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क्या दक्षिण फिर से वह रुतबा पाएगा

दिवंगत कुलदीप नैयर ने अपनी किताब बिटवीन द लाइन्स  में जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री की मौत के वक्त तत्कालीन कांग्रेस (जो उस समय सबसे ताकतवर पार्टी थी) में उपजे उत्तराधिकार-संघर्ष को बखूबी समेटा है। दोनों मौकों पर पार्टी अध्यक्ष कामराज नाडार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। जब भी उनसे पूछा जाता कि अब आगे क्या करना है, तो वह तमिल का एक शब्द दोहराते- पार्कलम, यानी देखेंगे। उनकी दो मुख्य चिंताएं थीं। एक, पार्टी की एकता को बनाए रखना और दूसरी, यह सुनिश्चित करना कि नया प्रधानमंत्री पूरे देश को एकजुट रख सके। 
शुरुआत के तीन प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश के थे। यह सूबा आज की तरह तब भी लोकसभा में सबसे अधिक प्रतिनिधि भेजता था। बिहार को साथ मिलाने पर आज भी इन दोनों राज्यों से 120 सांसद निचले सदन में पहुंचते हैं। लिहाजा अचरज नहीं है कि 1991 में अटल बिहारी वाजपेयी और 2014 में नरेंद्र मोदी ने क्रमश: लखनऊ और वाराणसी से चुनाव लड़ने का फैसला किया। उधर, दक्षिण भारत को अलग-अलग सांस्कृतिक चरित्र वाले पांच राज्यों और लक्षद्वीप व पुडुचेरी जैसे दो केंद्रशासित क्षेत्रों में भले बांटा गया, लेकिन ये सूबे 1991 तक सत्ता-शिखर का आधार नहीं बन पाए थे। दक्षिण से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने वाले पहले नेता पी वी नरसिम्हा राव थे। राव एक भाषाई इलाके के नेता से कहीं ऊंची हैसियत रखते थे। वह असाधारण भाषाविद् थे, जिनका हिंदी पर भी पूरा अधिकार था और जिन्होंने तेलुगु अनुवाद के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी पाया था। इतना ही नहीं, उन्हें उर्दू पढ़ने में महारत हासिल थी, वह तमिल और  मराठी जानते थे और स्पेनिश में भी उन्होंने ऊंची डिग्री हासिल की थी।
बावजूद इसके सच्चाई यही है कि 1996 के आम चुनावों में बुरी तरह हार से पहले तक कांग्रेस दक्षिण पर भरोसा कर सकती थी। यहां तक कि सन 1977 में भी, आपातकाल और उसमें किए गए अत्याचार शायद ही दक्षिण में मुद्दा बन पाए थे। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने तब 130 में से 116 सीटें जीती थीं और यह पैटर्न 1989 में भी दिखा था, जब राजीव गांधी चुनाव हार गए थे। हालांकि तब तक शक्तिशाली क्षेत्रीय दल तेलुगु और कन्नड़भाषी इलाकों में आकार लेने लगे थे, जैसा कि सन 1967 के बाद तमिलनाडु में हुआ था। तमिलनाडु में बदलाव कहीं ज्यादा उल्लेखनीय माना जाएगा, क्योंकि यहां उसके बाद से सत्ता सिर्फ दो द्रविड़ दलों में से किसी एक के पास रही है। मगर 2014 में कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, दोनों राज्यों में भी अपनी पकड़ गंवा दी, जबकि ये लंबे अरसे से उसके गढ़ रहे थे। 
आज 2019 में न तो कांग्रेस और न ही सत्तारूढ़ भाजपा दक्षिण में मजबूत स्थिति में है। हालांकि वाजपेयी के समय से ही भाजपा कर्नाटक में बड़ी ताकत रही है और 1999 को छोड़कर वहां की ज्यादातर लोकसभा सीटें उसके खाते में ही आई हैं। मगर 1965 में भाषा नीति का विरोध करने वाले राज्य तमिलनाडु में अब भी इसे ‘हिंदी वाला’ टैग मिला हुआ है। केरल में अभी भी उसे अपने लिए रास्ता तैयार करना है। वैसे यहां सबरीमाला मंदिर विवाद के कारण वह तमाम परंपरावादी गुटों को एक साथ लाने में कामयाब रही है। उधर, आंध्र प्रदेश में दो स्थानीय क्षत्रप ही चुनावी अभियान में आगे हैं। 
