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मतदान से पहले कितना सोचते हैं हम

बीजू डॉमीनिक

क्या वोटिंग एक तर्कसंगत प्रक्रिया है? यदि ऐसा है, तब तो आम मतदाता अपने फैसले पर पहुंचने से पहले काफी सोच-विचार करता होगा। मसलन, उम्मीदवार किस पार्टी से हैं? साल 2014 में जो पार्टी सत्ता में आई थी, उसने क्या-क्या वादे किए थे? उनमें से कितने प्रतिशत वादे पूरे हुए? उन्होंने जो वादे किए थे, उन्हें पूरा न कर पाने के लिए क्या उनके पास वाजिब वजहें हैं? किस पार्टी के पास भविष्य के वादों को पूरा कर सकने की अधिक संभावनाएं हैं? जाहिर है, इन सबके जवाब के लिए उसे कई आंकड़ों से गुजरना पड़ेगा। जैसे, सकल घरेलू उत्पाद, राजकोषीय आंकड़े, मुद्रास्फीति, रोजगार सृजन आदि। इसलिए इसमें संदेह है कि एक शिक्षित मतदाता भी अपना वोट डालने से पहले इतना गहरा विश्लेषण करता होगा। अगर वोटिंग तार्किक विश्लेषणों पर आधारित नहीं है, तो फिर हमारे मतदाताओं का विशाल बहुमत, जिनमें से ज्यादातर साक्षर हैं, आखिर किस बिना पर अपना फैसला करता है?
पुराने दिनों में देश में बूथ कैप्चरिंग के जरिए चुनावी नतीजों को प्रभावित करना बहुत आम बात थी। लेकिन गुप्त बैलेट और सुरक्षा बंदोबस्त में मजबूती के कारण यह माना जाता है कि अब ज्यादातर चुनाव निष्पक्ष होते हैं। पर हकीकत यह है कि आज भी चुनावों में हेराफेरी होती है। राजनेता मतदाताओं के मतदान केंद्र में प्रवेश करने से काफी पहले उन्हें प्रभावित करके चुनाव प्रक्रिया में हेराफेरी करते हैं। राजनीतिक पार्टियां इस हेराफेरी के लिए मानव व्यवहार की बारीक समझ का इस्तेमाल करती हैं।
ऊपरी तौर पर, मतदान एक व्यक्तिगत कार्य की तरह दिखता है, जिसके तहत हर शख्स अपनी पसंद या नापसंद के आधार पर वोट डालता है। मगर जाने-माने सामाजिक मनोवैज्ञानिक और द राइटियस माइंड : वाई गुड पीपुल आर डिवाइडेड बाइ पॉलिटिक्स  के लेखक जोनाथन हाइट के मुताबिक, मतदाता हर बार अपने हितों को देखकर मतदान नहीं करता, बल्कि वह अपने समूह के हितों को ज्यादा महत्व देता है। एक अन्य सामाजिक मनोवैज्ञानिक हेनरी टाइफल ने सामाजिक पहचान की अवधारणा पेश की है, जो लोगों की इस भावना से जुड़ी है कि वे कौन हैं? टाइफल ने बताया है कि खुद की छवि निखारने के लिए हम उस समूह के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बातें करते हैं, जिनसे हम जुड़े होते हैं। ऐसा करने के लिए हम उस समूह के बारे में नकारात्मक बातें भी फैला सकते हैं, जिनसे हम जुडे़ नहीं होते। इसके लिए हम समान समूहों के बीच की समानता और असमान समूहों के बीच के भेद को अतिरंजित तौर पर पेश करते हैं।
विकासवाद के शुरुआती समय से मानव की प्रवृत्ति ऐसे समूहों के गठन की रही है, जो न सिर्फ उसकी मदद करे, बल्कि दूसरे समूह से टकराने में भी पीछे  न रहे। पुराने दिनों में, किसी की जाति वही होती थी, जिस कबीले से वह जुड़ा होता था। आज, ऐसे समान समूह के गठन के मजबूत कारक धर्म, जाति, नस्ल और भाषा बन गए हैं। ज्यादातर देशों में तो सामाजिक मुद्दों पर विमर्श भी इन्हीं कारकों पर होता है, खासकर कट्टरपंथी समूहों में।
