Opinion Hindustan column on 4 december - हुआ तो इस बार भी वही DA Image
15 दिसंबर, 2019|9:06|IST

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हुआ तो इस बार भी वही

हैदराबाद में 28 नवंबर को महिला पशु चिकित्सक के साथ जो कुछ हुआ, वह दिसंबर 2012 की एक सर्द रात दिल्ली में निर्भया के साथ घटी की पुनरावृत्ति मात्र ही था। यह भी कम चिंताजनक नहीं है कि दोनों महिलाओं के साथ यह बर्बरता राजधानियों में हुई- एक देश की, और दूसरी तेलंगाना की राजधानी में। इन दोनों शहरों की पुलिस को संसाधनों के मामले में देश में अव्वल माना जाता है और दोनों क्षेत्रों की सरकारें महिलाओं के लिए इन शहरों के सुरक्षित होने का दावा करती हैं। जब तक मीडिया और नागरिक अधिकार संगठनों ने हल्ला-गुल्ला नहीं मचाया, दोनों प्रसंगों में हमें एक जैसी संवेदनहीन राजनीति और पुलिस कार्रवाई दिखी। 
ऐसा क्यों हो सका कि निर्भया कांड के बाद इतना सब कुछ होने के बावजूद हैदराबाद हो गया? निर्भया के बाद कानून सख्त किया गया और बलात्कार के मामलों में मृत्युदंड का अनिवार्य प्रावधान कानून का अंग बना। साथ ही, दूसरे कानूनी झोल दूर हुए और तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए निर्भया फंड की व्यवस्था की गई। यह अलग बात है कि विधायिका की बहसों और सूचना के अधिकार के तहत अलग-अलग स्रोतों से मिली जानकारियों से स्पष्ट है कि इस फंड का बड़ा हिस्सा या तो खर्च ही नहीं हुआ या बहुत से मामलों में उसका दुरुपयोग हुआ। स्पष्ट है, इस महान जगद्गुरु देश में वांग्मय में भले औरत को देवी घोषित कर दिया जाए, लेकिन उसे एक मनुष्य के रूप में जीने का अधिकार देने में शासक वर्ग की कोई दिलचस्पी नहीं है।
यदि निर्भया कांड के बाद तंत्र सचमुच गंभीर हुआ होता, तो यह कैसे संभव हुआ कि हैदराबाद की पीड़िता के परिजन अपनी रपट लिखाने के लिए एक से दूसरे थाने की दौड़ लगाते रहे और वह मूल्यवान समय जाया हो गया, जिसमें भाग-दौड़ करने पर कम से कम उसकी जान बच सकती थी। निर्भया के मामले में भी ऐसी ही लापरवाही हुई थी। इस बार भी नेताओं ने उतने ही गैर-जिम्मेदाराना बयान दिए। सोशल मीडिया पर लताड़े जाने पर तेलंगाना के गृह मंत्री ने अपना अविवेकी वक्तव्य वापस लिया। 
हर गंभीर प्रकरण की ही तरह यह प्रसंग भी एक विस्तृत विमर्श की मांग करता है। भारतीय पुरुषों को यह समझने की जरूरत है कि स्त्री के शरीर पर उसका अपना अधिकार है और मनु की यह व्यवस्था कि वह वय की विभिन्न स्थितियों में पिता, पति या पुत्र के अधीन होगी, एक मनुष्य विरोधी अवधारणा है। इन संस्कारों से मुक्त होने पर ही भारतीय पुरुष यह स्वीकार कर सकेगा कि बलात्कार या उसके भय से मुक्त होकर निद्र्वंद्व विचरण, पोशाक का चयन या रोजगार औरत के मौलिक अधिकार हैं। तभी बीमार मानसिकता वाले ऐसे तर्क नहीं दिए जा सकेंगे कि लड़कियां अपने कपड़ों, देर तक बाहर घूमने या लड़कों से दोस्ती के चलते खुद बलात्कार को निमंत्रित करती हैं। ये तर्क सिर्फ कम पढे़-लिखे लोगों के मुंह से ही नहीं, अक्सर भारी-भरकम डिग्रियों वालों के मुखारविंद से भी सुनने को मिलते हैं। कई बार कुछ महिलाएं भी ऐसी राय प्रकट करती दिखती हैं। सिमोन द बुआ ने लिखा था कि औरत पैदा नहीं होती, उसे बनाया जाता है। अपने प्रचलित मूल्यों से समाज उसे ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ बनाता है। भारतीय समाज तो इस मामले में ज्यादा शातिर है। वह औरत को ‘देवी’ घोषित कर देता है और इस तरह उसके इंसानी हकूक से अपना पीछा छुड़ा लेता है। एक लंबी लड़ाई के बाद ही भारतीय पुरुष को यह सिखाया जा सकेगा कि स्त्री देवी नहीं, हाड़-मांस युक्त एक मनुष्य है और हिंसा मुक्त जीवन उसका मौलिक अधिकार है। 
