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माहौल बदलने की एक बाजी

प्रियंका गांधी

1 / 2प्रियंका गांधी

आरती आर जेरथ वरिष्ठ पत्रकार

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पार्टी महासचिव बनाकर कांग्रेस ने प्रियंका गांधी की उस भूमिका को ही औपचारिक जामा पहनाया है, जो वह पिछले कई वर्षों से निभाती आई हैं। परदे के पीछे उनकी राजनीतिक सक्रियता किसी से छिपी नहीं है। हाल-फिलहाल ही, 2017 में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठजोड़ हुआ था, तो उसमें उनकी बड़ी भूमिका निकलकर सामने आई थी। राहुल गांधी की मुख्य राजनीतिक सलाहकार तो वह मानी ही जाती हैं। इसीलिए सक्रिय राजनीति में उनका उतरना उतना नहीं चौंकाता, जितना कि इस वक्त उन्हें पार्टी महासचिव का पद और पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपना कौतुहल पैदा करता है।
किसी भी चुनाव में माहौल का बनना काफी अहम माना जाता है। प्रियंका को जिम्मेदारी सौंपकर कांग्रेस ने अपने पक्ष में यही हवा बनाने की कोशिश की है। पार्टी ने जता दिया है कि उसका ध्यान खासतौर से पूर्वी उत्तर प्रदेश पर है। कांग्रेस की यह रणनीति गलत भी नहीं जान पड़ती। 2009 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को उत्तर प्रदेश में 21 सीटें मिली थीं, जिनमें से ज्यादातर पूर्वी उत्तर प्रदेश, विशेषकर अवध क्षेत्र से आई थीं। तब ब्राह्मण, कुर्मी, गैर-जाटव दलित और मुस्लिम का जातिगत समीकरण कांग्रेस के पक्ष में गया था। कांग्रेस इसी समीकरण को फिर से साधना चाहती है। प्रियंका गांधी का ब्राह्मणों पर खासा प्रभाव है, क्योंकि लोग उनमें इंदिरा गांधी की छवि देखते हैं। ऐसे में, यदि वह उच्च जाति के वोटों को मुस्लिम और गैर जाटव दलित मतों के साथ जोड़ सकीं, जिसमें वह सफल भी हो सकती हैं, तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस जीत का ठोस समीकरण तैयार कर लेगी। हो सकता है कि पार्टी 2009 का इतिहास न दोहरा पाए, क्योंकि वह एक अप्रत्याशित जीत थी, तब भी दसेक के करीब सीटें वह जरूर जीत सकती है, जो पार्टी में नई जान फूंकने के लिए काफी होगा। कांग्रेस तब यह संदेश देने में कामयाब हो जाएगी कि उत्तर प्रदेश का मतलब सिर्फ समाजवादी पार्टी (सपा) या बहुजन समाज पार्टी (बसपा) नहीं है। यह बहुत हद तक ‘इंदिरा 2.0’ के साकार होने जैसा होगा।
सूबे के इस त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा को जितना नुकसान होगा, उतना सपा और बसपा गठजोड़ को नहीं होगा। उत्तर प्रदेश मुख्यत: चार हिस्सों में बंटा है, और सभी इलाकों का अपना-अपना जातिगत समीकरण है। अवध में मायावती ज्यादा मजबूत नहीं हैं, क्योंकि वहां जाटवों की आबादी बहुत कम है। साल 2007 के विधानसभा चुनावों में बसपा को यहां से इसलिए सीटें मिली थीं, क्योंकि ब्राह्मण मायावती के साथ थे। अब वह स्थिति नहीं है। समाजवादी पार्टी के लिए भी यह इलाका तब तक मजबूत था, जब तक बेनी प्रसाद वर्मा सक्रिय थे। वह पार्टी के लिए कुर्मी और मुसलमानों के वोट जुटाते थे। मगर अब ऐसा नहीं है। इसीलिए यदि कांग्रेस ब्राह्मणों के वोट में सेंध लगा सकी, तो नुकसान भारतीय जनता पार्टी को होगा, क्योंकि वह उच्च वर्ग की ही पार्टी मानी जाती है। 
