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29 फरवरी, 2020|5:55|IST

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विरोध की मर्यादा और संभावनाएं

बद्री नारायण निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान

विरोध के आंदोलन इन दिनों कुछ ज्यादा ही चर्चा में हैं। देश के बहुत से शहरों में इस आंदोलन के नए केंद्र उभरते दिख रहे हैं। वहां जो हो रहा है, वह भी चर्चा में है। इस तरह के विरोध किसी भी लोकतंत्र के अनेक प्राण तत्वों में से एक मुख्य तत्व माने जाते हैं। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि वह अपने भीतर ही विरोध को भी मंच देता है। भारतीय लोकतंत्र ने अनेक असहमतियों और प्रतिरोधों को जगह देकर, उन्हें अपने में समाहित कर अपने को मजबूत बनाया है। बेशक, इस तरह के विरोध की एक सामाजिक और कानूनी मर्यादा भी होती है। इसी मर्यादा के भीतर विरोध असहमतियों की अभिव्यक्ति के अनेक रचनात्मक रूप रचता रहता है।
   पश्चिमी समाजों में ‘कार्निवल’ जैसे सामाजिक समारोहों में लोग अपने मुंह पर अनेक तरह के मुखौटे लगाकर, तरह-तरह के बाजे बजाकर, विरोधियों की नकल उतारकर विरोध की संस्कृति को रचते रहे हैं। वैसे रचनात्मकता के मामले में भारत के विरोध आंदोलन भी किसी से कम नहीं रहे। आपातकाल के दौरान जब खुलेआम विरोध करना आसान नहीं था, तब लोगों ने कविताएं, दीवारों पर नारे लिखकर, पोस्टर बनाकर भी विरोध की नई संस्कृति शुरू की थी। यह जरूर है कि अक्सर ऐसे विरोध आंदोलनों के दौरान हुई हिंसा ही ज्यादा चर्चा में आती है, जो अंत में उसे कमजोर ही करती है। दूसरी तरफ, उसके संदेश की रचनात्मकता उसे मजबूत बनाती है। 
   नदियों पर बड़े बांध बनाने के खिलाफ हुए प्रतिरोध आंदोलनों में विस्थापित होने वाली जनता ने कई दिनों तक पानी में रहकर विरोध को नया रूप देने की कोशिश की थी। असम आंदोलन के समय एक निश्चित समय पर थाली पीटकर विरोध प्रदर्शन का एक नया प्रयोग किया गया था। हड़ताल और कामबंदी जैसे विरोध के रूप पश्चिमी औद्योगिक समाज में विकसित हुए और वहां से चलकर भारत में आए, वहीं अनशन, सत्याग्रह आदि  प्रतिरोध के रचनात्मक रूप महात्मा गांधी और गांधीवादी आंदोलनों से उभरकर हमारी राजनीति में पसरे। साइमन कमीशन जब भारत आया था, तब उसका विरोध कई जगहों पर पतंग उड़ाकर किया गया था। पतंगों से विरोध का यह सिलसिला इन दिनों फिर दिख रहा है। सोशल मीडिया ने भी विरोध को एक नया मंच दिया है। यह भी माना जाता है कि इससे लोग सड़क की हिंसा और दमन, दोनों से अपना बचाव कर लेते हैं। हालांकि यह माध्यम धीरे-धीरे विरोध के मंच के रूप में कम, और वाचिक हिंसा के लिए ज्यादा चर्चा में आ रहा है। 
कार्टून भी पूरी दुनिया में प्रतिरोध के बड़े कारगर हथियार रहे हैं। भारत में आरके लक्ष्मण, शंकर, इरफान के कार्टून शासन और सत्ता के अनेक निर्णयों का प्रतिरोध करते रहे हैं। ये कार्टून कई बार मुंबई, दिल्ली और प्रदेशों की राजधानियों में अखबारों व पत्रिकाओं के पन्नों से उतरकर सड़कों पर प्रदर्शनकारियों के हाथों में देखे जा सकते हैं। छात्रों और युवाओं के विरोध आंदोलनों को अक्सर हिंसा, तोड़-फोड़ वगैरह के लिए याद किया जाता है, लेकिन उनमें भी अनेक बार रचनात्मकता के तत्व पाए जाते हैं। बाद में यह हिंसा ही ऐसे आंदोलनों को खत्म कर देती है। कम से कम भारत का इतिहास यही है कि यहां हिंसक आंदोलन न कहीं लोकप्रिय हुए और न कभी दीर्घजीवी।
विरोध के इस तरह के आंदोलन सिर्फ विपक्ष का ही औजार नहीं बनते, वे सरकार और शासक दलों को भी मौका देते हैं कि वे लोगों को अपने मत के आस-पास गोलबंद करें और अपने आधार को एक राजनीतिक मजबूती दें। इन दिनों जब देश में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में आंदोलन हो रहे हैं, तब भारतीय जनता पार्टी ने उसके समर्थन में आंदोलन, प्रदर्शन और रैलियां की हैं। एक तरह से देश भर में जो विरोध आंदोलन हुए, उन्होंने भाजपा को भी अपने मतदाताओं से नए सिरे से संपर्क और संवाद करने का मौका दिया।
विरोध के आंदोलनों में सरकार के लिए सुझाव का तत्व भी होता है और उससे उम्मीद बांधने का तत्व भी। कई बार सरकारें उन्हें सुनती और समझती भी हैं। उस विरोध के खात्मे की दिशा में कार्य करती हैं। कई बार उसे अनसुना भी कर देती हैं। मजदूर आंदोलनों की बहुत सी मांगें मानने का एक इतिहास रहा है। राजनीतिक आंदोलनों के मामले में यह सब इतनी आसानी से नहीं होता। यह तभी हो पाता है, जब जन-दबाव इतना बड़ा हो जाए कि कोई और चारा शेष न रह जाए।
रचनात्मक प्रतिरोध और समाज व संविधान की मर्यादा में रहकर किए जाने वाले विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन लोकतंत्र को सौम्य व प्रभावी बनाते हैं, किंतु हिंसा, लाठी-डंडे और पत्थरबाजी लोकतंत्र में विरोध की संस्कृति को निरीह बना देते हैं। गांधीजी का पूरा प्रतिरोध अहिंसा के भाव के रचनात्मक उपयोग से उपजा था। अहिंसा उनके लिए जीवन मूल्य तो थी ही, साथ विरोध का सबसे बड़ा औजार भी थी। बहुजन समाज पार्टी नेता कांशीराम यह मानते थे कि दलितों ने कभी भी सत्ता के खिलाफ हिंसात्मक विरोध किया, तो हिंसा उनकी कार्रवाई और उनके आंदोलन को कमजोर कर देगी। आंबेडकर खुद भी ऐसी ही राय रखते थे। संविधान और सामाजिक मर्यादाओं के दायरे में रहकर किए जाने वाले रचनात्मक विरोध ही कारगर हो सकते हैं। संवेदनशील सत्ता अनेक बार उन्हें सुनती है और सुनकर विरोध की कार्रवाइयों में छिपे सुझावों को मानकर सामंजस्य पर आधारित जनतंत्र को आकार देती है। प्रतिरोध की कार्रवाइयों के प्रारूप, भाव और संदेश सत्ता को भी कई बार जनता से संवाद के लिए प्रेरित करते हैं, तो कई बार मजबूर भी करते हैं। देखने में यह आता है कि कई बार विरोध आंदोलन सत्ता को सौम्य बना देते हैं, और कई बार इसका उल्टा होता है, जब सरकारें विरोध आंदोलनों को सौम्य बना देती हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 27 january