निर्भया से लेकर हैदराबाद की घटना तक अनगिनत मामलों में पीड़ित परिवारों को पुलिस और न्याय दिलाने वाले तंत्र की असंवेदनशीलता से जूझना पड़ा है। एफआईआर दर्ज कराने में हर बार देरी होती है और हर बार वह कीमती समय नष्ट होता है, जो किसी शिकार को शिकारियों के चंगुल से बचा सकता है या अपराधियों तक पहुंचने में पुलिस की मदद कर सकता है। हैदराबाद के मामले में कुछ पुलिसकर्मियों को हर बार की तरह निलंबित किया गया है, पर मेरा अनुभव कहता है कि हर बार की तरह कुछ महीने बाद ये सभी बिना किसी दंड या बहुत छोटी सजा के साथ बहाल कर दिए जाएंगे। क्या इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाना चाहिए कि सीआरपीसी और पुलिस रेगुलेशन में ऐसे संशोधन किए जाएं कि गंभीर मामलों में फरियादी बिना क्षेत्राधिकार के पचडे़ में उलझे किसी भी थाने को सूचित करके कार्रवाई की मांग कर सके? क्षेत्राधिकार का मसला जिले का एसपी एक निश्चित समय-सीमा के अंदर निपटाए। पुलिस रेगुलेशन में ही अंतर्निहित प्राविधान होने चाहिए कि एफआईआर दर्ज न करने वाले की न्यूनतम सजा सेवा से बर्खास्तगी होगी। हर बार शोर-शराबे के बाद ही फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना क्यों हो? इसके कानूनी प्रावधान होने चाहिए कि स्त्री हिंसा के मामले फास्ट ट्रैक अदालतों में ही सुने जाएं।
निर्भया के समय जो सवाल पूछा गया था, वही इस बार फिर से पूछे जाने की जरूरत है। क्या हैदराबाद में हुई र्दंरदगी भारतीय पुरुषों के आचरण और कानूनों में कोई बड़ा बदलाव ला सकेगी?
हमें एक सामूहिक धिक्कार की जरूरत है। चीख-चीखकर कहने की जरूरत है कि हम एक अपराधी समाज हैं, जो अपने दलितों व औरतों के साथ अमानवीय आचरण करते रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि तमाम घटनाओं की तरह हैदराबाद का शर्मनाक वाकया भी हमारी सामूहिक चेतना को अल्प अवधि तक झकझोरने के बाद कुछ दिनों में हमारी स्मृतियों से बिला जाए और हम फिर शुतुरमुर्ग की तरह दोषारोपणों की रेत में गर्दन घुसेड़े, हमारे अपनों के साथ ऐसा कुछ न हो, इस कामना के साथ अगली वारदात की प्रतीक्षा करते रह जाएं। 
आशा की केवल एक किरण है। निर्भया के मामले में हमने देखा कि बड़ी संख्या में महिलाएं और नागरिक अधिकार संगठन सड़कों पर आए और सरकार को अनेक सकारात्मक कदम उठाने पड़े। मूल्यों के स्तर पर भी यह छोटी बात नहीं है कि अब ज्यादा लड़कियां बलात्कार की शिकायत लेकर सामने आ रही हैं और ज्यादातर मां-बाप भी उन्हें कोसने की जगह उनके साथ मजबूती से खड़े दिखते हैं। यह बात ज्यादा लोगों की समझ में आ रही है कि बलात्कार के बाद शर्मिंदा पीड़िता को नहीं, अपराधी को होना चाहिए। कामना है कि यही स्वर इस बार और मजबूत हो, तभी वह प्रक्रिया आगे बढे़गी, जो निर्भया के साथ शुरू हुई थी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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