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साझे सपनों वाले समाज की ओर 

 विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी

जलियांवाला बाग हत्याकांड के सौ वर्ष होने पर एक नई बहस ने जन्म ले लिया है और यह किसी भी तरह से अप्रासंगिक नहीं है। ब्रिगेडियर जनरल डायर को हम उसकी क्रूरता के लिए कोस सकते हैं, पर क्या हमें यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि उसके अधीन उन पचास से अधिक फौजियों की अंतरात्मा को क्या हो गया था, जिन्होंने बिना किसी ना-नुकुर के एक गोरे सेनानायक के आदेश पर अपने ही देशवासियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं और जैसा कि डायर ने अपने कोर्ट मार्शल में स्वीकार किया था कि फार्यंरग तभी बंद की, जब सैनिक टुकड़ी के पास गोलियां खत्म हो गईं? 1857 के बाद 1930 में पेशावर के निहत्थे पठानों पर हवलदार चंद्र सिंह के नेतृत्व में गढ़वाली सैनिकों द्वारा आदेश मिलने के बाद भी गोली चलाने से इनकार को अपवाद ही कहा जाएगा, क्योंकि आम तौर से भारतीय सिपाही अंग्रेज कमांडरों के हुक्म की तामील करने को उत्सुक रहते थे। 
इन दिनों, जब जलियांवाला बाग को शिद्दत से याद किया जा रहा है और बहस चल रही है कि ब्रिटिश सरकार का सिर्फ खेद प्रकट करना काफी है या उन्हें माफी भी मांगनी चाहिए, तभी सोशल मीडिया पर गश्त कर रही एक दिलचस्प पोस्ट पर मेरी नजर पड़ी। एक भारतीय, जो हांगकांग में रहते हैं, यह देखकर बड़े दुखी थे कि बहुजातीय समाज हांगकांग में भारतीयों के प्रति आम नागरिकों की राय बड़ी खराब है। उत्सुकतावश उन्होंने लोगों से कारण जानने की कोशिश की, तो पता चला कि इस दुर्भावना के पीछे ऐतिहासिक घटनाक्रम हैं। 1840 के दशक में जब अंग्रेजों ने हांगकांग को अपना उपनिवेश बनाया, तो उन्हें शासन चलाने के लिए पुलिस की जरूरत पड़ी। जल्द ही उनकी समझ में आ गया कि स्थानीय निवासी काम के नहीं हैं। वे अपने ब्रिटिश कमांडरों के हुक्म पर जनता के साथ ज्यादती करने के लिए तैयार नहीं थे। तब अंग्रेजों को अपने दूसरे उपनिवेश भारत की याद आई और हांगकांग पुलिस की नींव के पत्थर बने भारतीय सिपाही। इन भारतीय सिपाहियों को जब अपने देशवासियों के साथ बर्बरता करने में कोई संकोच नहीं होता था, तो भला विदेशियों को वे क्यों बख्शते! ये उनकी ज्यादतियों की स्मृतियां हैं, जो आज भी हांगकांग वासियों के मन में भारतीयों के लिए कटुता को जीवित रखे हुए है।
इन दोनों घटनाओं में क्या संबंध हो सकता है? थोड़ी तटस्थता के साथ यदि हम समाजशास्त्रीय औजारों से भारतीय मन को छिलें, तो हमें इन दोनों के बीच अद्भुत समानता दिखेगी। इनका संबंध भारतीय  समाज के उस सामान्य व्यवहार से भी जोड़ा जा सकता है, जिसके  तहत खैबर दर्रे को पार   करने के बाद मुट्ठी भर आक्रांता अपने से कई गुना बड़ी सेना को पीटते हुए दिल्ली या सोमनाथ तक धावा बोलते चले जाते थे और खेती, किसानी, दस्तकारी, व्यापार या दूसरी नागरिक गतिविधियां चलती रहती थीं। अगर उन्हें न छेड़ा जाए, तो आम जन निरपेक्ष भाव से बगल से गुजरते धूल उड़ाते घोड़ों को देखते और अपने काम-धंधों में लगे रहते। दुनिया के किसी भी समाज में अपने शासकों को लेकर इतनी निर्लिप्त दृष्टि दुर्लभ थी। सिर्फ महाकाव्य के पात्र के रूप में ही नहीं, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में भी भारतीय कोउ नृप होउ हमहि का हानी में विश्वास रखते थे। ऐसा कैसे था कि आबादी के एक बडे़ हिस्से का राज्य में कोई दांव नहीं था और क्या यही कारण तो नहीं था कि हम सही अर्थों में एक राष्ट्र नहीं बन पाए?
