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छात्र वीजा की मृग-मरीचिका

हरिवंश चतुर्वेदी, डायरेक्टर, बिमटेक

फर्जी कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में दाखिले से लेकर फर्जी डिग्रियों के जुगाड़ की घटनाएं हमारे देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इस फर्जीवाड़े का एक वैश्विक कारोबार है, जो लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में अमेरिका के मिशिगन शहर में 129 भारतीय विद्यार्थियों की फर्जी वीजा घाटाले के आरोप में गिरफ्तारी से ऐसे ही तथ्य सामने आ रहे हैं। आश्चर्य है कि यूनिवर्सिटी ऑफ फार्मिंग्टन के नाम से कानूनी तौर पर एक यूनिवर्सिटी खोलने के फर्जीवाड़े में खुद अमेरिका की होमलैंड सिक्युरिटी एजेंसी एचएसआई के अधिकारी शामिल थे।
दरअसल, मिशिगन नगर स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ फार्मिंग्टन में यह घोटाला 2017 से ही जारी था। इसे एचएसआई के अधिकारी एक स्टिंग ऑपरेशन के रूप में चला रहे थे और अपना परिचय इस फर्जी यूनिवर्सिटी के अधिकारी के रूप में दे रहे थे। चूंकि यह एक फर्जी यूनिवर्सिटी थी, इसलिए इसमें फैकल्टी के होने और कक्षा संचालन का इंतजाम नहीं था। यहां पर विदेशी विद्यार्थी मोटी फीस देकर दाखिला लेते थे, जिससे उन्हें एफ-1 स्टूडेंट वीजा मिल सके। गौरतलब है कि एफ-1 वीजा मिलने पर विदेशी विद्यार्थी को अमेरिका में सीपीटी नाम से वर्क-परमिट मिल जाता है। कहा जा रहा है कि इस यूनिवर्सिर्टी में सैकड़ों विदेशी विद्यार्थियों ने इस उम्मीद में दाखिला लिया था कि उन्हें मोटी फीस देकर एफ-1 वीजा मिल जाएगा और वे अमेरिका में नौकरी करके अच्छा पैसा कमा सकेंगे। जिन 129 भारतीय विद्यार्थियों को गिरफ्तार किया गया है, उनमें से ज्यादातर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के तेलुगुभाषी युवा हैं। यूं तो भारतीयों के अमेरिका जाकर पढ़ने, नौकरी करने और वहीं बस जाने की एक पुरानी परंपरा रही है, किंतु आंध्र-तेलंगाना क्षेत्र में यह प्रवृत्ति एक महामारी की तरह फैलती जा रही है।
हैदराबाद और आसपास के शहरों में आपको जगह-जगह ऐसे एजेंट या दलाल मिल जाएंगे, जो मोटी फीस लेकर तेलुगुभाषी युवाओं को अमेरिकी स्टूडेंट वीजा दिलवाने की कोशिश में जुटे होते हैं। अमेरिका जाने की जिद और पागलपन का एक नमूना यह है कि हैदराबाद में बाकायदा एक वीजा मंदिर है, जहां पहुंच भक्त वीजा की मनोकामना पूरी करने के लिए पूजा करते हैं। यह सचमुच शर्म की बात है कि इन 129 विद्यार्थियों को जिन दलालों ने फर्जी दाखिले के जाल में फंसाया, वे तेलुगुभाषी भारतीय हैं। विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास को राजनयिक चिट्ठी लिखकर इन विद्यार्थियों की गिरफ्तारी पर अपना रोष जताया है और यह मांग की है कि अमेरिकी अधिकारी उनके साथ बुरा सुलूक करना तुरंत रोकें। भारत का कहना है कि इस फर्जीवाड़े में शामिल एजेंटों या दलालों जैसी कार्रवाई विद्यार्थियों के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए।