यही वजह है कि भाजपा ने इस नियुक्ति पर त्वरित और तीखी प्रतिक्रिया दी है। राहुल गांधी पर ‘फेल’ होने की तोहमत भी लगाई जा रही है, जबकि हाल ही में तीन बड़े प्रदेशों में उनके नेतृत्व में ही कांग्रेस ने जीत हासिल की है। अब संभव है कि भाजपा रॉबर्ट वाड्रा का मसला आक्रामकता से उठाकर प्रियंका पर निशाना साधने की कोशिश करे। यह भी हो सकता है कि रॉबर्ट वाड्रा पर एकाध मुकदमे और दर्ज किए जाएं। मगर प्रियंका इसे ‘राजनीतिक स्टंट’ बता सकती हैं। वह पिछले लोकसभा चुनावों की याद भी दिला सकती हैं, जब रॉबर्ट वाड्रा को निशाने पर लिया गया था और कहा गया था कि सत्ता में आने के बाद उन पर उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी, लेकिन अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है। 
प्रियंका की राह में एक अन्य चुनौती संगठन के स्तर पर है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा करीब-करीब मृतप्राय है। आम चुनाव में अब लगभग 90 दिन बाकी हैं। इतने कम दिनों में किसी सुस्त संगठन को फिर से खड़ा करना काफी मुश्किल काम होता है। ऐसे में, संभव है कि संगठन पर ज्यादा ध्यान देने की बजाय प्रियंका मतदाताओं में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करें। वह बहुत अच्छी प्रचारक हैं भी। उनकी भाषा बहुत अच्छी है और वह लोगों से सीधे जुड़ती हैं। उनके संबोधन में भावनात्मक शब्द कहीं ज्यादा होते हैं, जो श्रोताओं पर गहरा असर डालते हैं। मतदाताओं से संवाद कायम करने में उनकी तुलना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की जा सकती है। ऐसे में, अगर प्रधानमंत्री मोदी वाराणसी से चुनाव लड़ते हैं, तो आने वाले दिनों में प्रियंका को हम वहां कहीं ज्यादा सक्रिय होते देखेंगे। और कोई आश्चर्य नहीं कि जिस तरह 1999 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली में कांग्रेस उम्मीदवार सतीश शर्मा के पक्ष में महज एक दिन प्रचार करते हुए उन्होंने अरुण नेहरू (तब वह जनता दल के उम्मीदवार थे) के खिलाफ माहौल बना दिया था, वह इतिहास वाराणसी में भी अपने को दोहराता हुआ दिखे। 
बहरहाल, इस एक नियुक्ति से कांग्रेस ने अप्रत्याशित दांव खेला है। इससे पूरे देश और खासकर उत्तर प्रदेश की 80 सीटों का चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है। खासतौर से पूर्वी उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर कांग्रेस का अच्छा प्रभाव है। फूलपुर, इलाहाबाद, प्रतापगढ़, वाराणसी, मिर्जापुर समेत कई जिलों में कांग्रेस मजबूती से खड़ी हो सकती है। पार्टी बेशक सपा और बसपा के गठजोड़ का हिस्सा नहीं है, मगर उसने बता दिया है कि वह मुकाबले में दमखम के साथ उतरने जा रही है। ‘फ्रंट फुट’ पर उतरकर बल्लेबाजी करने की बात बतौर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कही है। उत्तर प्रदेश चूंकि महत्वपूर्ण सूबा है और कांग्रेस अध्यक्ष के पास इस राज्य में चुनावी अभियान के लिए ज्यादा वक्त नहीं होगा, इसीलिए प्रियंका गांधी को सामने करके पार्टी ने अपनी रणनीति जाहिर कर दी है। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Priyanka Gandhi Politics Entry A game changing environment article by Arti R Jerath