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ब्रिटेन का भ्रम, भारत के अवसर

नरेश कौशिक  बीबीसी, लंदन

अब दो महीने से भी कम समय बचा है ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के बीच तलाक में। अगर दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंचे, तो मार्च में ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो जाएगा। वैसे तो ब्रिटेन की सरकार और यूरोपीय संघ के बीच लगभग दो वर्षों की गहन वार्ता के बाद एक समझौता हो गया था, लेकिन उस करार को ब्रिटेन की संसद ने पिछले महीने भारी बहुमत से खारिज कर दिया। वह हार ब्रिटेन की संसद के आधुनिक इतिहास में सबसे बड़ी थी, जिसमें समूचे विपक्ष के साथ सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी के सांसदों ने अपनी ही सरकार के विरुद्ध वोट दिया। 
पिछले मंगलवार को संसद ने एक प्रस्ताव पारित करके प्रधानमंत्री टेरेसा मे को फिर से यूरोपीय संघ जाकर उसके साथ के समझौते पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया। लेकिन यूरोपीय संघ के नेताओं ने साफ कर दिया है कि वे पुनर्विचार के लिए तैयार नहीं हैं। इसके बाद बिना समझौते के ब्रिटेन के यूरोपीय संघ छोड़ने के आसार बढ़ गए हैं। इससे सबसे ज्यादा चिंतित है व्यापारी वर्ग। बहुत सी विदेशी कंपनियां तो पहले ही ब्रिटेन छोड़ने की चेतावनी दे चुकी थीं, अब एक ताजा सर्वे का कहना है कि हर तीन में से एक ब्रिटिश कंपनी अपना कारोबार एक हद तक देश से बाहर ले जाने की सोच रही है। व्यापारी और औद्योगिक वर्ग बार-बार कह रहा है कि इससे बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार होंगे। 
ब्रिटेन में कारोबार कर रहे भारतीय व्यापारी भी काफी चिंतित हैं। भारत की 800 से ज्यादा कंपनियां ब्रिटेन में हैं। इनमें रोल्टा, भारती एयरटेल और ऐजिस आउटसोर्सिंग जैसी कंपनियां हैं, जिन्होंने पिछले कई वर्षों में अपना व्यवसाय यहां काफी बढ़ाया है। लेकिन ब्रेग्जिट का सबसे ज्यादा असर टाटा समूह की कंपनियों पर पडे़गा, जो ब्रिटेन में लगभग 65,000 लोगों को रोजगार देती हैं। दरअसल, टाटा समूह ब्रिटेन के सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक है। आईटी और फार्मा या दवा उद्योग की भी बहुत सी भारतीय कंपनियां ब्रिटेन में हैं, जिन पर सीधा असर पड़ेगा। इनमें हजारों की तादाद में भारतीय युवक-युवतियां काम करती हैं। उनमें से काफी की नौकरियां जा सकती हैं। 
ब्रिटेन को भारतीय कंपनियां यूरोप के प्रवेश द्वार के रूप में देखती रही हैं। पुराने ऐतिहासिक रिश्तों और अंग्रेजी भाषा में सहूलियत के कारण लंदन अनेक भारतीय कंपनियों का ‘यूरोपियन हेडक्वार्टर’रहा है। ब्रेग्जिट के बाद उन्हें यह बदलना होगा। जाहिर है, इसका आर्थिक बोझ उन्हें सहना होगा। ये कंपनियां अन्य विदेशी और ब्रिटिश कंपनियों की तरह ब्रिटेन को यूरोपीय संघ के बीच देखकर ही खुश थीं। तो फिर क्या वजह है कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ को छोड़कर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार रहा है? क्यों अपने पड़ोस की सबसे बड़ी मंडी को लात मार रहा है? क्यों जान-बूझकर अपनी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाने पर आमादा है? इसे समझने के लिए हमें थोड़ा इतिहास में झांकना होगा। 
