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बांग्लादेश की चुनावी राजनीति के रंग

पुष्परंजन संपादक  ईयू-एशिया न्यूज़

हमें इस बात का भरोसा क्यों है कि चीन, बांग्लादेश के आम चुनाव को प्रभावित नहीं करेगा? मालदीव में हम संदेह से बाहर नहीं निकल पाए थे। मगर मालदीव और बांग्लादेश में फर्क है। इन दोनों देशों की भू-राजनीतिक परिस्थितियां भिन्न हैं। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के बाद दूसरे नंबर पर बांग्लादेश है, जहां चीन बुनियादी ढांचे पर सबसे अधिक पैसे खर्च कर रहा है। भारत का भरोसा बांग्लादेश से टूटा नहीं है। बावजूद इसके कि शेख हसीना के दौर में भारत ने सात अरब डॉलर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर लगाए और चीन का 33 अरब डॉलर से अधिक लग चुका है। शेख हसीना ने सऊदी अरब को भी निराश नहीं किया। 560 मस्जिदों के निर्माण के वास्ते उन्होंने सऊदी अरब से फंड लिया है। ये वे कूटनीतिक त्रिकोण हैं, जो बांग्लादेश के चुनाव में प्रतिस्पद्र्धी नहीं हैं।
एक महीने बाद बांग्लादेश में 11वां आम चुनाव है। 28 सदस्यीय यूरोपीय संघ ने घोषणा की है कि इस बार के चुनाव में उनकी ओर से ऑब्जर्वर नहीं भेजे जाएंगे। बांग्लादेश चुनाव आयोग ने जानकारी दी है कि यूरोपीय संसद की ओर से दो ‘इलेक्ट्रोरल एक्सपर्ट’ डेविड नोएल वार्ड और इरीनी मारिया गोनारी ढाका आए हैं। ये दोनों 15 जनवरी तक रहेंगे। 
बांग्लादेश की ‘जातीय संसद’ की सदस्य संख्या  350 है। इनमें से 300 सीटों पर मतदान होता है, बाकी 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जिनके लिए चुने गए 300 प्रतिनिधि एकल समानुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर वोट डालते हैं। बांग्लादेश में केंद्रीय शासन के बाद प्रांतीय सरकार न होकर उसे आठ डिवीजनों (खंडों) में बांटा गया है। इनके नीचे 64 जिले, 490 अनुमंडल, 11 महानगर पालिकाएं, 323 नगर पालिकाएं और 4,553 ग्रामांचलों में शासन व्यवस्था बंटी हुई है। बुधवार, 27 नवंबर मतपत्र जमा करने की आखिरी तारीख थी। 300 संसदीय सीटों के वास्ते 3,056 प्रत्याशियों ने परचे दाखिल किए हैं। नामजदगी का परचा वापस लेने की आखिरी तारीख 9 दिसंबर है। उसके बाद ही पता चलेगा कि वास्तविक लड़ाई किनके बीच है? सत्तारूढ़ अवामी लीग 14 पार्टियों के गठजोड़ के साथ चुनाव मैदान में है। अक्तूबर माह में चुनाव आयोग ने बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी को प्रतिबंधित किया, तो प्रमुख विपक्षी ‘बीएनपी’ अलग-थलग पड़ गई। मगर सितंबर 2018 में नई-नवेली पार्टी, जातीय ओइकिया प्रोक्रिया (जेओपी) के दो नेताओं कमाल हुसैन और प्रोफेसर बदरूद्दीन चौधरी बीएनपी से इस शर्त पर गठबंधन करने को राजी हुए कि उसका जमात से नाता नहीं रहेगा। इस गठजोड़ में 20 दक्षिणपंथी पार्टियां शामिल हैं। तीसरा खेमा आठ वामपंथी पार्टियों का ‘लेफ्ट डेमोक्रेटिक अलायन्स’ है।
