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अथक कलइगनर का विश्राम

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार

तड़के ही बिस्तर छोड़ देने वाले मुथुवेल करुणानिधि के दिन की शुरुआत तमाम अखबार पढ़ने के साथ होती थी। उनकी नजर खासतौर से वैसी खबरें ढूंढ़ती, जो उनकी आलोचना में लिखी गई होतीं या विरोधियों द्वारा प्रचारित। सुबह साढ़े पांच बजे के आसपास वह अपना पहला ड्राफ्ट तैयार करवाते। यह कोई प्रेस विज्ञप्ति या संपादक के नाम पत्र होता, काडरों को संबोधित अपनी पार्टी के मुखपत्र मुरासोली  के लिए कोई लेख या फिर सवाल-जवाब की शैली में खुद का ‘मॉक’ यानी छद्म साक्षात्कार।

उनकी प्रतिक्रिया तीखी, मगर विनोदपूर्ण होती। वह अपने विरोधियों पर निशाना लगाने को कोई मौका चूकना नहीं चाहते थे। जरूरी लगे, तो आत्मप्रशंसा से भी चूकते नहीं थे। काडरों को संबोधित लेखों की भाषा काफी सरल होती; मानो कोई शिक्षक अपने छात्रों को संबोधित कर  रहा हो। समर्थकों के समझाने के लिए जटिल मसलों पर बेहद आसान लेखन उनकी खासियत थी।

उनके विषयों का दायरा काफी बड़ा होता। सियासी मसलों के साथ-साथ वह केंद्र व स्थानीय घटनाक्रमों पर, राजनीतिक विरोधियों के तर्कों के खिलाफ, ज्वलंत सामाजिक मसलों और विरोधियों पर तंज कसते हुए लिखते। करुणानिधि हर रोज की इस दिनचर्या को लेकर इतने संजीदा थे कि किसी दिन अगर कोई खास अखबार उन्हें नहीं मिलता, तो वह अपने सचिव को अखबार के दफ्तर में फोन करने को कहते या फिर छपने वाली जगह से उसे मंगवाते। एक बार एक वामपंथी दल का मुखपत्र  लगातार दो दिन तक उन्हें नहीं मिला, क्योंकि पार्टी के पास इसे छपवाने का पैसा नहीं था, तो करुणानिधि ने उसकी ‘सॉफ्ट कॉपी’ ही मांग ली, जो उन्हें डिस्क में उपलब्ध कराई गई। 

करुणानिधि शुरुआती दिनों में ही ‘कम्युनिकेशन’ का महत्व बखूबी समझ गए थे। आत्मसम्मान आंदोलन के संस्थापकों में एक अजागिरी स्वामीगल उन्हें राजनीति में लेकर आए और करुणानिधि ने अपना पहला लेख एक ‘टैब्लॉयड’ (छोटे आकार के समाचारपत्र) के लिए लिखा, जिसके संपादक उनके आदर्श अन्नादुरई थे।
करुणानिधि ने अपने लेखन कर्म को लगातार विस्तार दिया। नाटक, फिल्म पटकथा, गीत, आलेख, किताबें, ऐतिहासिक महाकाव्य जैसा बहुत कुछ उनके समृद्ध रचना संसार में है, जिसके दम पर उन्होंने बौद्धिकों में जगह बनाई। उन्होंने अपनी कलम से सामाजिक बुराइयों पर खूब हमला बोला। विधवा पुनर्विवाह, मद्यपान निषेध और जमींदारी उन्मूलन जैसे मसलों के समर्थन में जमकर लिखा। वह तब भी अपनी बात लोगों तक बिल्कुल अलग अंदाज में पहुंचाने में सक्षम थे, जब ट्विटर या फेसबुक नहीं था। उन्होंने नाटकों में काम किया, शहर-शहर घूमकर लोगों को संबोधित किया और आकर्षक नारे व लेख लिखे। करुणानिधि ने द्रविड़ विचारधारा को आगे बढ़ाया। उनकी शुरुआती राजनीति हिंदी-विरोध, क्षेत्रीय अस्मिता का समर्थन करती, तर्कवादी और कई मायनों में अंतर्मुखी जरूर थी। मगर वक्त के साथ उन्होंने अपनी इस राजनीति का विस्तार किया, जिस वजह से वह या कोई दूसरी द्रविड़ पार्टी, केंद्र में सत्तारूढ़ दल के साथ गठबंधन करते हुए ही सही, सत्ता में आई। यूडीएफ हो, एनडीए या फिर यूपीए- किसी के साथ से उन्हें कभी कोई परहेज नहीं रहा।