ब्रिटेन का यूरोप से झगड़ा पुराना है। मध्य युग में उसका मुख्य दुश्मन फ्रांस था। 16वीं और 17वीं शताब्दी की शुरुआत में यह स्पेन था। 17 वीं सदी के अंत से 19वीं शताब्दी के आरंभ तक फिर फ्रांस हो गया। 19वीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध में यह जार का रूस था। फिर 20वीं शताब्दी की शुरुआत और मध्य में यह पहले कैसर और फिर हिटलर का जर्मनी था। दरअसल, पहला ब्रेग्जिट तो इंग्लैंड के राजा हेनरी अष्टम ने ही किया था, जब उन्होंने रोम से संबंध विच्छेद करके स्वयं को चर्च ऑफ इंग्लैंड का अध्यक्ष घोषित कर दिया था। वही हेनरी अष्टम, जो अपनी आठ रानियों के लिए जाने जाते हैं। 
पिछले कई दशकों से ब्रिटेन का एक राजनीतिक वर्ग देश को यूरोपीय संघ से अलग करने के लिए मुहिम चला रहा है। इसमें एक महत्वपूर्ण गुट कंजरवेटिव पार्टी में है, जो वर्तमान में सत्तारूढ़ है। इस पार्टी के नेता बरसों से इस गुट को समझाने या अपने साथ करने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं। टेरेसा मे भी कोई अपवाद नहीं, जिन्होंने सत्ता में आने के बाद से इसी गुट को साथ रखने की ज्यादा कोशिश की है। 
यह गुट ब्रेग्जिट का बड़ा समर्थक है। इसे जनमत संग्रह में आम जनता को भी अपने पक्ष में लाने में सफलता मिली। फिर इस गुट को ब्रिटेन की टेबलॉयड प्रेस का पूरा समर्थन रहा है। इस प्रेस की मदद से इस गुट के नेता जनता को सुनहरे सपने दिखाते रहे हैं कि ब्रेग्जिट के बाद देश यूरोप की गुलामी से आजाद होकर बहुत तेजी से प्रगति करेगा। इनके विचार से ब्रिटेन को यूरोपीय संघ की कोई जरूरत नहीं है। उल्टे यूरोपीय संघ को ब्रिटेन की ज्यादा जरूरत है। 
ऐसे ही प्रचार के कारण बहुत से लोगों को मुगालता है कि ब्रिटेन अब भी बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय शक्ति है, जबकि सच्चाई यह है कि जल्दी ही भारत ब्रिटेन को पीछे धकेलकर पांचवीं बड़ी आर्थिक शक्ति बनने वाला है। शायद इसी भ्रम के कारण टेरेसा मे की 2016 की भारत यात्रा विफल रही थी। उन्हें लगता था कि भारत पलकों पर बिठाएगा और एक नए व्यापार समझौते के लिए झटपट तैयार हो जाएगा, लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि पहले भारतीय छात्रों और अन्य नागरिकों के वीजा मुद्दे पर बात हो, व्यापार समझौते पर बाद में चर्चा होगी। 
ब्रेग्जिट भारत के लिए एक अच्छा अवसर भी है। ब्रिटेन के लिए भारत से व्यापार समझौता एक प्राथमिकता है, जिसका लाभ हमें उठाना चाहिए। लेकिन भारत के लिए ब्रेग्जिट के बाद यूरोपीय संघ के साथ समझौता भी उतनी ही बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इस समय ईयू भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। यही समय है, जब भारत को यूरोपीय संघ के साथ एक फ्री ट्रेड समझौते पर फिर से काम करना होगा। 2007 से 2013 तक लंबी बातचीत के बाद वार्ता अटक गई थी, क्योंकि दोनों पक्ष करार की शर्तों पर सहमत नहीं हो पाए थे। लेकिन फिलहाल भारतीय आम चुनाव तक इस तरह का कोई समझौता प्राथमिकता में नहीं दिखता। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 7 february