इस सूरतेहाल में क्या दक्षिण मायने रखता है? यह बहुत कुछ हिंदीभाषी राज्यों पर निर्भर करेगा। हिंदीभाषी नौ राज्यों में 226 सीटें हैं और पांच साल पहले मोदी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने इनमें से 203 सीटें जीती थीं। इस तरह का ‘क्लीन स्वीप’ 1977 के बाद से नहीं दिखा था, जब कांग्रेस उत्तर भारत में महज दो सीटों में सिमट गई थी। 2014 में कई कारक एनडीए के पक्ष में थे, लेकिन दो का उल्लेख जरूरी है- पहला, हताश कांग्रेस और दूसरा, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा झारखंड जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विभाजित विपक्ष। मगर अब मध्य और उत्तर पश्चिम भारत के तीन सूबों में कांग्रेस के सत्ता में वापस आने और गंगा-क्षेत्र में महत्वपूर्ण गठबंधन बन जाने से तस्वीर काफी हद तक बदल चुकी है। इसके नतीजे क्या होंगे, यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन उत्तर भारत सहित देश भर में कांग्रेस के अलावा किसी भी पार्टी ने दो लगातार आम चुनावों में बडे़ पैमाने पर सीटें हासिल नहीं की हैं। अगर नरेंद्र मोदी ऐसा कर पाते हैं, तो वह एक इतिहास बनाएंगे। 
दूसरा विचारणीय मसला यह है कि 1989 से 2014 तक तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्य गठबंधन सरकारों के जरिए केंद्रीय सत्ता में रहे। आंध्र प्रदेश तो खासकर एक प्रमुख औद्योगिक और विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरा, पर यह दौर 2014 में समाप्त हो गया। तमिलनाडु और कर्नाटक में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी का असंगत प्रभाव पड़ा है, क्योंकि नई प्रणाली को अपनाने के लिए लघु एवं मध्यम उद्योग तैयार नहीं थे। इससे भी अधिक गंभीर बात यह रही कि नए वित्त आयोग ने अन्नाद्रमुक सरकार को बचाने के लिए जो कदम उठाए, उसने भी तमाम राज्यों को विरोध करने को मजबूर कर दिया। केंद्र व राज्यों के बीच वित्तीय संबंध काफी गंभीर मसला होता है और 23 मार्च के बाद से लगता है कि दबदबे वाली क्षेत्रीय पार्टियां अपने हक में सौदेबाजी कर सकती हैं। 
भारतीय उप-महाद्वीप में क्षेत्रीय राष्ट्रवाद की एक विशेषता भी महत्वपूर्ण है। यहां धार्मिक अल्पसंख्यक लंबे समय से समाज का अटूट हिस्सा रहे हैं। नरसिंह का अहोबिलम रथ सिर्फ विष्णु के अवतार के लिए प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि इसलिए भी है कि यह रथ परंपरागत रूप से मुसलमानों द्वारा खींचा जाता है। लेकिन पुराने हैदराबाद और केरल के कुछ हिस्सों को छोड़ दें, तो मुस्लिम पार्टियों ने शायद ही यहां कभी अच्छा प्रदर्शन किया है। क्षेत्रीय संस्कृति और भाषाएं हमें तमाम धारणाओं के पार एकजुट करती हैं। 
यह सवाल मौजूं है कि भारत पर कौन राज करेगा? बड़ा सवाल यह भी है कि नई दिल्ली में कौन-सी पार्टी सरकार बनाएगी? मगर भारत में शासन का आधार भाषाई बहुलता के प्रति संवेदनशीलता और विभिन्न क्षेत्रों के अलग-अलग आर्थिक हित हैं। साक्षरता, शहरीकरण, और बेहतर सामाजिक कार्यक्रमों के कारण दक्षिण ने कहीं अधिक हैसियत हासिल की है। लिहाजा, 2019 का एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या यह क्षेत्र फिर से राजनीतिक दबदबा हासिल करेगा?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 24 april