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केरल की आपदा के सबक

एस श्रीनिवासन

तात्कालिक राहत और बचाव-कार्यों के बाद बाढ़ से बर्बाद हो चुके केरल में पुनर्निर्माण का काम तो शुरू हो चुका है,  लेकिन इसके साथ सियासी आरोप-प्रत्यारोपों का दौर भी चालू है। राज्य के मुख्यमंत्री पी विजयन ने पड़ोसी तमिलनाडु पर तोहमत लगाई है कि उसने मुल्लापेरियार बांध से इतना ज्यादा पानी छोड़ा, कि केरल अचानक पानी में डूबने लगा। कांग्रेस की अगुवाई वाले विपक्ष ने इसकी वजह बांधों का कुप्रबंधन बताते हुए इसके लिए राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। हालांकि, राज्य बांध प्रबंधन प्राधिकरण का दावा है कि पानी निकालने के तमाम प्रयास किए गए थे, लेकिन बारिश इतना ज्यादा हो गई कि हालात बेकाबू हो गए। उधर, पारिस्थितिकी-विज्ञानी माधव गाडगिल ने अपना वही बयान दोहराया है कि बाढ़ से होने वाली बर्बादी इसलिए नहीं थामी जा सकती, क्योंकि एक के बाद दूसरी राज्य सरकारों ने सूबे को इससे बचाने का कोई बेहतर उपाय नहीं तलाशा। 

मुख्यमंत्री का यह बयान सच जान पड़ता है कि आरोप-प्रत्यारोपों का दौर और एक-दूसरे पर दोषारोपण का आलम बता रहा है कि राज्य की राजनीति अपने पुराने ढर्रे पर लौट आई है। मगर ठीक इसी वक्त यह भी जरूरी है कि सरकार ईंट-दर-ईंट पुनर्निमाण में जुटकर राज्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी का परिचय दे। मुख्यमंत्री ने ‘इस संकट को एक अवसर के रूप में लेने’ की बात कही है। अपने इन शब्दों पर यदि वह खरे उतरते हैं, तो वाकई यह नई शुरुआत की एक आदर्श स्थिति होगी। 

मुख्यमंत्री माक्र्सवादी हैं, पर उन्होंने राजनीतिक रूप से अत्यंत लचीले रुख का परिचय है। आपदा की इस घड़ी में उन्होंने विपक्ष को अपने साथ लिया और फौरी राहत के लिए केंद्र की सराहना की। हालांकि केंद्र से उन्होंने और अधिक राहत-राशि भी मांगी है। उन्होंने नुकसान का शुरुआती अनुमान लगभग 20,000 करोड़ रुपये लगाया है, जबकि केंद्र ने लगभग 600 करोड़ ही दिए हैं। वह विदेशों से सहायता लेने के पक्ष में हैं और पुनर्निर्माण के कामों में प्रोफेशनल सलाहकारों की वैश्विक कंपनी केपीएमजी की मदद भी ले रहे हैं।

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का मानना है कि यह राज्य कई कारणों से प्राकृतिक और मानव-निर्मित आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील हो चुका है। केरल पूरब में पश्चिमी घाट और पश्चिम में अरब सागर से घिरा है। आकार में यह एक संकरी पट्टी की तरह है, जो देश के दक्षिण-पश्चिम कोने में स्थित है। यहां की भूमि तीन हिस्सों में बांटी जा सकती है- उच्च भूमि, मध्य भूमि और निचली भूमि। इसमें तटीय मैदान भी शामिल हैं। यह राज्य देश के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून का प्रवेश-द्वार है, जो जून में इसके तटों से टकराता है। सितंबर से चलने वाला यह मानसून यहां लगभग 80 फीसदी बारिश करता है। बाकी पानी उत्तर-पूर्व मानसून के लौटते वक्त यहां गिरता है। 