आरक्षण को हथियार बना करुणानिधि सामाजिक परिवर्तन लाने में सफल रहे। 1980 के दशक के अंत में जब देश के उत्तरी राज्य मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब तक तमिलनाडु इसका दो दशकों का लाभ उठा चुका था। यह सूबा 50 फीसदी की सीमा से अधिक आरक्षण सुनिश्चित कराने में भी सफल रहा है। 

करुणानिधि लंबे समय तक सत्तासीन रहने वाले ऐसे नेता के रूप में याद किए जाएंगे, जिनकी छाया देश भर में दिखेगी। उन्होंने 80 वर्षों तक सक्रिय राजनीति की और 50 वर्षों तक वह निर्विरोध पार्टी प्रमुख रहे। वह पांच बार मुख्यमंत्री और 13 बार विधायक बने। चुनाव में कभी हार नहीं देखी। वह एक ऐसे राजनेता के रूप में ज्यादा याद किए जाएंगे, जो जननेता ही नहीं, एक बौद्धिक व्यक्ति भी थे। वह तमिल दार्शनिक थे। तमिल भाषा के प्रचार के लिए उन्होंने अथक काम किया। उनके प्रयासों से यह भाषा ‘क्लासिकल’ की सूची में शामिल हो सकी। 

‘कलइगनर’ की कुछ कमजोरियां भी थीं। सबसे बड़ी कमजोरी थी- परिवार। बेटों की महत्वाकांक्षा और बाकी कुनबे के बीच उन्हें अक्सर संतुलन साधना पड़ा। वह दिन शायद उनके जीवन का सबसे कमजोर क्षण रहा होगा, जब अपनी बेटी से मिलने वह तिहाड़ जेल पहुंचे। बेशक अदालत ने बाद में उन्हें सभी मामलों से बरी कर दिया, पर दाग तो लग ही चुके थे। करुणानिधि के लिए परेशानी का दूसरा सबब श्रीलंकाई तमिलों को समर्थन देना रहा। लिट्टे प्रमुख वी प्रभाकरण के पक्ष में बोलने का उन्हें पछतावा नहीं रहा। जब श्रीलंकाई सेना लिट्टे पर निर्णायक हमला करने के लिए आगे बढ़ रही थी, तो करुणानिधि ने मरीना तट पर भूख हड़ताल की थी। 
इस सबके बावजूद करुणानिधि कई मामलों में एक ऐसे शख्स के रूप में याद किए जाएंगे, जिनके पास अपने विरोधियों से टकराने का पर्याप्त साहस था। उन्होंने सेतुसमुद्रम परियोजना पर आगे बढ़ रही भाजपा से लोहा लिया, तो लिट्टे का समर्थन करते हुए कांग्रेस की लानत-मलामत भी की थी। इमरजेंसी को लेकर भी वह कांग्रेस को घेर ही चुके थे।

करुणानिधि पांच बार मुख्यमंत्री जरूर बने, लेकिन उन्होंने कभी प्रधानमंत्री पद का ख्वाब नहीं पाला। वह ताउम्र एक श्रेष्ठ तमिल राजनेता के रूप में राष्ट्रीय पटल पर छाए रहे। हालांकि वह ‘किंगमेकर’ की भूमिका में जरूर रहे। संयुक्त मोर्चा की सरकार में उन्होंने और टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू ने ही मुलायम सिंह यादव और लालू यादव के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। 

बहरहाल, करुणानिधि के जाने से जो शून्य उभरा है, उसे भर पाना काफी मुश्किल है। अब तमिलनाडु की राजनीति अपने करिश्माई नेताओं के बिना आगे बढ़ेगी। इस सूबे ने राजाजी, कामराज, अन्नादुरई, एमजी रामचंद्रन, जयललिता और अब करुणानिधि को जाते देखा है। जाहिर है, अभी यहां शून्य की जो स्थिति बन गई है, वह राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के लिए एक अवसर भी है कि वे इसे भरने की कोशिश करें। भाजपा यह लाभ उठाती है या कांग्रेस पुनर्जीवित होगी? इसका जवाब तो आने वाले दिनों में ही मिलेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Senior Journalist S Srinivasan article in Hindustan on 09 august