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एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी की दास्तान

रामचंद्र गुहा प्रसिद्ध इतिहासकार

एडवर्ड सईद हमारी पीढ़ी के भारतीय बुद्धिजीवियों के नायक रहे हैं। एक युवा वामपंथी के नाते पूर्व पर लिखने वाले पश्चिमी विद्वानों पर उनके हमले हमें ऊर्जा देते थे। तीसरी दुनिया के देशों का समर्थक होने के नाते इजरायली अपराधों की निंदा और फलस्तीनियों के प्रति एकजुटता का उनका पक्ष हमें प्रभावित करता था। मेरे कुछ दोस्त सईद के प्रति आजीवन समर्पित रहे, हालांकि मेरा मोहभंग होने लगा था। सईद से दूर जाने के पीछे वेरियर एलविन की बायोग्राफी की भी बड़ी भूमिका रही। वही एल्विन, जो एक औपनिवेशिक बिशप के बेटे थे, जो बाद में महात्मा गांधी के अनुयायी और नेहरू के दोस्त बने। वह आदिवासियों के बीच उन्हीं का होकर रह गए।

मेरे दोस्तों की नजर में सईद ‘सच्चाई को सत्ता’ मानने वाले एक ऐसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी थे, जिनका अुनकरण होना चाहिए। वैसे, मैं न तो इतिहास की उनकी समझ से सहमत था, न उनके राजनीतिक लेखन से। मुझे वह आत्ममुग्ध ज्यादा लगे। मुझे खुद को ‘सईदवादी’ घोषित करने की होड़ भी अच्छी नहीं लगती थी। लगता था कि कहीं राजनेता भी यही करने लगे, फिर तो लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा। यदि बुद्धिजीवियों को चाटुकारिता और नायक पूजा का रोग लग गया, फिर तो विवेकशील दुनिया ही खतरे में पड़ जाएगी। 

एक दशक पहले इस महान इंसान की मौत के कुछ ही दिनों बाद मैंने सईद और सईदवादियों पर लिखा था। आज आधुनिक पश्चिमी बौद्धिक इतिहास के अप्रतिम नाम और जर्मन दार्शनिक-समाजशास्त्री युर्गन हैबरमास की नई जीवनी पढ़ते हुए सईद फिर याद आ रहे हैं। किताब हैबरमास को कुछ इस तरह उद्धृत करती है- ‘बौद्धिकों के पास इतनी सामथ्र्य होनी चाहिए कि अपनी बात कह सकें, लेकिन प्रतिक्रिया की सीमाओं का अतिक्रमण न करने का धैर्य भी होना चाहिए।’ यह सच है कि एक अन्यायपूर्ण और भेदभाव वाली दुनिया में किसी बौद्धिक को ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन उन्हें प्राथमिकताएं याद रहनी चाहिए।

 हैबरमास की यह बायोग्राफी कभी उनके छात्र रहे और अब ओडनबर्ग यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर स्टीफन मुलर-डूम ने लिखी है। खासे शोध के बाद लिखी गई यह बायोग्राफी श्रमसाध्य तो है ही, बौद्धिक अवदान पर पूरी तरह फोकस होने के बावजूद उनके निजी पक्ष की अनदेखी नहीं करती। 1929 में जन्मे हैबरमास द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के वक्त महज 16 साल के थे। नाजी सेना में जबरन शामिल करने के लिए यह उम्र छोटी रही हो, लेकिन हिटलर की भयावहता के लिए वह पर्याप्त बडे़ हो चुके थे। 

मिलर ने हैबरमास की प्रमुख किताबों के साथ उनके महत्वपूर्ण भाषणों और अखबारी लेखन पर भी बारीकी से काम किया है। वह उनके निजी जीवन व दार्शनिक झुकाव के कई दिलचस्प तार भी जोड़ते हैं। मसलन, शुरुआत में ही तालू का विकार दूर करने के लिए हुए कई ऑपरेशनों से इंसानी रिश्तों की बारीकी, या बचपन के अनुभवों से और भी बहुत कुछ सीखना। 

