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पेचीदा होती पाकिस्तानी सियासत

ओपिनियन

पाकिस्तान में यह चुनावी साल है। चुनाव से पहले होने वाली सियासी उठापटक, जो दुनिया के तमाम लोकतंत्रों में दिखती है, वहां भी नजर आ रही है। पर वहां पेचीदगियां इसलिए ज्यादा हैं, क्योंकि इस उथल-पुथल में ‘नॉन पॉलिटिकल प्लेयर्स’ यानी सियासत से बाहर के खिलाड़ी भी शामिल हैं। पाकिस्तान की सियासत पर फौज का दबाव कोई छिपा तथ्य नहीं है। अब तो अदालतें भी काफी सक्रिय हो गई हैं। इतना ही नहीं, वे नवाज शरीफ और उनके कुनबे को लेकर तो सख्त हैं, मगर बाकी दलों के प्रति नरम। नेशनल अकाउंटिबिलिटी ब्यूरो भी अदालत के ही नक्शे-कदम पर है। 

ये पेचीदगियां आर्थिक व कूटनीतिक दबावों से भी बढ़ रही हैं। आर्थिक तौर पर पाकिस्तान दिवालिया होने जा रहा है। कर्ज वापसी से उसकी सांसें उखड़ने लगी हैं। उसका आयात काफी ज्यादा बढ़ गया है, जबकि निर्यात लगातार घटते जा रहे हैं। इसे सुधारने के लिए सख्त फैसले की दरकार है, मगर मौजूदा सरकार के पास इसके लिए न तो जरूरी राजनीतिक पूंजी है और न ही उसे यह करने का मौका दिया जा रहा है। हाल के महीनों में वहां रुपये की कीमत लगभग 10 फीसदी तक गिरी है। इससे आने वाले दिनों में महंगाई और तेज होगी। अमेरिका का दबाव भी बढ़ा है। लिहाजा मुमकिन है कि चुनाव के लिए आम सहमति से बनने वाली कार्यवाहक सरकार इन तमाम मसलों पर फैसला करे। उसके सक्रिय होने की वजह भी है, क्योंकि उसके पास कोई राजनीतिक मजबूरी नहीं होगी। हालांकि वह सख्त फैसले करती है, तो उसे पूरा करने का दबाव चुनी हुई अगली सरकार पर ही होगा। 

इस परिदृश्य में भी तमाम सियासी दल अपनी-अपनी रोटी सेंकने में व्यस्त हैं। मगर आम चुनाव में ऊंट मुस्लिम लीग-नवाज की तरफ ही बैठता हुआ दिख रहा है। उसका संगठनात्मक ढांचा, खासतौर से पंजाब में काफी मजबूत है, और कहा यही जाता है कि जो पंजाब जीतेगा, वही पाकिस्तान जीतेगा। नवाज शरीफ की सभाओं में भारी भीड़ का जुटना उनकी लोकप्रियता बरकरार रहने की पुष्टि करता है। प्रशासनिक मशीनरी पर भी उनकी मजबूत पकड़ है। हालांकि यह कहना अभी कठिन है कि चुनाव पूरी तरह से उनके पक्ष में होगा। असल में, ‘डीप स्टेट’ (आईएसआई व फौज के रसूखदार अधिकारियों का अनधिकृत ढांचा) जब खिलाफ हो जाए, तो लोकप्रियता मायने नहीं रखती। नवाज के साथ यही खतरा है। इतना ही नहीं, वहां जब किसी राजनेता को गलत तरीके से सत्ता से बेदखल किया जाता है, तो अगले चुनाव में उसके जीतने की संभावना काफी कम रह जाती है। पाकिस्तान के इतिहास में इसके कई उदाहरण हैं। 

