Opinion Hindustan column on 28 january - वे निकली हैं तो दूर तक जाएंगी DA Image
21 फरवरी, 2020|1:55|IST

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वे निकली हैं तो दूर तक जाएंगी

शाहीन बाग की औरतों पर आजकल खूब लिखा जा रहा है। वहां जाकर मुझे हिंदी कवि आलोक धन्वा की कविता ब्रूनो की लड़कियां याद आईं। कविताएं होती ही हैं कमजोरों की पक्षधर, इसलिए स्वाभाविक है कि दुनिया की तमाम भाषाओं में औरतों पर यादगार रचनाएं रची गई हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि इधर शाहीन बाग की औरतों पर कई कविताएं दिखीं- शुरुआत में तो सोशल मीडिया पर और अब पत्र-पत्रिकाओं में। फौरी प्रतिक्रियाओं की उपज इन कविताओं से बहुत रचनात्मक प्रौढ़ता की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, पर जिस तरह से ये वायरल हुई हैं और लोगों ने इन्हें आपसी बातचीत में गुनगुनाना शुरू कर दिया है, उससे यह तो कहा ही जा सकता है कि शाहीन बाग राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है।
इन औरतों में ज्यादातर मुस्लिम हैं और यह स्वाभाविक भी है। एक तो नागरिकता से जुड़ा मुद्दा मुसलमानों के लिए जीवन-मरण जैसा है और दूसरे, शाहीन बाग के आसपास मुख्य रूप से मुस्लिम आबादी वाले इलाके हैं, जहां अपना दैनिक काम-धाम निपटाने के बाद समय मिलते ही घर से निकलकर औरतें धरना स्थल पर बैठ जाती हैं और बीच-बीच में जरूरत के मुताबिक घर और धरने के बीच आवाजाही करती रहती हैं। बहुतों की गोद में छोटे-छोटे बच्चे हैं और कुछ के बच्चे भीड़ में खेल रहे हैं। कई बार तो माहौल नौचंदी मेले जैसा लगता है। खाने-पीने के स्टॉल लगे हैं, मंच पर कविता पाठ या भाषण चल रहे हैं, लोग अंदर बाहर आ जा रहे हैं और इन सबसे ज्यादा दिलचस्प औरतें बीच-बीच में नारे लगा रही हैं।
यह प्रदर्शन सिर्फ इसलिए पिछले किसी प्रदर्शन से भिन्न नहीं है कि डेढ़ महीने से भी अधिक समय से दिल्ली की एक महत्वपूर्ण सड़क बंद है और लाखों दैनिक यात्री लंबे रास्तों से अपना जरूरी सफर पूरा कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस, जिसने जामिया मिल्लिया या जेएनयू में अति सक्रियता या संदिग्ध निष्क्रियता से बदनामी हासिल की थी, चुपचाप तमाशा देख रही है। इस प्रदर्शन को दो अन्य कारणों से याद किया जाएगा। एक तो भारतीय संविधान पहली बार किसी इतने बड़े आंदोलन के केंद्र में है और लगभग एक किलोमीटर बंद सड़क तिरंगे झंडों, देश के विशाल नक्शों और दूसरे राष्ट्रीय प्रतीकों से पटी हुई है। इसके पहले किसी भी आंदोलन में राष्ट्रीय प्रतीकों का इतना रचनात्मक उपयोग नहीं हुआ था।
वैसे धार्मिक पहचान के आधार पर आजादी के बाद कई आंदोलन हुए, मगर कभी भी मुस्लिम औरतों की इतनी मुखर उपस्थिति नहीं दिखी। यह भी स्मरण करना होगा कि 1985 में एक बूढ़ी बेसहारा औरत को 180 रुपये से भी कम का वजीफा दिए जाने के बाद मुस्लिम उलेमा ने इस्लाम के खतरे में होने का फतवा दे दिया था और प्रधानमंत्री राजीव गांधी को समर्पण करना पड़ा था। तीन तलाक के मुद्दे पर भी उलेमा का यही रवैया था। दोनों मौकों पर विरोध-प्रदर्शनों में परदानशीं औरतें शरीक दिखीं, पर इस बार वे मर्दों के नेतृत्व में ठेलकर लाई गई भीड़ नहीं हैं। यहां तक कि उलेमा या ओवैसी जैसे नेताओं के स्वर भी बदले हुए हैं। कुछ ही पहले यह कहने वाले