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हमारा खलनायक उनका नायक कैसे

विभूति नारायण राय पूर्व आईपीएस अधिकारी

अब जब 26/11 के नाम से विख्यात मुंबई हमलों के दस वर्ष होने जा रहे हैं, यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि इस पूरे घटनाक्रम का खलनायक हाफिज सईद  किस हाल में रह रहा है और पाकिस्तानी जनता, सेना और सरकार उसे लेकर क्या सोचते हैं? यह इसलिए भी आवश्यक है कि डेढ़ दशकों से अधिक से चल रहे अफगान युद्ध में फंसे अमेरिका ने पहली बार उसके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। इसके पहले हक्कानी नेटवर्क को लेकर तो उसकी संवेदनशीलता दिखती थी, पर हाफिज सईद के विरुद्ध नाराजगी काफी हद तक प्रतीकात्मक ही होती थी। राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में इस नीति में बुनियादी बदलाव आया है। दबाव बढ़ाने की नीति के तहत पहले तो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए दी जाने वाली सहायता बंद की गई और फिर फरवरी 2018 में पेरिस में हुई फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स की बैठक में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के प्रस्ताव पर जून से पाकिस्तान को ‘ग्रे लिस्ट’ में डालने का निर्णय हुआ। यह प्रस्ताव दो कारणों से महत्वपूर्ण है। पहला, इसलिए कि इसमें केवल हाफिज सईद का जिक्र था और दूसरा मतदान के समय सिर्फ तुर्की इसके खिलाफ था, चीन और सऊदी अरब जैसे पारंपरिक मित्रों ने भी पाकिस्तान का साथ नहीं दिया। इस झटके के बावजूद पाकिस्तान में हाफिज सईद की देश के अंदर स्वीकार्यता में कोई फर्क नहीं आया है और इसके कारणों को तलाशना बहुत मुश्किल नहीं है। 

ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट की फेलो मदीहा अफजल की हाल में छपी किताब पाकिस्तान अंडर सीज इस पर बखूबी प्रकाश डालती है। उनके अनुसार, एक सर्वे से यह साफ हो गया है कि आम पाकिस्तानी नागरिकों का एक बड़ा तबका हाफिज सईद को नायक मानता है। अशिक्षितों के मुकाबले शिक्षित नौजवानों में यह प्रतिशत अधिक है। ऐसा मदरसों और मुख्यधारा के स्कूलों के सिलेबस के कारण संभव हो रहा है। प्रचार तंत्र और निष्ठावान स्वयंसेवकों की फौज के बल पर उसकी संस्थाओं जमात-उद्-दावा और फलाह-ए-इंसानियत की छवि नेक और जनसेवा में लगे संगठनों की बन गई है। लोग अक्तूबर 2005 के भूकंप और 2010 की बाढ़ का हवाला देते हैं, जब अक्षम सरकारी मशीनरी के बरअक्स इन संस्थाओं के कार्यकर्ताओं ने बढ़-चढ़कर काम किया था। एक मोटे अनुमान के अनुसार, जमात-उद्-दावा के पास पाकिस्तान का दूसरा बड़ा एंबुलेंस बेड़ा है। इन्हीं संसाधनों के बल पर हर आपदा में हाफिज सईद की प्रतिष्ठा सरकार के मुकाबले बढ़ जाती है। सर्वे के दौरान एक व्यक्ति कहता है कि दुनिया हाफिज सईद के बारे में क्या सोचती है, इससे कोई मतलब नहीं, क्योंकि जरूरत पड़ने पर उसे डॉक्टर जमात-उद्-दावा ने ही उपलब्ध कराया था। 

अभी तक पाकिस्तान एक ऐसे उदाहरण की तरह है, जिसका सुरक्षा-तंत्र नीति के तहत आतंकी संगठनों के इस्तेमाल का जोखिम उठाता रहा है और इसके बावजूद वह हमेशा अंतरराष्ट्रीय दबावों से बचा है। आखिर 2012 से 2015 तक भी तो वह एफएटीएफ की ‘ग्रे लिस्ट’ में था ही, पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के भरोसे उसका बेड़ा पार होता रहा। उसके आयात, निर्यात या विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति पर ‘ग्रे लिस्ट’ का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। इस बार भी प्रतिष्ठान जाहिरा तौर पर तो यही समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि जून में ‘ग्रे लिस्ट’ में आने के बाद भी कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, पर अंदर से वे खूब समझ रहे हैं कि हालात अब पहले जैसे नहीं रह गए।