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक और द नेचर ऑफ प्रीजुडिस के लेखक गॉर्डन डब्ल्यू अलपोर्ट के मुताबिक, जीवन को लेकर ज्यादातर लोगों की सोच में धर्म एक अहम पहलू है। धर्म अमूमन विश्वास से कहीं बड़ा प्रतीक होता है। यह अपने संस्थागत ढांचे में विभाजक भी है। इसीलिए कोई आश्चर्य नहीं कि दुनिया के कई हिस्सों में धर्म और धार्मिक विश्वास किसी इंसान के मतदान व्यवहार को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अपने देश में एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहचान ‘जाति’ है। कुछ मामलों में तो जातिगत पहचान धर्म की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
राजनेताओं में स्वाभाविक ही इस सामाजिक पहचान की बेहतर समझ होती है। इस सबकी शुरुआत चुनावी उम्मीदवार के चयन से ही शुरू हो जाती है। हर निर्वाचन क्षेत्र में मौजूद धार्मिक और जातिगत समूहों के आकार को समझने के लिए राजनीतिक दल थोड़ा-बहुत विश्लेषण करेंगे और फिर ज्यादातर पार्टियां ऐसे उम्मीदवारों का चयन करेंगी, जो अपने-अपने क्षेत्र में सबसे बड़े धार्मिक या जाति समूह से संबंधित होंगे। राजनेताओं के पास वैसे मुद्दों को हवा देकर जटिल मुद्दों के ‘नैरेटिव’ गढ़ने की क्षमता होती है, जो या तो लोगों को विभाजित करते हैं या फिर उन्हें एक साथ लाते हैं। 
मौजूदा चुनाव पहले से कहीं ज्यादा ध्रुवीकरण का गवाह बना है। जब कभी पहचान संबंधी प्रतीकों के आधार पर ध्रुवीकरण होता है, तो बड़े से बड़े तर्कवादी के लिए ऐसा रुख अपनाना मुश्किल हो जाता है, जो दूसरे समूह के अनुकूल हो। ऐसी स्थिति में हम शायद ही अपने समूह के खिलाफ जाकर मत डाल पाते हैं। यदि खिलाफ जाते हैं, तो फिर अपने साथियों और समुदाय की नजर में विश्वासघाती बनने का जोखिम उठाते हैं।
ध्रुवीकरण की हवा मतदाताओं के जेहन से अपने चहेते नेताओं की राजनीतिक गलतियां आसानी से मिटा देती है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की एलिजाबेथ फेल्प्स के एक अध्ययन के मुताबिक, कोई इंसान किसी विदेशी समूह द्वारा की गई आतंकी वारदात की तुलना में अपने समूह द्वारा की गई वैसी ही निंदनीय घटना को कहीं तेजी से भुला सकता है। अपने समूह के बारे में अपनी धारणाओं को उचित ठहराने के लिए हम तथ्य गढ़ने से भी नहीं हिचकते। चर्चित विकासवादी मनोवैज्ञानिक स्टीवन पिंकर ने कहा है कि मन का एक काम सच के करीब दिखने वाली धारणाओं की बजाय उन विश्वासों को कुबूल करना है, जो विश्वास-धारक को अधिकाधिक सहयोगियों, संरक्षकों या अनुयायियों के करीब लाते हैं।
राजनीतिक वैज्ञानिक अक्सर ‘इंस्ट्रूमेंटल’ यानी उम्मीदवारों के व्यक्तित्व या सामाजिक पहचान की बजाय उसकी नीतियों पर किए जाने वाले मतदान और ‘एक्सप्रेसिव’ यानी उम्मीदवारों या पार्टियों के प्रति समर्पित होकर की जाने वाली वोटिंग में अंतर करते हैं। इंस्ट्रूमेंटल वोटर चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के उद्देश्य से मतदान करते हैं, जबकि एक्सप्रेसिव वोटर नतीजों की परवाह नहीं करते। ‘एक्सप्रेसिव वोटिंग’ को मनोवैज्ञानिक रूप से पुरस्कृत करने जैसा माना जाता है, मसलन ‘किसी की पहचान की पुष्टि करना’ या ‘संबद्धता की भावना को महसूस करना’। भारत में ज्यादातर मतदान ‘एक्सप्रेसिव’ हो रहे हैं। इसकी वजह राजनेताओं द्वारा मतदाताओं में उनके अस्तित्व को लेकर पैदा किया गया गहरा खौफ है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan Column on 26 april