कि मुसलमान के लिए भारतीय संविधान से अधिक महत्वपूर्ण शरीयत है, अब संविधान बचाने की बात कर रहे हैं। यह कहना तो सरलीकरण होगा कि सिर्फ औरतों की उपस्थिति मात्र से कट्टरपंथियों ने शरीयत छोड़कर धर्मनिरपेक्ष और उदार संविधान के पक्ष में गोलबंद होना शुरू कर दिया है, पर उनके बढ़-चढ़कर आंदोलन में भाग लेने से उसके स्वरूप पर पड़ने वाला प्रभाव एक गंभीर समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय हो सकता है। मुख्य रूप से औरतों के हाथ में नेतृत्व होने के कारण कई बार उकसाने वाली कार्यवाही के बावजूद प्रदर्शन शांतिपूर्ण बना हुआ है। 
संविधान के प्रति बढ़ते लगाव को एक अवसरवादी प्रतिक्रिया कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। हमें याद रखना होगा कि कट्टरपंथी उलेमा कभी भी खुशी से औरतों के हाथों में नेतृत्व नहीं सौंपेंगे। एक टैक्टिक्स के तहत उन्होंने इस बार उन्हें बाहर निकाला है, अगर औरतें बाहर निकली हैं, तो इसके पीछे यह समझ है कि एनआरसी उनके घरों को बर्बाद कर देगी। उन्हें बढ़-चढ़कर आजादी के नारे लगाते देखना एक अलग ही अनुभव है। वे पितृसत्ता और धार्मिक कठमुल्लों पर एक साथ हमला कर रही हैं। एक बार हौसला बढ़ने पर कल को परदे से भी मुक्ति की सोच सकती हैं। इस लड़ाई में वे तभी कामयाब होंगी, जब बड़ी संख्या में गैर-मुस्लिम औरतें भी उनके साथ आएं। आज की स्थिति यह है कि मुसलमानों से इतर बहुत कम औरतें एनआरसी आंदोलन में आगे आ रही हैं। मंच पर तो पर्याप्त हैं, लेकिन सामने बैठी कम दिखती हैं। दृश्यमान नेतृत्व से मुस्लिम औरतों की काफी हद तक अनुपस्थिति शायद स्वाभाविक ही है, लेकिन एक बार पितृसत्ता और कठमुल्लों की जकड़बंदी से निकलने के बाद उन्हें वापस उसी माहौल में भेजना बहुत मुश्किल 
हो जाएगा। 
यहां सोवियत संघ के टूटने के बाद सेंट्रल एशिया के उसके गणराज्यों के अनुभवों को याद करना प्रासंगिक होगा। सोवियत रूस से अलग हुए मुस्लिम बहुल राष्ट्रों में वहाबी इस्लाम ने औरतों को परदे और घरों की चारदीवारी में धकेलने की कोशिश की, तो उसे मुंह की खानी पड़ी। तुर्कमेनिस्तान और कजाकिस्तान में तो दोनों पक्षों के बीच कई स्तरों पर संघर्ष हुए। 70 साल तक आजादी की सांस लेने वाली औरतों ने वापस घर की चारदीवारी तक सीमित होने से इनकार कर दिया और कट्टरपंथियों को पीछे हटना पड़ा। 
आजादी का सपना कितना सम्मोहक हो सकता है, इसका पता इसी से चलता है कि शाहीन बाग से शुरू हुआ आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सों में फैल चुका है और हर जगह नेतृत्व मुस्लिम औरतों ने संभाल रखा है। पुन: इस निवेदन के साथ कि सिर्फ इन आंदोलनों से किसी बहुत बडे़ परिवर्तन की कल्पना करना सरलीकरण होगा, यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि औरतों के नेतृत्व को कट्टरपंथियों ने आसानी से स्वीकार नहीं किया होगा। औरतों के बढ़-चढ़कर आजादी के नारे लगाने से उन्हें अपने पांवों के नीचे से जमीन फिसलती हुई महसूस हो रही होगी। आजादी के उनके नारे सिर्फ एनआरसी पर नही रुकेंगे, आगे जाकर ये नारे पितृसत्ता से आजादी की मांग करेंगे। ऐसे मौके पर गैर-मुस्लिम, खास तौर से हिंदू बहनों का साथ उनकी लड़ाई को मजबूत करेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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