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इस बार दावोस इतना अहम क्यों है

पुष्परंजन, संपादक, ईयू-एशिया न्यूज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्व आर्थिक फोरम के उद्घाटन के अवसर पर आज बीज वक्तव्य देंगे। वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) के ग्लोबल प्रमुख (प्रोग्रामिंग) ली हॉवेल ने एक पते की बात कही है कि ‘इस बार सम्मेलन में आए शासन प्रमुख बोलें कम और लोगों की सुनें ज्यादा।’ प्रधानमंत्री मोदी के बीज वक्तव्य से आरंभ इस पांच दिवसीय सम्मेलन का समापन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषण से होगा। बीच में ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे, फ्रांसीसी राष्ट्रपति एम्मैनुएल मैक्रों, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जिम्बॉब्वे के नए नेता इमर्सन म्नांगाग्वा, ऑक्सफैम की डायरेक्टर विनी व्यापइमा, शरणार्थियों की आवाज बनीं काटे ब्लांचेट, अमेरिका के पूर्व उप-राष्ट्रपति अल गोर, इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कन्फेडरेशन की महासचिव शारोन बर्रो, और नोबेल विजेता मलाला युसूफजई बोलेंगी। सोचिए, इनमें से कौन कम बोलने वालों में से हैं, जो विश्व आर्थिक फोरम के ग्लोबल प्रमुख की नसीहत पर ध्यान देंगे?

इस आर्थिक महाकुंभ का मूल विषय कार्बन मुक्त अर्थव्यवस्था है, मगर दुनिया भर से जो एक हजार प्राइवेट जेट यहां उतरे हैं, उनसे स्विट्जरलैंड की स्वच्छ आबोहवा का क्या हाल हुआ है, यह गौर करने लायक बात है। उद्योगपतियों के साथ-साथ करीब 30 देशों के मजदूूर संघों के नेता, सामाजिक आंदोलनों व महिला अधिकार समूहों के प्रतिनिधियों के जमावड़े से यूरोप के इस ऊंचे स्थान का हाल धरती पर स्वर्ग जैसा नहीं रह जाता है। 

मात्र 11,000 की आबादी वाले दावोस में उससे दोगुनी जनसंख्या पांच दिनों के लिए पहुंच जाएगी, ऐसी कल्पना 47 साल पहले नहीं की गई थी। साल 1971 में जेनेवा यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे जर्मन प्रोफेसर क्लाउस श्वाब ने सबसे पहले दावोस में ‘यूरोपीयन मैनेजमेंट फोरम’ की आधारशिला रखी थी। उस परिसंवाद में पश्चिमी यूरोप के 444 बिजनेस एग्जक्यूटिव आए थे। कालांतर में क्लाउस श्वाब ने इसका फलक अमेरिकन बिजनेस एग्जक्यूटिव के लिए भी खोला और देखते-देखते ही यह संस्था वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) में बदल गई। मगर क्या दावोस स्की रिजॉर्ट इस आर्थिक महाकुंभ के लिए अब छोटी नहीं पड़ने लगी? शायद, इस पर कभी सवाल उठे। 

हर साल एक नए लक्ष्य के साथ डब्ल्यूईएफ की बैठक आगे बढ़ती रहती है। ठीक वैसे ही, जैसे स्कीइंग के खेल में पीछे मुड़कर देखना नहीं होता है। मगर क्या साल भर में उस लक्ष्य की पूर्ति हो जाती है? दावोस है भी स्कीइंग के लिए दुनिया भर में मशहूर। 2017 में डब्ल्यूईएफ को जब शी जिनपिंग संबोधित कर रहे थे, तब उनके विचारों से अमेरिकी सदर की टकराहट साफ-साफ दिखाई दे रही थी। शी का लक्ष्य ‘वन बेल्ट वन रोड’ की महत्वाकांक्षा को पूरा करना रहा है, वहीं ट्रंप चाहते हैं कि विश्व व्यापार को ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप’ की तरफ ले जाया जाए। शी ‘वन बेल्ट वन रोड’ की अपनी अवधारणा को मूर्त रूप देने के वास्ते 50 अरब डॉलर से अधिक राशि गला चुके हैं। 56 सदस्यीय ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक’ को मजबूत करना शी का बड़ा एजेंडा है, जिसका मुख्यालय बीजिंग में है। मगर इस तरह के उद्देश्यों से अफ्रीका, सब-सहारा जैसे इलाकों का समान विकास संभव है?

