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जाम से रेंगते शहरों का समाधान

लखनऊ, पटना और रांची जैसे मध्यम श्रेणी के शहर भी अब जाम से हांफने लगे हैं। सड़कों के चौड़ीकरण के साथ इन्हें सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था भी दुरुस्त करनी पड़ेगी। सड़क जाम जैसी समस्या पहले महानगरों के...

जाम से रेंगते शहरों का समाधान
Monika Minalकेके पांडेय, अर्बन मैनेजमेंट, आईआईपीए Wed, 14 Feb 2024 09:44 PM
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सड़क जाम जैसी समस्या पहले महानगरों के हिस्से ही थी। छोटे शहर व कस्बे इससे मुक्त थे। मगर अब छोटे-बड़े नगर भी इससे पस्त होने लगे हैं। लखनऊ, पटना, रांची, देहरादून जैसे मध्यम श्रेणी के शहरों में भी सड़कों पर गाड़ियां रेंगती नजर आती हैं। स्थिति यह है कि जो चौक-चौराहे कभी इन शहरों की पहचान हुआ करते थे, आज वे जाम के कुख्यात केंद्र बन गए हैं। महानगरों में एलीवेटेड रोड, फ्लाई ओवर, अंडरपास जैसे नव-निर्माण से जाम की समस्या का कुछ हद तक हल निकाला जा सकता है, निकाला जाता भी है, मगर मध्यम व छोटे शहर बडे़ पैमाने पर ऐसा नहीं कर पा रहे। फिर इन नगरों में जाम का चरित्र भी अलग-अलग है। भारत में सड़क जाम की समस्या व्यापक है। 10 लाख से अधिक आबादी वाले नगर इससे सर्वाधिक पीड़ित हैं। अमूमन सड़कों की दुर्व्यवस्था व अनुशासित परिचालन के अभाव के कारण ऐसा होता है।

