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23 जनवरी, 2020|10:55|IST

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एनकाउंटर के स्वागत की मजबूरी 

जब-जब मासूम बच्चियों, लड़कियों या औरतों के साथ बलात्कार की खबर पढ़ती-सुनती हूं, मन परेशान हो उठता है। अब तो आए दिन ऐसी खबरें मिलने लगी हैं। निर्भया कांड के बाद जब जस्टिस वर्मा समिति की रिपोर्ट आई थी, तो हम महिलाओं में एक आशा जगी थी कि अब महिला सुरक्षा के ये नियम लागू होंगे और महिलाओं के साथ होने वाले अपराध पर ठोस लगाम लगेगी। लेकिन ज्यादा वक्त भी न बीता, वे सारे नियम धूमिल पड़ने लगे, बल्कि ऐसा लगा कि अब समाज में कानूनों का कोई प्रभाव नहीं रहा। 
सबसे दुखद पहलू तो यह है कि अब ऐसी घटनाओं को कोई एक लड़का या पुरुष अंजाम नहीं देता, बल्कि बलात्कारी समूह में उमड़ने लगे हैं। एक बच्ची या लड़की आखिर कितना सह सकती है? दुस्साहस का आलम तो यह है कि बलात्कार की ऐसी घटनाओं का कोई वीडियो बनाने लगा है और कोई उसे सोशल मीडिया पर अपलोड कर देता है। इससे सामूहिक बलात्कार की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है।
मेरा मानना है कि इस स्थिति के मूल में कहीं न कहीं हमारी वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था, बेरोजगारी, शराबखोरी की बड़ी भूमिका है। हमारी शिक्षा अब उपदेशपरक नहीं रही, वह रोजगारपरक हो गई है। बेरोजगारी ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है। कामहीन कुंठित लड़के शराब पीकर जब अपने स्मार्टफोन पर पोर्न देखते हैं, तो वे अकेली लड़की पाकर उस पर आक्रमण करते हैं। वह कोई भी लड़की या औरत हो सकती है। सवाल यह है कि अकेली लड़की इतने सारे मर्दों का मुकाबला कैसे कर सकती है? स्त्री होने के नाते हम ऐसा महसूस करते हैं, जैसे कि यह हादसा मेरी बेटी के साथ हुआ हो।  यह मर्दाना समाज समझता है या नहीं, मुझे नहीं पता।
हैदराबाद में शुक्रवार को जो हुआ, उस पर पूरे देश में खुशी मनाई जा रही है। मैंने सोशल मीडिया पर इस एनकाउंटर के लिए पुलिस को सैल्यूट किया। कई पुरुष मित्रों ने पूछा- ‘क्या आपको अपनी न्यायपालिका पर भरोसा नहीं है?’ मेरा कहना है कि न्याय-व्यवस्था ने ही हम स्त्रियों को वहां पहुंचा दिया है, जहां हम पुलिस एनकाउंटर का स्वागत करने को मजबूर हैं। कहीं से हम स्त्रियों को थोड़ा संबल मिला है, जिस पर हम संतोष कर सकें। 
यदि बलात्कारियों को तुरंत सजा मिलेगी, तो ऐसी जघन्य घटनाएं कम हो सकती हैं। यकीनन, मानवाधिकार के सवाल पर कुछ लोग इस एनकाउंटर का विरोध भी करेंगे, कर ही रहे हैं। लेकिन इसकी जवाबदेही पुलिस की होगी। हम स्त्रियां तो यही मान रही हैं कि बलात्कारी असली अपराधी थे, जिनका एनकाउंटर किया गया। 
अभी तो इस एनकाउंटर से देश की जनता खुश है। पुलिस के कथन पर वह भरोसा कर रही है। हैदराबाद की जनता पुलिस पर फूल बरसा रही है। जिस पुलिस पर जनता का विश्वास उठ गया था, उस पर उसका भरोसा लौट आया है। सामूहिक बलात्कार के बाद जलाकर मार दी गई लड़की के पिता और बहन ने भी इस एनकाउंटर का स्वागत किया है। क्यों किया है? इसलिए कि हमारी न्याय-व्यवस्था में इतनी देरी से फैसला सुनाया जाता है कि पीड़ित पक्ष को लगता है कि अब न्याय नहीं मिलने वाला, जैसे निर्भया की मां बार-बार कह रही हैं कि सात साल से कोर्ट जाते-जाते परेशान हो गई हूं। निर्भया के बलात्कारी आज भी जेल में बंद हैं और उन्हें फांसी नहीं दी गई है। कल्पना कीजिए, जिसकी बेटी बर्बरता से मार दी गई है, उस मां पर क्या गुजर रही होगी? अगर हमारी न्याय-व्यवस्था ऐसे मामले में मुस्तैदी से कदम उठाए, तो ऐसे एनकाउंटर पर खुशी नहीं मनाई जाएगी। 
असली सवाल यह है कि क्या आज देश में स्त्री सुरक्षित है? स्त्रियों से पूछिए, तो जवाब मिलेगा, नहीं। हम एक दहशत के माहौल में जी रही हैं। इस दहशत से निकलने का उपाय आखिर क्या हो सकता है? हमारी न्याय-व्यवस्था, हमारी राजनीतिक-व्यवस्था और हमारी सामाजिक-व्यवस्था कैसी है? आज देश की जो राजनीतिक-व्यवस्था है, उसे देखिए।बलात्कार, हत्या और अन्य जघन्य घटनाओं के आरोपियों को लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां टिकट दे रही हैं। और सामाजिक-व्यवस्था? परिवार से ही समाज बनता है। यहां भी हमारी लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं। आए दिन हम सुनते हैं कि किसी पिता ने अपनी बेटी के साथ या किसी रिश्तेदार ने ही फलां लड़की के साथ बलात्कार किया है। इस तरह के मामले में स्त्रियां अपने आरोपी बेटे या पति को अंत-अंत तक बचाने की कोशिश करती हैं। मैंने आज तक ऐसी कोई मां नहीं देखी, जिसने ऐसे जघन्य अपराध के कुसूरवार अपने बेटे पर कभी सवाल उठाया। ऐसे मामले सामने आने पर मां ही मामले को दबाती हुई देखी जाती हैं। यह अफसोसनाक है। पुरुष लड़की का नाम सार्वजनिक करके उसका समाज में जीना मुश्किल कर देता है। जो बलात्कार एक लड़की के लिए डर, शर्म और इज्जत का विषय है, वही लड़कों को भयभीत नहीं करता। न उसे शर्म आती है और न इससे उसकी  इज्जत को ठेस पहुंचती है। हमारे समाज का यह जो दोहरा व्यवहार है, वो गलत है। 
लोग कुछ भी कहें, मुझे लगता है कि हैदराबाद एनकाउंटर की घटना के बाद हमारी न्यायपालिका में भी ऐसे मामलों में फैसले देने में कुछ तेजी आएगी। जनता जल्दी न्याय चाहती है। ऐसे केस के आरोपियों को जमानत बिल्कुल नहीं मिलनी चाहिए। समाज में यदि अपराध है, तो उसके लिए कानून में सजा भी है। देश की महिलाओं को न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है कि यदि न्यायिक प्रक्रिया सही ढंग से चले, तो उन्हें न्याय मिलेगा। शीर्ष अदालत के कई हालिया फैसले इसकी मिसाल हैं। लेकिन फिर वही सवाल कि स्त्रियों को सुरक्षित रखने के कौन से साधन अपनाए जाएं? हमारे देश की संसद, हमारी न्यायपालिका और हमारे समाज को अब इस विषय पर गंभीरता से सोचना होगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) 

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 7 december