हैबरमास देशभक्त हैं, लेकिन अंध-राष्ट्रवादी नहीं। विश्व युद्ध बाद के पश्चिम जर्मनी के लोकतांत्रिक मूल्यों व योजनाओं के प्रति समर्पित हैं, मगर जरूरत पड़ने पर नीतियों और नेताओं की आलोचना करने से नहीं चूकते। मध्यमार्गी वामपंथी होने के कारण चरमपंथियों का निशाने बने। सत्तर के दशक में तो वामपंथी जर्मनों पर देशविरोधी होने का आरोप लगाकर हमलों का ही दौर-दौरा चल पड़ा था। कंजरवेटिव आलोचक तो माओवादी क्रांतिकारियों और हैबरमास सरीखे सोशल डेमोक्रेट्स में घालमेल करने से बाज नहीं आते थे। हैबरमास ने इस पर लिखा-‘यदि बाएं बाजू के बुद्धिजीवियों को इस वक्त आंतरिक दुश्मन घोषित किया गया है, और उन्हें सार्वजनिक मानहानि के जरिए नैतिक तौर पर अलग-थलग किया जाता है, तो क्या यह हमारे बौद्धिकों के उस समूह को कमजोर करना नहीं होगा, जो वक्त जरूरत हमारी राजनीति के उस अतिवाद की आलोचना करते हैं, जो लोकतंत्र के लिए खतरा बनने लगता है’। ये शब्द भारत के वर्तमान के आस-पास दिखते हैं।

1995 में एक इतालवी  साप्ताहिक ल’एक्सप्रेसो ने हैबरमास का साक्षात्कार छापा था। उनसे पूछा गया- ‘आज आपके लिए जर्मन होने का क्या मतलब है?’ हैबरमास का जवाब था- ‘याद रखिए, सौभाग्यशाली तारीख 1989 (जब सोवियत साम्राज्य का पतन हुआ) हमें 1945 की उस तारीख की याद दिलाती है, (जब नाजीवाद अंतत: परास्त हुआ था)।’ आज भारतीय लोकतंत्र के लिए शायद 1977 और 1980 प्रासंगिक हो गए हैं। वह तारीख याद रखनी चाहिए, जब एक लोकतांत्रिक गठबंधन ने इंदिरा गांधी की सत्ता को धराशाई किया, लेकिन उस तारीख को भी नहीं भूलना चाहिए, जब 1980 में वही गठबंधन भरभराकर गिरा और इंदिरा गांधी की वापसी का रास्ता फिर खुला।
किताब पढ़ते हुए ऐसी ही एक जीवनी अमत्र्य सेन की भी देखने की इच्छा हो रही है। इन दोनों में अद्भुत समानताएं हैं। हैबरमास अपने तालुओं के विकार से लेकर नाजीवाद का पतन तक देखते हैं, तो सेन के पास कैंसर को हराने से लेकर विभाजन की त्रासदी के अनुभव हैं। दोनों की अपने देश में ही नहीं, विदेश में भी समान प्रतिष्ठा है। दोनों अपने-अपने देश में अतिवादी हमले भी झेलते हैं और प्रशंसकों की बड़ी फौज भी है।

कुछ अंतर भी हैं। हैबरमास एक दार्शनिक से समाजशास्त्री बने, तो सेन एक अर्थशास्त्री से दार्शनिक बन गए। यहां सामाजिक भेद भी हैं। हैबरमास ने हमेशा जर्मनी में काम किया, सेन ने अधिकांश वयस्क जीवन मातृभूमि से बाहर बिताया। हैबरमास के पास नोबेल पुरस्कार भी नहीं है, हालांकि अन्य बडे़ पुरस्कार  हैं।

स्टीफन मुलर-डूम की जीवनी में कोई कमी है, तो वह है इसका भक्ति भाव। शायद हैबरमास का छात्र और एक ही देश का होना इसका कारण हो। मैं भी अमत्र्य सेन को लंबे समय तक बौद्धिक योगदान देते देखना चाहता हूं। उनके लिए एक अत्यंत योग्य ऐसा जीवनीकार भी ढूंढ़ना चाहूंगा, जो दर्शनशास्त्र से परिचय के साथ अर्थशास्त्री तो हो, मगर सेन का छात्र और बंगाली न हो। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Ramchandra Guha Article in Hindustan on 07 September