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जहां शुरू हुई आधुनिक हिंदी की यात्रा

विभूति नारायण राय पूर्व कुलपति

बाअदब खामोशी से हौले-हौले आगे बढ़ता यह बिल्कुल नए तरह का समूह था, जो 2 मार्च 1898 की दोपहर इलाहाबाद मे पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध (नॉर्थ-वेस्ट प्रॉविन्सेज ऐंड अवध, जो कालांतर में यूनाइटेड प्रॉविन्स ऑफ आगरा ऐंड अवध और आजादी के बाद उत्तर प्रदेश बना) के लाट साहब को एक अर्जी देने जा रहा था और खुद नहीं जानता था कि उसके प्रार्थना पत्र से इतिहास बदलने वाला है। अपने कुल-कुनबे के अनुसार टोपियां और पगड़ी पहने लोगों में ज्यादातर चौक और कटरा के बनिये थे, जिनके लिए गवर्नर हाउस में प्रवेश का यह पहला मौका था। उन्होंने भय और सम्मान के कारण अपने इक्के मील भर से ज्यादा फासले पर खड़े किए और वहां से एक मातमी जुलूस की शक्ल में घने दरख्तों से घिरी उस विशाल इमारत की तरफ बढ़ चले, जिसमें छोटे लाट या लेफ्टिनेंट गवर्नर रहते थे, और जहां आज का मेडिकल कॉलेज है। उनका नेतृत्व 38 वर्षीय वकील मदन मोहन मालवीय कर रहे थे, जिन्होंने पिछले कई महीनों में कड़ी मेहनत करके अपने गिने-चुने सहयोगियों के साथ उस दस्तावेज को तैयार किया था, जिसे उस समूह में सिर्फ दो-तीन लोग ही समझ सकते थे। वे इसे लेफ्टिनेंट गवर्नर मैक्डॉनेल को सौंपने के लिए ही जा रहे थे। 
साठ हजार लोगों के दस्तखत वाले भारी-भरकम ज्ञापन में एक ही अनुरोध था- सरकार कचहरियों में फारसी की जगह नागरी लिपि में लिखी दरखास्त स्वीकार करने का आदेश जारी करे। अकाट्य तर्कों से भरे इस प्रतिवेदन को इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकीलों की एक टीम ने तैयार किया था। दलील यह थी कि नागरी लिपि और हिंदी भाषा में अदालती कामकाज से बहुसंख्यक जनता को अपने से जुड़े दीवानी या फौजदारी मामलों को समझने में आसानी होगी। उदाहरण बंगाल सूबे का दिया गया, जहां बांग्ला और उड़िया भाषी इलाकों में इन भाषाओं में अदालती कामकाज हो रहा था और इसी तरह, पश्चिमोत्तर प्रदेश की कुमाऊं  कमिश्नरी में नागरी लिपि मे हिंदी अदालती कामकाज की भाषा थी। ज्ञापन में विस्तार से जन-सामान्य की भाषा में उन्हें न्याय मिलने के फायदे तो गिनाए ही गए थे, उसमें अंग्रेज हाकिमों की शिक्षा को लेकर कमजोरी को भी भुनाने की कोशिश की गई थी। कोर्ट करेक्शन ऐंड प्राइमरी एजुकेशन इन एन डब्ल्यू प्रॉविन्सेज ऐंड अवध की रिपोर्ट भी ज्ञापन के साथ थी। इसके अनुसार, बॉम्बे, मद्रास और बंगाल में प्राइमरी शिक्षा अपनी लिपियों में दी जा रही थी, वहां छात्रों की संख्या पश्चिमोत्तर प्रांत के मुकाबले कई गुना बढ़ गई। 
शिष्टमंडल सौभाग्यशाली था कि इस बार उसकी फरियाद सुनने वाला मैक्डॉनेल था। इसके पहले 1873 में भी एक अन्य समूह ने तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर म्योर को ज्ञापन देकर ऐसी ही मांग की थी, मगर उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। आईसीएस के बेहतरीन नमूनों में से एक सर अंथनी पैट्रिक मैक्डॉनेल कई अर्थों में अद्भुत नौकरशाह था। पश्चिमोत्तर प्रांत में नियुक्ति के पहले वह बंगाल (जिसमें आज के बिहार और ओडिशा सम्मिलित थे) का लेफ्टिनेंट गवर्नर