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विश्व कप की बूस्टर खुराक है यह जीत

अगर निगाह मंजिल पर हो और सोच सकारात्मक, तो सफलता कदम चूमती ही है। टेस्ट सीरीज में ऑस्ट्रेलिया पर टीम इंडिया की जीत का अंदाज कुछ यही है। इस जीत का पूरा श्रेय विराट कोहली और उनकी टीम को जाता है। भारतीय कप्तान की नजर ‘बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी’ पर थी। वह हर कीमत पर जीत हासिल करना चाहते थे। विराट कोहली को बेशक एक ‘अग्रेसिव’ खिलाड़ी कहा जाए, पर यही उनका मिजाज है। उन्हें अपने तरीके से क्रिकेट खेलना पसंद है और यही हर क्रिकेटर की चाहत होती है। कोई अपनी शैली नहीं बदलना चाहता। विराट कोहली ने पहले की गलतियों पर गंभीरता से काम किया, जिसका नतीजा यह निकला कि भारतीय टीम एशिया की ऐसी पहली टीम बन गई है, जिसने ऑस्ट्रेलिया की जमीन पर टेस्ट सीरीज अपने नाम की।
तर्क दिए जा रहे हैं कि इस बार कंगारू ज्यादा मजबूत नहीं थे। इसके पक्ष में पिछले सात दशकों के आंकड़े परोसे जा रहे हैं। मगर मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूं। अपने घर में ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी हमेशा काफी मजबूत होते हैं। उन्हें स्थानीय माहौल और मौसम का मिजाज मालूम होता है। घरेलू परिस्थितियों का फायदा उठाकर मेहमान टीम को बैकफुट पर धकेलने में उन्हें महारत हासिल है। लिहाजा उन पर जीत हासिल करना काफी मुश्किल होता है। मगर टीम इंडिया ने बता दिया कि ‘टीम वर्क’ किस कदर सफलता दिला सकता है।
भारत ने इस बार कमजोर कड़ियों पर काफी काम किया। मसलन, ओपनिंग जोड़ी ठोस शुरुआत नहीं दे पाती थी। लेकिन इस बार मयंक अग्रवाल ने मजबूती से कदम बढ़ाए। चेतेश्वर पुजारा ने भी उनका पूरा साथ दिया। पुजारा ने तो इन चार टेस्ट मैचों में तीन शतक जड़े। अभी तक उन्हें एक अच्छा खिलाड़ी माना जाता था, मगर इन शतकों के बाद अब उनका कद बढ़ गया है। ऑस्ट्रेलिया की मिट्टी पर तीन-तीन शतक जमाना कोई आसान काम नहीं। भारतीय टीम के पिछले ऑस्ट्रेलिया दौरे (24 नवंबर, 2014 से 10 जनवरी, 2015) को याद कीजिए। तब विराट कोहली ने टेस्ट मुकाबलों में तीन शतक मारे थे और वह एक अलग मुकाम पर पहुंच गए थे। पुजारा भी अब इसी श्रेणी के खिलाड़ी बन गए हैं। हालांकि टीम इंडिया की बल्लेबाजी सिर्फ मयंक अग्रवाल और चेतेश्वर पुजारा के आसपास नहीं रही, ऋषभ पंत, अजिंक्य रहाणे, हनुमा विहारी जैसे तमाम खिलाड़ियों ने उम्दा खेल दिखाया। जब टीम मिलकर अच्छा प्रदर्शन करती है, तो जीतने के मौके बढ़ते ही हैं।  
अच्छी बात यह भी रही कि हमारी तेज गेंदबाजी में भी संतुलन दिखा। जसप्रीत बुमराह, ईशांत शर्मा और मोहम्मद समी को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए। क्रिकेट का उसूल है कि जिस तरह स्कोर बोर्ड पर अच्छे रनों के लिए शुरुआती बल्लेबाजी मायने रखती है, उसी तरह ओपनर गेंदबाज अपना औचित्य साबित करके विपक्षी टीम को बैकफुट पर डालते हैं। शुरुआती विकेट मिलने से सामने वाली टीम खुद-ब-खुद दबाव में आ जाती है, जिसका फायदा गेंदबाजी करने वाली टीम को मिलता है। बल्लेबाज तो निश्चित तौर पर रन बनाते हैं, लेकिन गेंदबाजों को यदि रन मिल जाएं, तो वे किसी न किसी तरीके से मैच बचा ही लेते हैं। अभी भारतीय गेंदबाजी में जिस तरह का संतुलन दिख रहा है, उस आधार पर कहा जा सकता है कि मौजूदा टीम विश्व की सर्वश्रेष्ठ टीम है। 