खासतौर से चीन और सऊदी अरब के इस संकेत के बाद कि हाफिज सईद को लेकर वे अधिक समय तक पाकिस्तान का साथ नहीं दे सकेंगे, सरकार ने कुछ लीपापोती करने की कोशिश की है। पेरिस की बैठक के थोड़ा पहले राष्ट्रपति ममनून हुसैन ने एक ऑर्डिनेंस जारी कर हाफिज सईद के संगठनों को आतंक विरोधी कानून के तहत प्रतिबंधित कर दिया। केंद्र और राज्य सरकारों ने आधे-अधूरे मन से ही उसके अस्पतालों और मदरसों को नियंत्रित करने का प्रयास किया। कानूनी तौर पर हाफिज सईद के खिलाफ उठाए गए कदम कितने मजबूत हैं, यह इस तथ्य से समझा जा सकता है कि हर बार न्यायपालिका उसकी मदद के लिए खड़ी हो जाती है। सऊदी अरब को खुश करने के लिए पाकिस्तान ने उसकी सेवा में अपने एक हजार से अधिक सैनिक भी भेज दिए, पर अंतिम समय में किए गए सारे प्रयास पेरिस में नाकामयाब रहे। इस बार अमेरिका की सक्रियता के कारण नतीजे भी दिखने लगे हैं। पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। उसे  रुपये का अवमूल्यन करना पड़ा है और नतीजतन महंगाई बेतहाशा बढ़ रही है। मुद्रा अवमूल्यन के बाद कर्जों का बोझ बढ़ गया और कोढ़ में खाज यह कि विदेशी मुद्रा कोष लगभग खाली हो गया है। चुनाव सिर पर है, इसलिए सत्ता दल कोई कड़े अप्रिय फैसले लेने में समर्थ नहीं है। पूरी आशंका है कि अगले दो महीनों में जब वहां चुनाव-पूर्व की कार्यवाहक सरकार होगी, उसे देश में आर्थिक आपातकाल लगाना पड़ेगा। 

पाकिस्तान की सारी फजीहत हो रही है उस एक व्यक्ति के लिए, जो आज से दस साल पहले मुंबई हमलों का सूत्रधार था। इसे समझ पाना बहुत मुश्किल नहीं है कि आत्महत्या के कगार पर पहुंचे देश का राजनीतिक नेतृत्व अपने को इतना असहाय क्यों पा रहा है? सभी जानते हैं कि सर्वशक्तिमान पाक फौज ने अपनी रणनीतिक संपदा के तौर पर लश्कर-ए-तैयबा या हक्कानी नेटवर्क खड़े किए थे। एक उसकी लड़ाई कश्मीर में, तो दूसरा अफगानिस्तान में लड़ता है। इतनी मेहनत से पाल-पोसकर खड़े किए संगठनों को नष्ट करने के लिए वह आसानी से तैयार नहीं होगी। पिछले दिनों जब एक बैठक में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के करीबी कुछ मंत्रियों और अफसरों ने सेना को समझाने की कोशिश की कि हाफिज सईद की वजह से पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अलग-थलग पड़ रहा है, ‘डॉन लीक’ के नाम से मशहूर प्रकरण में उनकी नौकरी चली गई। अब पहली बार सेना रक्षात्मक मुद्रा में दिख रही है। शायद अमेरिका की सख्ती और चीन व सऊदी अरब की दुत्कार का असर है कि पाकिस्तान में एक गंभीर बहस चल पड़ी है कि अब ‘नॉन स्टेट एक्टर’ बहुत उपयोगी नहीं रह गए हैं और उन्हें छोड़ने का वक्त आ गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 27 march