलना और उगलना, दोनों उसकी सेहत के लिए ठीक नहीं। अब वह तो यही चाहेगा कि अमेरिका थोड़ी-बहुत कार्रवाई जरूर करे, पर वह ज्यादा असरकारी न हो। इसीलिए उसने बातचीत का चारा फेंका है। इसके पीछे अमेरिका को लंबे समय के लिए उलझाकर उसकी अपने लिए वक्त लेने की मंशा है। देखना यह है कि अमेरिका इस जाल में फंसता है या वाकई दहशतगर्दी पर बड़ा हमला करता है? (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Sushant Sarin article in Hindustan on 29 january