राज्य की कुल 44 नदियों में से तीन पूरब की ओर जाती है। भौगोलिक रूप से केरल ऐसा इलाका है, जहां तटों का कटाव, बाढ़, सूखा, बिजली गिरना, भूस्खलन और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के खतरे बने रहते हैं। भले ही यह देश की सबसे कम जनसंख्या वाला राज्य हो, पर यहां जनसंख्या घनत्व सबसे अधिक है (राष्ट्रीय औसत का तीन गुना)। तमाम तरह के सामाजिक विकास के बावजूद आज भी यहां 74 फीसदी लोग गांवों में रहते हैं और बुनियादी ढांचा भी वक्त के साथ संतुलन नहीं बना सका है। केरल पर्यटन जैसे सर्विस सेक्टर और विशेषकर खाड़ी देशों में काम करने वाले यहां के लोगों द्वारा भेजे जाने वाले पैसे पर काफी हद तक निर्भर है। 

मुख्यमंत्री का कहना है कि इस बार सदी की यह सबसे ज्यादा बारिश ही थी कि हर मुमकिन प्रयास के बाद भी हालात संभाले नहीं जा सके। बांधों के कुप्रबंधन के आरोपों को खारिज करते हुए वह कहते हैं कि बांधों के उचित रखरखाव के कारण ही तमाम जिंदगियां बचाई भी गई हैं। वैसे, सरकारी प्रयासों के अलावा मछुआरों व अन्य आम लोगों के अदम्य साहस और परस्पर सेवा भाव ने भी तमाम जानें बचाने में मदद की। केरलवासियों को अपनी इस संस्कृति पर गर्व है। संकट की घड़ी में इस राज्य ने जिस तरह साथ खड़े होकर इस आपदा का सामना किया है, वह परस्पर सहयोग की नई मिसाल है। 

अब जबकि सूबे में राजनीतिक नूराकुश्ती जारी है, यह आपदा की वजहों के अध्ययन का बढ़िया मौका भी है। यह भविष्य के लिए सुरक्षात्मक कदम की तलाश का अवसर भी दे रहा है, जिसका लाभ सिर्फ केरल नहीं, पूरे देश को मिल सकता है। यह वक्त जरूर जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करने का है, लेकिन गाडगिल रिपोर्ट पर भी ध्यान देने की जरूरत है, जो स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन की राह दिखाती है। एक साक्षात्कार में माधव गाडगिल ने राज्य में ‘जलाशयों के अत्यंत खराब प्रबंधन’ के लिए केरल सरकार की जमकर मलामत की और माना कि ‘तमाम तरह के निर्माण-कार्यों’ और बांधों से अचानक व भारी मात्रा में पानी छोड़ना विनाशकारी बन गया। अपनी विस्तृत रिपोर्ट में उन्होंने लगातार संवेदनशील होते गए पश्चिमी घाटों का जिक्र भी किया है। हालांकि वे इस बात से आशान्वित भी हैं कि केरल भविष्य में सतत विकास का अगुवा बन सकता है। वह स्थानीय विकास में स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने के साथ ही अत्यधिक खनन से बचने, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा व निर्धारित संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा के लिए वैकल्पिक तरीके अपनाने के पक्ष में भी हैं।

दिलचस्प है कि राज्य सरकार का अपना आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भी ऐसी चंद सिफारिशों की बातें करता रहा है। उसने न सिर्फ यह बताया है कि भूस्खलन के लिहाज से घाट कमजोर हो गए हैं, बल्कि आपदा के लिहाज से संवेदनशील इलाके चिह्नित भी किए हैं। उसने सुरक्षात्मक और बचाव के तरीके भी बताए हैं।

केरल की गिनती भले ही बेहतर गवर्नेंस वाले राज्यों में होती रही है, लेकिन यह भी सही है कि इसकी कमजोरी इस तरह पहले कभी उजागर नहीं हुई। लिहाजा यही उचित वक्त है कि सरकार न सिर्फ अपनी एजेंसियों की रिपोर्ट पर गौर करे, उनकी सिफारिशों को जमीन पर भी उतारे। ताकि भविष्य में ऐसी किसी प्राकृतिक आपदा में जान-माल के भारी नुकसान को हम पूरी तरह रोक भले न सकें, कम तो कर ही पाएं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Senior Journalist S Srinivasan article in Hindustan on 04 September