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आइए, एक नई राह पर चलें

इंसान का लगातार हस्तक्षेप पर्यावरण को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा चुका है। दुनिया तेजी से धरती द्वारा निर्धारित सीमाओं से परे जाकर रहने की क्षमताओं             का विस्तार कर रही है। कुछ खबरें लगातार हमारी            नजरों के सामने आ रही हैं, जो बार-बार यह याद दिलाती हैं कि पर्यावरण के कुप्रबंधन के कारण स्वास्थ्य का           संकट बढ़ गया है और दुनिया जलवायु परिवर्तन का       दंश झेल रही है।
ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिए? अक्सर यह सवाल बहुत से लोग पूछते हैं। हम बदलाव चाहते हैं। हम चाहते हैं कि पर्यावरण की रक्षा होनी चाहिए। हम उस परिवर्तन का हिस्सा बनना चाहते हैं, जिसकी आज सख्त जरूरत है। हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि जिस हवा में हम सांस ले रहे हैं, वह प्रदूषित है और हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। हमारी नदियां सीवेज और गंदगी से बेमौत मर रही हैं। हमारे जंगलों के सामने संकट है। हमें पता है कि पर्यावरण को बचाने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे, तो हमारी धरती का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
हम यह सब जानते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर हम क्या कर सकते हैं? ऐसा क्या है, जो हम व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से कर सकते हैं? स्कूल, कॉलेज, आवासीय परिसर और कॉलोनी संयुक्त रूप से क्या कर सकते हैं? हम क्या योगदान दे सकते हैं और कैसे?
इसका जवाब है, हां, हम बदलाव ला सकते हैं। बहुत साल पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि हम जैसी दुनिया देखना चाहते हैं, उसी हिसाब से हमें खुद को ढालना होगा। निश्चय ही, आज हमें इस विचार पर अमल करना होगा। हमारी जीवन-शैली का पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। हम क्या करते हैं और कैसे करते हैं, यही महत्वपूर्ण बदलाव लाते हैं। इसीलिए हमें सबसे पहले यही समझना होगा कि हम क्या कर रहे हैं? यह जानना जरूरी है कि हम कितना पानी और कितनी ऊर्जा इस्तेमाल कर रहे हैं और कितनी पैदा कर रहे हैं? हम अपने तरीकों में बदलाव लाकर कम से कम पानी का उपयोग कर पाएंगे। साथ ही इसकी बरबादी भी कम करेंगे। धरती का सम्मान करना हमारा मूल उद्देश्य होना चाहिए। हमें बदलाव को खुद में उतारना होगा।
अब पानी का ही उदाहरण लीजिए। हमें पता है कि जहां एक तरफ पानी का संकट बढ़ रहा है और हममें से कई लोगों को साफ पेयजल भी नहीं नसीब हो रहा, वहीं दूसरी तरफ उपलब्ध पानी प्रदूषित हो रहा है। इसे देखते हुए हमें कुछ कदम उठाने की जरूरत है। सबसे पहले हमें पानी की हर बूंद को इकट्ठा करके अपने जल-स्रोतों को समृद्ध करना होगा। हम हर छत, हर फुटपाथ से वर्षा जल का संचयन कर सकते हैं। ये स्थान जलग्रहण क्षेत्र बनाए जा सकते हैं। यह काम सरकार का नहीं है। यह हमारी पहुंच के अंदर है। हर गांव, हर स्कूल, हर कॉलोनी और हर एजेंसी को वर्षा जल संचयन में अपना योगदान देना होगा और हर बूंद का महत्व समझना होगा। हमें पानी की जरूरतों को कम से कम करना होगा। शुरुआत हम पानी की बरबादी रोककर कर सकते हैं। हमें पानी को दोबारा इस्तेमाल करने के समाधान पर काम करना चाहिए। रसोईघर, बाथरूम और बगीचों में पानी के कम से कम उपयोग के तरीकों को खोजना चाहिए। 
यह भी एक तथ्य है कि कई घर, जो कथित रूप से सीवर तंत्र से जुड़े हैं, ऑनसाइट कलेक्शन सिस्टम पर निर्भर हैं। चाहे वह अच्छी तरह से डिजाइन किए गए सेप्टिक टैंक हों या कूड़े को एकत्रित करने वाले बॉक्स- वे अब भी खुले में कचरा फेंकते हैं या नाले में बहाते हैं। स्थानीय स्तर पर बेकार पानी को उपचार करने वाले तंत्र से जोड़ा जा सकता है। इससे पानी दोबारा इस्तेमाल करने लायक बन सकता है। यानी, सबसे पहले हमें बेकार पानी को साफ पानी में तब्दील करना होगा।
कूड़े के साथ भी ऐसा ही है। हमें गीले कचरे को अलग करना होगा। हमें कचरे से खाने के छिलकों, पत्तियों और अन्य गलनशील कचरे को प्लास्टिक, कांच और धातु आदि से अलग करना सीखना होगा। इसके बाद ही हमें अपने कचरे की संरचना का पता चलेगा। यह जानने के बाद हम उसका प्रबंधन कर सकते हैं। जैविक घुलनशील कचरे को ऊर्जा बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही प्लास्टिक, शीशे और धातुओं को दोबारा इस्तेमाल लायक बनाया जा सकता है। इससे अहम बात यह है कि हमें यह जानकारी हो सकेगी कि किन पदार्थों से न गलने वाला कचरा उत्पन्न होता है। यह जानने के बाद हम उनके उपयोग में कमी लाने के प्रयास कर सकते हैं। यह हमारे हाथ में है।
इसके अलावा हमें अपनी ऊर्जा की जरूरतें कम करनी होंगी। सबसे पहले हमें अनावश्यक ऊर्जा की खपत कम करनी होगी और उसका कुशलता के साथ उपयोग करना होगा। इसके बाद घरों और संस्थानों में नवीन ऊर्जा स्रोतों की बिजली का उपयोग करने की दिशा में काम करना होगा। मसलन, वर्षा जल, उपचारित सीवेज और कूड़े से बनी खाद का उपयोग सुनिश्चित करना होगा। ये छोटे-छोटे कदम संयुक्त रूप से बड़े कदम में तब्दील हो जाएंगे।
सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरन्मेंट (सीएसई) ने ग्रीन स्कूल कार्यक्रम तैयार किया है, जहां स्कूल पर्यावरण में बदलाव का उपदेश नहीं देते, बल्कि उसका अभ्यास करते हैं। इस कार्यक्रम में छात्र और शिक्षक सबसे पहले अपने स्कूल की पर्यावरण स्थिति की रिपोर्ट बनाते हैं। मसलन, स्कूल में कितना पानी है, उपयोग होने वाली ऊर्जा व वाहन और कितना कचरा व प्रदूषण उनके द्वारा होता है? इसके बाद वे अपने स्तर पर पर्यावरण फुटप्रिंट का समाधान करते हैं। ये सभी कदम निश्चित रूप से बदलाव ला रहे हैं। अगर सभी स्कूल और घर काम करने की प्रयोगशाला बन जाएं, तो ऐसे बदलाव तेजी से आगे बढ़ेंगे। हमें अपने जीवन से प्राप्त अनुभवों को आने वाली पीढ़ियों तक वक्त रहते पहुंचाना होगा। फिलहाल इसके लिए हमें बहुत लंबा सफर तय करना है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan Column on 5 june