अगले चुनाव में मुस्लिम लीग-नवाज भले ही बहुमत न पा सके, पर सबसे बड़ी पार्टी वही बनती दिख रही है। हां, इसके लिए नवाज कुनबे में एकता बनी रहनी चाहिए। कुछ मीडिया रिपोट्र्स बता रही हैं कि नवाज और उनके भाई शहबाज शरीफ में पार्टी पर वर्चस्व को लेकर तनाव है। हालांकि एक तबका मानता है कि यह दोनों भाइयों की सोची-समझी रणनीति है। अगर तनाव है भी, तो चुनाव तक दोनों साथ ही रहेंगे। एक साथ रहना उनकी मजबूरी भी है, क्योंकि अलग होने पर दोनों का नुकसान तय है। इसके अलावा, मुस्लिम लीग-नवाज को उन नेताओं से भी जूझना होगा, जिनकी वैचारिक निष्ठा कम है। चूंकि ‘नॉन पॉलिटिकल प्लेयर्स’ पार्टी के खिलाफ हैं, इसलिए ऐसे नेताओं में यह सोच पनप रही है कि मुस्लिम लीग-नवाज फिर से सत्ता में नहीं आएगी। वे दूसरी पार्टी का दामन थाम रहे हैं। पंजाब में ऐसा हो भी रहा है। यह भाग-दौड़ चुनाव करीब आते-आते तेज होगी। इसका अर्थ है कि नवाज शरीफ को न सिर्फ अपनी पार्टी को जोड़कर रखना होगा, बल्कि वोटरों के बीच यह संदेश भी देना होगा कि ‘डीप स्टेट’ के साथ उसके संबंध इतने खराब नहीं हुए हैं कि वे उन्हें चुनाव ही न जीतने दें। 

इन सबके बीच वहां एक नई किस्म की कट्टरपंथी इस्लामिक पार्टियां सिर उठा रही हैं। इनमें एक पार्टी है हाफिज सईद की मिल्ली मुस्लिम लीग (एमएमएल), जिसे मजाक में ‘मिलिटरी मुस्लिम लीग’ कहा जा रहा है। अमेरिका ने दो दिन पहले इस पर प्रतिबंध लगा दिया है। दूसरी पार्टी तहरीक-ए-लबैक है, जो बरेलवी मुसलमानों की है। इन दोनों पार्टियों की सियासी राह फौज और खुफिजा एजेंसियों ने आसान बनाई है। आम धारणा यही है कि इन्हें इसलिए सियासत में उतारा जा रहा है, ताकि ये राजनीति में घुल-मिल जाएं और जेहादी कार्रवाइयां बंद कर दें। मगर एक सच यह भी है कि नवाज शरीफ की लोकप्रियता कंजरवेटिव या दक्षिणपंथी सोच रखने वाले लोगों में ज्यादा है। इसलिए इनका सियासत में उतरना नवाज शरीफ को कमजोर करेगा। अपने तईं भले ही ये पार्टियां चुनाव न जीत सकें, पर जब अगले आम चुनाव में कांटे की टक्कर होने का अनुमान हो, तो इन पार्टियों का कुछ वोट काटना भी नवाज शरीफ को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है।

लेकिन क्या वाकई ऐसा होगा? पिछले एक साल के दरम्यान हुए उप-चुनावों के नतीजे इसकी तस्दीक नहीं कर रहे। उप-चुनावों में इन पार्टियों को अच्छे मत जरूर मिले, पर मुस्लिम लीग-नवाज का वोट ये नहीं काट पाए। संभवत: नुकसान पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को हुआ है, जो कमोबेश घुटने पर बैठ गई। वहां दूसरी बड़ी पार्टी इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ है। उसको भी इन पार्टियों से फायदा नहीं हुआ है। हालांकि इन दोनों पार्टियों में भी फर्क है। एमएमएल अहले हदीस या वहाबियों की पार्टी है और पाकिस्तान में वहाबी मुसलमानों की तादाद कम है। वहां दबदबा बरेलवी मुसलमानों का है, जिसकी नुमाइंदगी का दावा तहरीक-ए-लबैक करती है। तहरीक-ए-लबैक को एमएमएल की तुलना में तीन-चार गुना अधिक मत मिलते भी हैं। 

कुल मिलाकर, मुस्लिम लीग-नवाज को तहरीक-ए-इंसाफ से ही टक्कर मिलती दिख रही है। मगर तहरीक-ए-इंसाफ का संगठनात्मक ढांचा कमजोर है और जमीन पर भी वह कुछ खास करने की स्थिति में नहीं है। इन दिनों अपने उसूलों के साथ इमरान खान का समझौता करना भी पार्टी के खिलाफ जा रहा है। लिहाजा मुस्लिम लीग-नवाज ही सबसे आगे रहेगी। लेकिन वह बहुमत से दूर रह सकती है, इसलिए पाकिस्तान में त्रिशंकु नेशनल असेंबली की आहट मिल रही है। ‘डीप स्टेट’ भी यही चाहेगा, क्योंकि उसके लिए त्रिशंकु सदन पर नियंत्रण रखना कहीं ज्यादा आसान है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 7 april