भारतीय शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों में इस बात पर रोष है कि अमेरिकी सरकार की नाक के नीचे फर्जी यूनिवर्सिटियां चलाई जा रही हैं; मासूम विदेशी विद्यार्थियों से मोटी फीस लेकर दाखिले दिलाए जा रहे हैं; क्या इसके लिए अमेरिकी सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? एक फर्जी यूनिवर्सिटी को वैधानिक अनुमति देने वाले अमेरिकी अधिकारी इसके लिए दोषी नहीं माने जाएंगे? बताया जाता है कि अमेरिका में सरकारी या निजी यूनिवर्सिटी खोलने के लिए भारत की तरह संसद या विधानसभा से कोई कानून बनाना जरूरी नहीं है। उसके कई राज्यों में यूनिवर्सिटी खोलने के लिए कुछ कागजी खानापूरी करने और लाइसेंस फीस चुकाने की जरूरत होती है। किंतु अमेरिका में किसी भी विश्वविद्यालय की साख सिर्फ सरकारी लाइसेंस न होकर एक्रेडिटेशन और रैंकिंग द्वारा निर्धारित होती है। जागरूक अमेरिकी मध्यवर्ग इन फर्जी यूनिवर्सिटियों के जाल में आसानी से नहीं फंसते, किंतु अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका से लाखों निर्दोष विद्यार्थी इनके शिकार बन जाते हैं।
इस तरह की कई घटनाएं हो चुकी हैं। वर्ष 2011 में कैलिफोर्निया की ट्राई वैली यूनिवर्सिटी में भी बहुत से भारतीय विद्यार्थियों के वीजा रद्द कर दिए गए थे। उनके पासपोर्ट भी जब्त कर लिए गए थे और उनकी टांगों पर एंकिल मॉनीटर लगा दिया गया था। भारत से लाखों विद्यार्थी हर साल अमेरिका में दाखिले के लिए जी-तोड़ कोशिश करते हैं। इनमें से करीब डेढ़-दो लाख को ही अच्छी यूनिवर्सिटियों या कॉलेजों में दाखिला मिल पाता है। अमेरिका में दाखिले की चाहत रखने वाले विद्यार्थियों का एक बड़ा वर्ग शॉर्टकट से स्टूडेंट वीजा हासिल करना चाहता है। ज्यादातर ऐसे ही विद्यार्थी दलालों की साजिश का शिकार बनते हैं। फार्मिंग्टन व ट्राई वैली यूनिवर्सिटी जैसे प्रकरण भारत की साख के लिए नुकसानदेह हैं, खासतौर से तब, जब हम एक शक्तिशाली भारत को विश्व-स्तर पर खड़ा करने में जुटे हैं।
भारतीय विद्यार्थियों में किसी भी कीमत पर अमेरिकी डिग्रियां बटोरने या विदेश जाकर स्टूडेंट वीजा जुटाने की मृग-मरीचिका के पीछे कुछ अंतर्निहित कारण हैं, जिन पर गौर करने की जरूरत है। पहली वजह है, समाज में बढ़ रही नकारात्मक सोच, यानी किसी भी कीमत पर आर्थिक समृद्धि से जुडे़ लक्ष्य को पूरा करना। इसमें डिग्री हासिल करना और नौकरी पाना भी शामिल हैं। इसका सीधा संबंध समाज में बढ़ती हुई मूल्यहीनता से है। इसका दूसरा कारण दाखिले के लिए होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती हुई धांधली नौजवानों को हताश और निराश कर रही है। तीसरा कारण है, तीन दशकों के आर्थिक उदारीकरण के दौरान लगातार तीव्र आर्थिक विकास के बावजूद अपेक्षित रोजगार सृजन न हो पाना। चौथी वजह है, हमारी शिक्षा प्रणाली का विरोधाभास, जिसके फलस्वरूप गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सबके लिए उपलब्ध नहीं है। निजी और सार्वजनिक, दोनों क्षेत्रों में बमुश्किल 20 प्रतिशत संस्थाओं की गुणवत्ता प्रामाणिक है और विद्यार्थियों को उनके भावी जीवन के लिए समर्थवान बनाती हैं। शेष 80 प्रतिशत संस्थाएं औसत या खराब क्वालिटी की शिक्षा ही दे पा रही हैं।
फार्मिंग्टन और ट्राई वैली जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए हमें ऐसी नीतियां अपनानी होंगी, जिनसे रोजगार के मौके तेजी से बढ़ें और शिक्षा की गुणवत्ता हर स्तर पर सुनिश्चित हो सके। देश के अंदर ही सबको अच्छी शिक्षा मिले, तो उन्हें विदेश जाकर शर्मिंदगी उठाने से बचाया जा सकेगा। भविष्य में उसी देश की जीत होगी, जिसके पास अच्छी प्रतिभाएं होंगी, इसीलिए भी युवा प्रतिभाओं का पलायन हमें रोकना होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 9 february