भूगोल ने भारत को राष्ट्र बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। समुद्र और पहाड़ों से घिरे, अच्छी आबो-हवा और पर्याप्त पानी वाले इस भूभाग को केवल एक संस्था ने राष्ट्र नहीं बनने दिया। भारतीय समाज को कई हजार वर्षों तक संचालित करने वाली वर्ण-व्यवस्था ने कभी भी समाज के सभी सदस्यों के सपने, सुख-दुख, उनकी चिंताएं और चुनौतियां साझा नहीं होने दीं। इसके प्रावधानों के तहत शास्त्र और शस्त्र, दोनों पर एक छोटे से तबके का अधिकार था। फलस्वरूप एक तरफ तो हम दुनिया के सबसे बडे़ शिक्षा विरोधी समाज बने रहे और ज्ञान-विज्ञान के वैश्विक भंडार में हजारों सालों तक कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं कर सके। दूसरी तरफ, भारत दुनिया का शायद अकेला बड़ा देश होगा, जिसके खाते में एक भी उल्लेखनीय सैनिक विजय नहीं है। 1971 में एक राष्ट्र के रूप में पहली बड़ी विजय हमने हासिल की, पर तब तक वर्ण व्यवस्था की चूलें लगभग हिल चुकी थीं और तत्कालीन भारतीय सेना किसी एक समूह से नहीं, बल्कि मुख्य रूप से दलित और पिछड़ी जातियों से मिलकर बनी थी।
जातियों में बंटे समाज में यह कोई अस्वाभाविक नहीं था कि व्यक्ति की पहली निष्ठा उसकी अपनी जाति के प्रति रहती थी। काफी हद तक कबीलाई समाजों जैसी स्थिति थी, पर जहां कबीलों में धर्म एक जोड़ने वाले सूत्र का काम करता, यहां जनसंख्या का बड़ा हिस्सा धार्मिक विमर्शों से भी बाहर था। उनके लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि राजधानी में गद्दी पर कौन बैठा है? इस विरोधाभास पर भी हमारा ध्यान जाना चाहिए कि देश के दबे-कुचले तबकों को अक्सर बाहर से आए आक्रांता शासकों से सर्वजनीन शिक्षा या सेना में भर्ती जैसे अधिकार मिले थे। अंगरेजों ने खास तौर से इस सामाजिक अंतर्विरोध का भरपूर लाभ उठाया। उन्होंने भारतीय सेना को जातियों पर आधारित रेजीमेंटों के रूप में खड़ा किया। 
पिछले दो सौ वर्षों के भीतर भारत में सही अर्थों में एक राष्ट्र-राज्य बनने की प्रक्रिया शुरू हुई है और इसकी शुरुआत वर्ण-व्यवस्था के कमजोर होने से हुई है। इसमें गांधी और आंबेडकर की बड़ी भूमिका है। एक तरफ, लोगों ने उस मूर्खतापूर्ण अवधारणा को नकारना शुरू कर दिया, जिसके तहत किसी खास जाति में जन्म के कारण कोई श्रेष्ठ या अधम हो जाता था और फिर इससे भी एक कदम आगे बढ़कर अब उन्होंने जातियों के समूल विनाश की बात करनी शुरू कर दी है। चूंकि भारतीय समाज में वर्ण की चेतना गहरे पैठी है, इसलिए परिवर्तन बहुत धीमी गति से हो रहा है, पर हो रहा है, इसमें कोई शक नहीं है। 
संविधान और उससे मिले समानता के अधिकार हमारे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को सारे विचलनों के बावजूद एक ऐसा राष्ट्र-राज्य बनाने में समर्थ हैं, जहां नागरिकों के एक जैसे सपने और साझे सुख-दुख हों। ऐसे समाज में ही हम उम्मीद कर सकते हैं कि फिर कभी जलियांवाला बाग में खडे़ होकर देसी सिपाही विदेशी शासकों को खुश करने के लिए अपने ही देश वासियों पर अंधाधुंध गोलियां नहीं चलाएंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan Column on 23 april