अपने यहां सड़कों की मरम्मत ही तभी की जाती है, जब वे धंसती या टूटती हैं, जबकि यह काम नियमित तौर पर होना चाहिए। हालांकि, फुटपाथ का न होना या उस पर अतिक्रमण भी एक बड़ी समस्या है, जिसके कारण पैदल यात्री सड़कों पर चलने को मजबूर होते हैं। सड़क जाम हमें कई तरह से प्रभावित करता है। इससे शहरों की आबोहवा तो प्रदूषित होती ही है, अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। अनुमान है, भारत में सड़क जाम के कारण पड़ने वाले दुष्प्रभावों से देश को 40.7 अरब डॉलर का नुकसान होता है। इतना ही नहीं, परिवहन मंत्रालय के एक आंकड़े के मुताबिक, मुख्यत: जाम से साल 2021 में 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में तकरीबन 67,000 दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 15,000 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई, जबकि 58,000 से अधिक गंभीर रूप से चोटिल हुए।
महानगरों जैसी समस्याएं अब लखनऊ, पटना, रांची, जमशेदपुर जैसे मध्यम श्रेणी के शहरों में भी दिखने लगी हैं। यहां भी अवैध कॉलोनियों का बेतरतीब विस्तार हो रहा है। शहरी नियोजन के अभाव में छोटी-छोटी गलियां बन जाती हैं, जो मुख्य सड़कों को प्रभावित करती हैं। यहां सार्वजनिक परिवहन में  सुधार करना होगा। अमूमन जब कभी सार्वजनिक परिवहन की बेहतरी की बात उठती है, तो हर शहर मेट्रो मांगने लगता है। मगर मेट्रो के बजाय आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का इस्तेमाल अधिक व्यावहारिक है, जिसमें अलग-अलग शहरों की जरूरतों के मद्देनजर अलग-अलग सार्वजनिक परिवहन को विस्तार देने की बात कही गई है। ये परिवहन-माध्यम बस, लाइट रेल ट्रांजिट (एलआरटी), मोनो रेल, मेट्रो कुछ भी हो सकते हैं। आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय परिवहन शहरी नीति की भांति राज्य भी एक अलग नीति बनाए, जो शहरों की अपनी प्रकृति के मुताबिक हो।
मध्यम व छोटे शहरों में यातायात के प्रबंधन की भी भारी कमी है। प्रति एक लाख आबादी पर 40 से 60 सार्वजनिक बसों का होना आदर्श माना जाता है, लेकिन लखनऊ में यह आंकड़ा महज छह बसों का है। बेंगलुरु में प्रति लाख आबादी पर सर्वाधिक 45 बसें हैं। सरकारी व निजी बसों को यदि मिला भी दें, तो अपने देश में राष्ट्रीय स्तर पर एक लाख की आबादी पर सिर्फ 24 बसें उपलब्ध हैं। इसका अर्थ है कि हमें एक तरफ सड़कों का चौड़ीकरण या विस्तार करना होगा, फ्लाई ओवर या एलीवेटेड रोड बनाने होंगे, तो दूसरी तरफ यातायात व्यवस्था का भी उचित प्रबंधन करना होगा। इन कामों में संसाधन की कमी कोई समस्या नहीं है। मसला नियोजन और क्रियान्वयन के मोर्चे पर है। 
सड़क जाम से निपटने के लिए आम लोगों की मानसिकता को भी हतोत्साहित करना होगा। यह कोई आसान काम नहीं। आंकड़ों के मुताबिक, मुंबई में आधी से अधिक सड़कों पर निजी कार वालों का कब्जा है, जबकि 28 फीसदी हिस्सेदारी मोटरसाइकिल वालों की है। पटना, लखनऊ, रांची जैसे नगरों की तस्वीर इससे अलग नहीं है। यहां तक कि सुदूर कस्बों में भी अब बड़ी-बड़ी गाड़ियां दिखने लगी हैं, जबकि वहां सड़कें एक लेन की हैं। गाड़ियों की संख्या बढ़ने की एक बड़ी वजह लोगों की बढ़ती समृद्धि है, जो एक लिहाज से सुखद है, लेकिन सार्वजनिक परिवहन के अभाव में वे गाड़ियां खरीदना पसंद करते हैं, ताकि उनका आवगमन आरामदेह हो। इस प्रवृत्ति को हमें खत्म करना है, जिसके लिए सार्वजनिक परिवहन के पर्याप्त विकल्प लोगों को उपलब्ध कराने होंगे। ऐसा करना सिर्फ छोटे और मध्यम श्रेणी के शहरों में नहीं, बल्कि महानगरों में भी फायदेमंद है।
रही बात सड़कों के चौड़ीकरण की, तो ‘हस्तांतरणीय विकास अधिकार’ (टीडीआर) जैसी नीति हमारे काम आ सकती है। यह इस अवधारणा पर आधारित है कि लोगों से उनकी जमीन का कुछ टुकड़ा सड़क-निर्माण में लिया जाए और बदले में उनको कुछ रियायतें दी जाएं। मसलन, जो अपनी जमीन  सार्वजनिक उद्देश्य के लिए छोड़ेगा, उसे अपने मकान में अतिरिक्त एक मंजिल बनाने की अनुमति दी जाएगी। इसके अलावा, सड़क विकास के लिए स्थानीय लोगों पर कुछ कर भी लगाए जा सकते हैं। एक विकल्प पुनर्निर्माण योजनाएं हो सकती हैं, जिसकी तरफ दिल्ली के प्रस्तावित मास्टर प्लान में कदम बढ़ाया गया है। इसमें जमीनों को सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत विकसित करने की बात कही गई है। महाराष्ट्र में धारावी क्षेत्र का भी इसी तरह पुनर्विकास किया जा रहा है। अन्य शहर भी ऐसा कुछ कर सकते हैं। इससे सड़कों के लिए जमीन मिल जाएगी व शहर भी साफ-सुथरा हो जाएगा।
यातायात प्रबंधन के लिए अहमदाबाद जैसा प्रयोग किया जा सकता है, जिसने बसों के लिए अलग लेन बनाए। हालांकि, दिल्ली में यह ‘बस रैपिड ट्रांजिस सिस्टम’ (बीआरटीएस) सफल नहीं हो सका, लेकिन मध्यम व छोटे शहरों में ऐसा किया जा सकता है। मुमकिन हो, तो वहां कुछ सड़कों को ‘सिंगल लेन’ भी किया जा सकता है, यानी उस पर सिर्फ एक तरफ जाने वाले वाहन चलेंगे। नोएडा और गुरुग्राम में कुछ इलाकों में यह व्यवस्था अच्छे ढंग से काम कर रही है।
जाम की एक वजह जनसंख्या को भी बताया जाता है, पर यह गलत सोच है। नियोजन व क्रियान्वयन की समस्या है। अगर शहर-दर-शहर अध्ययन हों, उसके अनुरूप उपाय किए जाएं, तो भारत सड़क जाम की समस्या से काफी हद तक बच सकता है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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