असली सवाल यह है कि शेख हसीना की अवामी लीग सत्ता में बनी रहेगी अथवा नहीं? 5 जनवरी, 2014 के चुनाव में 1,107 प्रत्याशियों के मुकाबले इस बार तीन गुना अधिक उम्मीदवार मैदान में हैं। तब प्रमुख प्रतिपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने चुनावों का बहिष्कार किया था। 300 संसदीय सीटों में आधे से अधिक पर तो बिना किसी चुनाव के ही सांसद चुन लिए गए थे। इस बार भी सत्तारूढ़ अवामी लीग के नेता आश्वस्त हैं कि बीएनपी की कमर तोड़ने के बाद बाकी दल भी निपट जाएंगे। 8 फरवरी, 2018 को ट्रायल कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी नेता बेगम जिया को उनके ही ‘जिया चैरिटेबल ट्रस्ट’ में तीन करोड़ 15 लाख टका के घोटाले का दोषी पाया और उन्हें पांच साल की सजा सुनाई। ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, तो वह सजा बढ़कर 10 साल हो गई। बेगम जिया ने अपनी राजनीतिक विरासत लंदन में निर्वासित जीवन जी रहे बेटे तारिक रहमान को सौंप रखी थी। तारिक  बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष बना दिए गए। मगर तारिक रहमान 2004 में एक ग्रेनेड हमले के षड्यंत्रकारी पाए गए, जिसमें अवामी लीग के 20 कार्यकर्ता मारे गए थे। तारिक रहमान को भी अदालत ने उनकी अनुपस्थिति में 10 साल की सजा सुनाई है। 
बांग्लादेश के संविधान के अनुसार, दो साल से अधिक सजायाफ्ता चुनाव नहीं लड़ सकता। इतना तो मानना पडे़गा कि दोनों मां-बेटे की राजनीति खत्म करने के वास्ते अदालत का दुरुपयोग किया गया। बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के एक चीफ जस्टिस थे सुरेंद्र कुमार सिन्हा। बांग्लादेश के 47 साल के सफर में 21 मुख्य न्यायाधीशों में से अकेले सुरेंद्र कुमार सिन्हा को टर्म पूरा नहीं करने दिया गया। इस समय जस्टिस सिन्हा अमेरिका में निर्वासित हैं। 26 सितंबर, 2018 को उनकी पुस्तक द ब्रोकेन ड्रीम  का लोकार्पण हुआ, तो हंगामा मचा। इस किताब के जरिये जस्टिस सिन्हा ने यह बताना चाहा है कि शेख हसीना सरकार की बात जो जज नहीं मानते, वे कैसे नप जाते हैं। एक और बांग्लादेशी जज मलेशिया में निर्वासित हैं। उन्होंने एक हालिया इंटरव्यू में खुलासा किया है कि बीएनपी नेता तारिक रहमान के विरुद्ध फैसला देने से मना करने पर खुफिया वाले कैसे उनके पीछे लग गए?  बीएनपी समर्थकों के विरुद्ध कोई साढ़े चार लाख केस विभिन्न थानों, अदालतों के हवाले हैं। कई को मृत्युदंड दिया जा चुका है। उनके 17,885 कार्यकर्ता जेलों में हैं। शेख हसीना सरकार की आलोचना सोशल मीडिया या दूसरे प्लेटफॉर्म पर न हो, इसे रोकने के लिए ‘डिजिटल सिक्योरिटी ऐक्ट-2018’ लागू कर दिया गया, जिसमें जेल का प्रावधान है। ये वे तरीके हैं, जो निरंकुश शासन चुनाव से पहले ढूंढ़ लेता है। 
लेकिन यदि हम यह मान लें कि बीएनपी वाले बड़े भले लोग हैं और इन पर हसीना सरकार सितम ढा रही है, तो सही नहीं होगा। ये वही लोग हैं, जो जमात-ए-इस्लामी के बगलगीर होकर बांग्लादेश में हिंसा की राजनीति करते रहे। ऐसे भी मौके आए, जब बीएनपी और जमात ने अपने राजनीतिक मंचों से भारत विरोधी मिसाइलें दागीं हैं। अप्रैल 2017 में जब शेख हसीना भारत आईं और 22 समझौते किए, जिनमें रक्षा समझौता भी शामिल था, तब खालिदा जिया ने वहां यह माहौल बनाने की कोशिश की कि हसीना ने बांग्लादेश को बेच दिया है। मगर इस चुनाव में यह अभियान कुछ ठहर सा गया है। वजह साफ है, शैतान अभी बोतल में बंद है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 3 november