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विपक्ष के इस हश्र में कुछ नया नहीं

हरजिंदर वरिष्ठ पत्रकार

अगर आम चुनाव में नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी की जीत दुनिया की सबसे बड़ी जीत है, तो विपक्षी दलों की हार को क्यों न दुनिया की सबसे बड़ी हार मान लिया जाए? यह तय है कि विपक्षी दल इस तरह के तर्क को स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन बहुत से लोग ऐसा मान चुके हैं और शायद इसीलिए विपक्ष को मिलने वाली लानतों का ढेर लगातार ऊंचा होता जा रहा है। बल्कि कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि जीतने वालों को उतनी बधाइयां नहीं मिल रहीं, जितनी कि हारने वालों को लानतें मिल रही हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो नरेंद्र मोदी को उनकी जीत का श्रेय न देकर यह श्रेय विपक्ष की खामियों को ही दे रहे हैं। चुनाव के दौरान खुद भाजपा के लोग ही मीडिया में यह कहते सुनाई दे जाते थे कि मोदी नहीं, तो और कौन? जैसे और कोई होता, तो वे अपने विचार बदल सकते थे। 
इन तर्कों को अगर छोड़ भी दिया जाए, तो विपक्ष के कमजोर होने को लेकर जो चिंता है, उसे समझा जा सकता है। लोकतंत्र पक्ष और विपक्ष के पारस्परिक संतुलन से चलने वाली व्यवस्था है, जिसमें आदर्श स्थिति यही होती है कि पक्ष भी मजबूत हो विपक्ष भी। एक के भी कमजोर होने से मामला गड़बड़ाने लगता है। लेकिन एक तो आदर्श स्थितियां अपवाद स्वरूप ही आकार लेती हैं और जनादेश से जो निकलता है, उसे न सिर्फ स्वीकार करना होता है, बल्कि उससे ही काम चलाना होता है। जनादेश को सर-माथे रखना सिर्फ लोकतंत्र की परंपरा ही नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा आदर्श भी है। लेकिन इसी के साथ हार-जीत का विश्लेषण भी लोकतंत्र की एक और बड़ी परंपरा है। और जब कमजोर विपक्ष की बात होगी, तो उसकी हार का पोस्टमार्टम भी जरूरी होगा।
वैसे न तो हार-जीत कोई नई बात है, और न ही उसका पोस्ट मार्टम ही। लेकिन कुछ विश्लेषकों के शगल के अलावा इसके नतीजे किसी काम आते हैं या नहीं, इसे हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते। मसलन 2009 के आम चुनाव को लें। उस समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और भाजपा ने अपना सारा दांव उन्हें कमजोर साबित करने पर खेला था। बाद के विश्लेषण में कहा गया कि देश के प्रधानमंत्री को कमजोर बताना लोगों ने स्वीकार नहीं किया और इसीलिए भाजपा सफल नहीं हो सकी। लेकिन सच यही है कि चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा हमेशा इसे अपना सबसे प्रबल मुद्दा मानती रही। यही इस बार भी हुआ। चौकीदार चोर है के जिस नारे को कांग्रेस अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती रही और अब उस नारे को ही उसकी दुर्गति का सबसे बड़ा कारण ठहराया जा रहा है। इस बार भी यही कहा जा रहा है कि देश के प्रधानमंत्री को चोर कहा जाए इसे लोग भला कैसे स्वीकार करेंगे? सच जो भी हो, लेकिन इससे यह तो जाहिर होता ही है कि जमीन पर राजनीति करने वाले पिछले विश्लेषणों पर शायद ही गौर फरमाते हैं।
भारत में एक दिक्कत और है। जब हम कहते हैं विपक्ष तो इसका कोई एक अर्थ नहीं होता, यह हमारे देश का ऐसा अनेकार्थी शब्द है, जिसके अर्थ समय और स्थान के हिसाब से बदलते रहते हैं। समय के हिसाब से तो दुनिया के हर लोकतंत्र में बदलते हैं, लेकिन क्षेत्र और प्रदेश के हिसाब से शायद हमारे यहां ही बदलते हैं। हर राज्य में इसका अलग रंग होता है, संसद में अलग होता है और आंदोलन-प्रदर्शन की राजनीति में अलग। भारतीय राजनीति का एक लंबा दौर ऐसा रहा है कि जिसे हम राष्ट्रीय स्तर का विपक्ष कहते हैं,  वह अक्सर कमजोर और सीमित प्रभाव वाला रहा है। जैसे आज कांग्रेस है, वैसे ही कभी कम्युनिस्ट पार्टियां, भारतीय जनसंघ और भाजपा वगैरह रहे हैं। आज आम धारणा में विपक्ष को जो बेकार, गैर-जिम्मेदार और बाधा बनने वाला बताया जा रहा है, उसमें कोई नई बात नहीं है, देश में विपक्ष की छवि अक्सर ऐसी ही बनाई जाती रही है। इसका अपवाद तभी होता है, जब सरकार किसी बदनामी के लपेटे में आ जाती है और लोग विपक्ष से उम्मीद बांधने लगते हैं। इसके अलावा देश में विपक्ष के सत्ता समीकरण इतने उलझे हुए रहे हैं कि उनसे किसी एक तरह की उम्मीद बांधी भी नहीं जा सकती। 
उम्मीद बांधने की बात यहां इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह सवाल इस बार भी पूछा जा रहा है कि क्या विपक्ष इस हार से कोई सबक लेगा? वैसे व्यावहारिक राजनीति में सबक लेने की परंपरा के उदाहरण भी हमारे पास शायद ही कोई हों, किसी भी दौर के विपक्ष ने कभी कोई सबक लिया इसका उदाहरण ढूंढ़ना तो शायद और भी मुश्किल है। आपातकाल के बाद 1977 में इंदिरा गांधी बुरी तरह चुनाव हार गई थीं, लेकिन जनता पार्टी के रातों-रात अलोकप्रिय होने के बाद 1980 में जब उन्होंने सत्ता में वापसी की, तो यह बात अक्सर कही जाती थी कि आपातकाल के काले दौर से जितना सबक इंदिरा गांधी ने लिया, उतना तो विपक्षी दलों ने भी नहीं लिया। कुछ हद तक यही इस बार भी कहा जा सकता है कि 2014 की जीत से नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने जितना सीखा, उतना सबक तो शायद उस चुनाव में हारने वालों ने भी नहीं लिया। 
हार भले ही कितनी भी बड़ी हो, यह सोचना व्यर्थ है कि इससे विपक्ष के रवैये में कोई बड़ा बदलाव आने वाला है। विपक्षी दल अभी पहले की ही तरह सरकार पर आरोप लगाते और प्रतिनिधि सदनों में बहिर्गमन करते रहेंगे। हमें यह सब व्यर्थ लग सकता है, लेकिन इस तरह के विरोध भी लोकतंत्र में एक भूमिका तो निभाते ही हैं। राजनीति में एक और बात कही जाती है कि जब जिसका समय आता है, उसे रोक पाना किसी के बस का नहीं होता। फिलहाल का सच यही है कि यह नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी की राजनीति का समय है, और जहां तक विपक्ष का मामला है उसकी भूमिका यही होती है कि वह जमीन से जुड़कर लगातार विरोध दर्ज करता हुआ अपनी बारी का इंतजार करे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 27 may