Opinion Hindustan Column on 28 march - अंतरिक्ष में नई शक्ति का उदय DA Image

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अंतरिक्ष में नई शक्ति का उदय

अंतरिक्ष में एंटी-सैटेलाइट मिसाइल लॉन्च करने वाले देशों में भारत का शामिल होना एक बड़ी उपलब्धि है। बुधवार को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि ‘मिशन शक्ति’ अभियान के तहत अंतरिक्ष के लो अर्थ ऑर्बिट में सैटेलाइट को महज तीन मिनट में मार गिराया गया। अब तक अमेरिका, रूस और चीन के पास ही यह क्षमता थी। तकनीकी रूप से यह बहुत मुश्किल क्षमता मानी जाती है, क्योंकि जिस ‘ऑब्जेक्ट’ को हम निशाना बना रहे होते हैं, वह बहुत तेज गति से चक्कर काटता रहता है। किसी ठहरी हुई वस्तु की अपेक्षा उस वस्तु को निशाने पर लेना काफी मुश्किल होता है, जो गतिशील हो। अगर वह वस्तु कोई अंतरिक्ष-पिंड या सैटेलाइट हो, तो चुनौती ज्यादा बढ़ जाती है, क्योंकि घरती अपनी गति से घूम रही होती है। जिस हथियार से हम ‘ऑब्जेक्ट’ को निशाना बनाना चाहते हैं, उसकी भी एक गति होती है। सैटेलाइट या अंतरिक्ष पिंड की अपनी गति तो खैर होती ही है। इस तरह के अभियान में हर एक पहलू काफी महत्वपूर्ण होता है, और एक छोटी सी गलती भी हमें नाकाम कर सकती है। यही वजह है कि अंतरिक्ष में किसी गतिशील वस्तु को पूरी दक्षता के साथ नष्ट करने की क्षमता कई देश अब तक हासिल नहीं कर सके हैं। 
हमारी यह उपलब्धि भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में, इंधन के विकास में और गाइडेड मिसाइल को विकसित करने में काफी मददगार साबित होगी। गाइडेड मिसाइल का मतलब एक ऐसी मिसाइल तैयार करना है, जो अपने निशाने का पीछा करके उसे नष्ट करे। ‘मिशन शक्ति’ की सफलता के बाद अब हम ‘ऑब्जेक्ट’ को हर तरह से खत्म कर सकते हैं। अब हर गतिशील वस्तु हमारे निशाने पर होगी, फिर चाहे वह आसमान में चक्कर काट रही हो या फिर घरती पर। सैटेलाइट काफी छोटे होते हैं, इसलिए सुदूर में गतिशील कोई छोटी वस्तु भी अब नष्ट की जा सकती है। यह कोई चलती कार भी हो सकती है, और उससे छोटी चीज भी। 
हमसे पहले चीन ने यह उपलब्धि हासिल की थी, जिसके बाद दुनिया भर से तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। खासतौर से अमेरिका उस वक्त काफी नाराज दिखा था। चीन की उस उपलब्धि ने विवाद भी खूब पैदा किए थे। तब कहा गया था कि ऐसे परीक्षणों से अंतरिक्ष में कचरा बढ़ता है, जो मानव जाति के लिए खतरनाक हो सकता है। इन पक्तियों के लिखे जाने तक भारत की कामयाबी के खिलाफ ऐसी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, हालांकि चीन के पिछले अनुभव से यह कहा जा सकता है कि उन्हें यह नागवार गुजरा होगा।
इस तरह की तकनीक का अपना गणित होता है। चूंकि हमारे पास रॉकेट हैं, इसलिए हमें पता है कि कितनी तेजी से उसे ऊपर फेंकने से वह घरती के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकल जाएगा। देखा जाए, तो गुरुत्वाकर्षण शक्ति को परे धकेलने की क्षमता हासिल कर लेना ही अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। इसी तकनीक का इस्तेमाल करके हम किसी लॉन्च व्हिकल को रॉकेट बना सकते हैं या फिर मिसाइल। लेकिन रॉकेट प्रक्षेपण और किसी सैटेलाइट को निशाना बनाने की प्रक्रिया में बुनियादी अंतर यह है कि रॉकेट प्रक्षेपण से हम किसी उपग्रह को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करते हैं, जबकि सैटेलाइट को निशाना बनाने के लिए न सिर्फ एक खास गति की दरकार होती है, बल्कि एक निश्चित दिशा में मिसाइल को एक नियत दूरी भी तय करनी होती है। इसीलिए ‘मिशन शक्ति’ जैसे कार्यक्रमों को रॉकेट प्रक्षेपण की तुलना में काफी मुश्किल माना जाता है। 
यह तकनीकी श्रेष्ठता हासिल करने का मामला है, जिसके लिए हमारे वैज्ञानिकों को अवश्य बधाई देनी होगी। वैज्ञानिकों के साथ ही यह पूरे देश के लिए एक उपलब्धि है। अगर इसे किसी राजनीति के साथ जोड़कर देखा जाता है, तो यह हमारे वैज्ञानिकों के साथ अन्याय होगा। ‘मिशन शक्ति’ पर आज काम नहीं शुरू हुआ। यह पीढ़ियों की मेहनत का यह फल है। ठीक-ठीक तो नहीं कहा जा सकता कि इस तकनीक के लिए हमने कब काम शुरू किया, पर जिस दिन हमने रॉकेट साइंस या अंतरिक्ष विज्ञान में दाखिल होने का फैसला लिया, तभी से नई-नई क्षमताएं अर्जित करने का बुनियादी काम शुरू हो गया होगा। ‘मिशन शक्ति’ को लेकर भी हमारे वैज्ञानिक कम से कम दस वर्षों से तैयारी कर रहे होंगे। लेकिन राजनेताओं की तरह वैज्ञानिकों में काम का श्रेय लेने की होड़ नहीं होती। यह दुनिया में कहीं भी नहीं होता। 
इस सफलता का अर्थ यह नहीं है कि अब हम दूसरे देशों की सैटेलाइट को निशाना बनाने लगेंगे। अब तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि इस तकनीक का इस्तेमाल किसी देश ने युद्ध के समय किया हो। जाहिर है, यह अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ का भी मामला नहीं है। यह मुख्यत: किसी गतिशील ‘ऑब्जेक्ट’ को मार गिराने की तकनीकी श्रेष्ठता हासिल करने का मामला है, जिसका इस्तेमाल कई दूसरी कई प्रणालियों और अन्य उद्देश्यों में हो सकता है। यह हमारे भीतर विश्वास पैदा करेगा कि हमने यह मुकाम हासिल कर लिया है, जिसका श्रेय पूरी तरह से वैज्ञानिकों को दिया जाना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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