साल भर में दुनिया में जो कुछ हुआ है, उससे विखंडन की स्थिति बनी है। पहले यूरोप सीरिया के कारण बड़े पैमाने पर घुसपैठ और शरणार्थी-समस्या को झेल रहा था, इस बार दक्षिण-पूर्व एशिया रोहिंग्या शरणार्थियों के कारण लगभग वैसी ही स्थिति से रूबरू है। यह दावोस में बहस का विषय हो सकता है। ट्रंप प्रशासन की ईरान और उत्तर कोरिया से जिस तरह से ठनी हुई है, उसने दावोस के मंच पर नाभिकीय संघर्ष से जुड़े विमर्श को दावत दे दिया है। 

अमूमन हर साल विश्व आर्थिक फोरम की बैठक से पहले ‘ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट’ जारी की जाती है। 2018 की जो रिपोर्ट आई है, वह विगत वर्षों की तुलना में अधिक चिंताजनक है। यह रिपोर्ट चार प्रमुख खतरे की ओर इशारा करती है। इसमें पर्यावरणीय दुर्दशा, साइबर सुरक्षा में सेंध, आर्थिक उथल-पुथल, और भू-सामरिक तनाव का ऐसा चित्र उकेरा गया है, जैसा पिछले दस वर्षों में देखने को नहीं मिला। दोहा राउंड के लुढ़क जाने के बाद जिस तरह की स्थिति थी, उससे विकट हालात यदि ‘ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट’ बता रही है, तो यह सचमुच दावोस सम्मेलन में भाग ले रहे महानुभावों के लिए बड़ी चुनौती है। विश्व नेताओं को इससे पार पाने का रास्ता बताना होगा।
 
यह संयोग है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह भारतीय प्रधानमंत्री भी बड़े अंतराल के बाद विश्व आर्थिक फोरम की बैठक में हिस्सा ले रहे हैं। साल 2000 में बिल क्लिंटन के बाद प्रेसिडेंट ट्रंप इसमें भाग ले रहे हैं, तो 21 साल बाद भारतीय प्रधानमंत्री। पीएम मोदी से पहले 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री देवेगौड़ा दावोस गए थे। पीवी नरसिंह राव पहले प्रधानमंत्री थे, जो 1994 में दावोस गए थे। जॉर्ज डब्ल्यू बुश व बराक ओबामा की तरह वाजपेयी और मनमोहन सिंह विश्व आर्थिक फोरम की बैठक में नहीं गए। मगर इसका मतलब यह नहीं कि भारत का विश्व आर्थिक फोरम के लक्ष्यों से सरोकार नहीं है। इस बार प्रधानमंत्री मोदी, छह मंत्री, दो मुख्यमंत्रियों सहित 20 भारतीय कंपनियों के सीईओ, फिल्म स्टार शाहरुख खान के साथ शिरकत कर रहे हैं। दावोस में पीएम मोदी का मेगा शो है, जिसमें वह 120 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ भाग ले रहे हैं।

दावोस के इस आर्थिक महाकुंभ में प्रधानमंत्री मोदी करेंगे क्या, इस पर देश ही नहीं, उनके प्रतिस्पद्र्धी शी जिनपिंग की भी नजर है। आमतौर पर प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरे का केंद्रीय विषय ‘निवेश’ होता है। ‘मेक इन इंडिया’ को प्रोत्साहित करने, ‘स्किल इंडिया’ के तहत भारत में कौशल हासिल कर चुके युवाओं को विदेश में काम के अवसर कैसे मिलें, यह भी प्रधानमंत्री की दावोस यात्रा का एजेंडा है। अगले साल आम चुनाव होने हैं। ऐसे में, दावोस जैसे मंच की उपलब्धियों को कोई भी प्रधानमंत्री अपनी घरेलू राजनीति में भुनाना चाहेगा। मगर ‘ऑक्सफैम’ ने इसी रविवार को सर्वे रिपोर्ट में जानकारी दी है कि 67 करोड़ भारतीयों की माली स्थिति में मात्र एक फीसदी का सुधार हुआ है। यह चिंताजनक बात है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Pushparanjan article in Hindustan on 23 january