70 साल के बाद ऑस्ट्रेलिया को उसी के घर में हराने का हमें कई तरह से फायदा होगा। सबसे बड़ी बात यह कि हमें मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल होगी, जो आने वाले वक्त में हमें और मजबूती देगी। अभी हमें ऑस्ट्रेलिया के साथ वनडे खेलना है, फिर टीम इंडिया न्यूजीलैंड जाएगी और उसके बाद ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी भारत आएंगे। इन तमाम मुकाबलों में हम मानसिकता की जंग में सामने वाली टीम से बीस साबित होंगे। यह जीत मई के आखिरी दिनों में शुरू हो रहे विश्व कप के लिए भी हमारी बड़ी खुराक साबित होगी। एक लिहाज से अब विश्व कप की तैयारी अंतिम चरणों में कही जा सकती है। यह जीत सकारात्मक संकेत है कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि यह अभी दावा नहीं किया जा सकता कि इंग्लैंड (विश्व कप के मैच यहीं होंगे) की आबोहवा में कौन-कौन से खिलाड़ी मुफीद होंगे? लेकिन जिस तरह का खेल हमारे खिलाड़ी दिखा रहे हैं, उससे यही उम्मीद है कि विश्व कप के लिए भारत से एक अच्छी टीम जाएगी। मुकाबले के मुताबिक टीम बनाना एक मुश्किल काम जरूर होता है, मगर जब टीम बन जाती है, तो राहें काफी आसान हो जाती हैं। 
नए खिलाड़ी आगामी मुकाबलों में निश्चय ही बढ़िया प्रदर्शन करेंगे। मौजूदा टीम में शामिल खिलाड़ियों की औसत उम्र 25-28 साल है, जो काफी अच्छी मानी जाती है। इस उम्र में खिलाड़ियों में ऊर्जा का एक अलग स्तर होता है। वे खेल-दर-खेल अनुभव अर्जित करते हैं और खुद को प्रासंगिक बनाते जाते हैं। यहां खासतौर से ऋषभ पंत का जिक्र किया जाना चाहिए, जिनमें काफी संभावनाएं देखी जा सकती हैं। यह एक ऐसा खिलाड़ी है, जो मैच का रुख बदल सकता है, खासतौर से इन्हें मध्य क्रम का होनहार खिलाड़ी माना जाना चाहिए। भले ही ऋषभ अभी वनडे टीम का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन उम्मीद यही है कि टीम के चयनकर्ता उन पर अपना भरोसा जरूर दिखाएंगे। बेहतर खिलाड़ियों के लिए टीम में जगह बनाना भी तो उन्हीं का काम है। 
विश्व कप से भारत को इसीलिए भी ज्यादा उम्मीदें हैं, क्योंकि हमारा ‘बैक बेंच’ काफी मजबूत है। फिर हमारे यहां क्रिकेट का संस्थागत ढांचा काफी अच्छा है। हमारे खिलाड़ी रणजी जैसे मुकाबले खेलते हैं। ट्वंटी-20 जैसा फॉर्मेट हमारे पास है। इन सबके कारण कई खिलाड़ी उभरकर सामने आते हैं। यह सही है कि सबको टीम इंडिया में जगह नहीं मिल पाती, मगर इसका यह अर्थ नहीं कि उनकी प्रतिभा पर शक किया जा रहा है। कई बार अच्छे खिलाड़ियों के लिए भी इंतजार की घड़ियां लंबी हो सकती हैं। लेकिन इसे सकारात्मक रूप में लेना चाहिए। ये सब खेल का हिस्सा होता है। अच्छे खिलाड़ी तो परदे के पीछे भी अपनी भूमिका ढूंढ़ ही लेते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 8 january