रह चुका था, जहां उसने न सिर्फ 1873-74 के दुर्भिक्ष के दौरान अपनी संवेदनशीलता से प्रशंसा अर्जित की और पहली बार भूमि सुधार का काम किया, वरन भाषा के प्रश्न पर बहुसंख्यक जनता की भावनाओं का ध्यान रखते हुए फारसी की जगह स्थानीय लिपि को प्रोत्साहित किया था। बंगाल के पहले वह उस सेंट्रल प्रॉविन्सेज का चीफ कमिश्नर रह चुका था, जिसमें विदर्भ, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अधिकांश इलाके आते हैं। वहां भी भाषा के प्रश्न पर उन्होंने यही रुख अपनाया था। इसलिए इस बार बहुत अधिक तर्कों की जरूरत नहीं पड़ी। अगले एक वर्ष में ही पश्चिमोत्तर प्रांत और अवध की कचहरियों में न सिर्फ नागरी का प्रवेश हुआ, बल्कि सरकारी मुलाजमत के लिए नागरी लिपि में काम कर सकने की सलाहियत जरूरी कर दी गई। इस तरह, खड़ी बोली के उद्गम और सर्वाधिक उपयोग वाले भू-भाग में नागरी लिपि की मदद से आधुनिक और मानकीकृत हिंदी के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसने सौ वर्षों के अंदर ही विश्व की किसी भी भाषा के बरक्स खड़ा हो सकने में समर्थ गद्य और पद्य निर्मित कर लिया।
लंबी यात्राओं पर निकलते समय पुस्तकों को साथ रखने की अपनी आदत के चलते इस बार राम निरंजन परिमलेंदु की पिछले दिनों साहित्य अकादेमी से प्रकाशित पुस्तक देवनागरी लिपि आंदोलन का इतिहास  मेरे साथ चली आई। स्वयं का परिचय हिंदी सेवा, पूजा है... यह पूजा ही मेरी पहचान है। इन्हीं बातों के साथ उन्होंने 756 पृष्ठों की इस भारी-भरकम पुस्तक को लिखने का मकसद स्पष्ट कर दिया है। फर्क इतना भर है कि बहुत से हिंदी सेवियों को अंतत: हम हिंदी की रोटी चबाते ही पाते हैं। उम्र के चौथे पहर में जितनी मेहनत से परिमलेंदु ने इस महत्वपूर्ण पुस्तक के लिए तिनका-तिनका बीनकर दुर्लभ सामग्री जुटाई है, वह चकित कर देने वाला है। हिंदी विश्वविद्यालय के अपने अनुभव से मैं कह सकता हूं कि शोध के नाम पर जैसा कूड़ा-करकट हिंदी पट्टी में परोसा जा रहा है, उसे देखते हुए यह एक अद्भुत रचना है। महत्वपूर्ण इसके पीछे की दृष्टि भी है। 
भारतीय समाज में बहुत गहरे संघर्ष के वे तत्व भी अंतर्निहित हैं, जिनके कारण दो लिपियों में लिखी जाने वाली खड़ी बोली हिंदुओं और मुसलमानों में बंट गई। फारसी लिपि में लिखे जाने पर उसे उर्दू और नागरी में लिखी को हिंदी कहा गया। इस पुस्तक में हिंदी हिंदू होने से बची है। परिमलेंदु ने सही शिनाख्त की है कि छोटे से नागर समाज को छोड़ दें, तो गांवों में रहने वाली हिंदू और मुसलमान जनता उन बोलियों का व्यवहार करती थी, जिसमें अरबी-फारसी या तत्सम संस्कृत शब्दों का न्यूनतम उपयोग था और जिसे वह सहजता से कैथी या नागरी अक्षरों में लिखती थी। यह राजा शिव प्रसाद ‘सितारे-हिंद’ का भी मत था, जिन्होंने बोलचाल की भाषा नागरी में लिखने का आंदोलन चलाया और हिंदी को हिंदू बनाने वाले का विरोध सहा। देवनागरी का इतिहास पढ़ते हुए आप 19वीं और 20वीं सदी के भारतीय समाज की भाषिक उथल-पुथल का ही नहीं, बल्कि उसमें मौजूद सांप्रदायिक परतों, ग्रामीण संबंधों, विकसित हो रही नौकरशाही और आजादी हासिल करने की विराट इच्छा शक्ति का भी जायजा ले सकते हैं। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 4 december