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अतीत से चिपके वाम का भविष्य 

रामचंद्र गुहा, प्रसिद्ध इतिहासकार

मई के तीसरे सप्ताह में मैं केरल में था। कुछ ही दिनों में लोकसभा चुनाव के परिणाम आने वाले थे। साफ लग रहा था कि आजादी के बाद पहली बार संसद के निचले सदन में वामपंथी एकल अंक में रहेंगे। मैं एक राष्ट्रीय शक्ति पर ग्रहण लगने की पूर्व संध्या पर भारत के अकेले वाम-शासित राज्य में था। मैं केरल शास्त्र साहित्य परिषद के वार्षिक सम्मेलन में उद्बोधन के लिए वहां गया था। परिषद की स्थापना 1960 के दशक की शुरुआत में शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के समूह ने की थी। इसका नारा है- सामाजिक क्रांति के लिए विज्ञान। 
केरल शास्त्र साहित्य परिषद किसी पार्टी का संगठन नहीं है। कभी-कभी परिषद ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) की राज्य इकाई से भी लोहा लिया है। इसके अनेक सदस्य संभवत: कांग्रेस को वोट देते हैं (शायद कुछ थोड़े से भाजपा को भी)। बहरहाल, अपने जन्म और विकास में यह परिषद केरल के वाम आंदोलन से गहरे प्रभावित रही है। इस परिषद जैसा कोई संगठन भारत के किसी अन्य राज्य में नहीं है। यहां तक कि पश्चिम बंगाल में भी नहीं, जहां वामपंथी लंबे समय तक शासन में थे। शायद ऐसा इसलिए है, क्योंकि बंगाली माक्र्सवाद हमेशा भद्रलोक के मुहावरे से प्रभावित रहा है। बंगाली माक्र्सवाद प्रकृति से साहित्यिक और बुद्धिजीवी है, जबकि मलयाली माक्र्सवाद ज्यादा व्यावहारिक और जमीन से जुड़ा है। 
चुनावी पैमाने पर देखें, तो भारत में वर्ष 2019 वाम आंदोलन के पतन और 2004 उच्चतम बिंदु को दर्शाता है, जब वामपंथी पार्टियों के पास संसद में 60 से ज्यादा सीटें थीं। बंगाली अब भी 1996 में ज्योति बसु के प्रधानमंत्री न बनने का अफसोस करते हैं। लेकिन सिंहावलोकन से पता चलता है कि 2004 में ज्यादा बड़ी गलती हुई, जब माकपा और भाकपा मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार में शामिल नहीं हुई थीं। वर्ष 1996-98 में संयुक्त मोर्चा सरकार अल्पमत में थी और अगर उसका नेतृत्व ज्योति बसु करते भी, तो दो वर्ष के अंदर सरकार को गिर जाना था। दूसरी ओर, यूपीए सरकार दो संपूर्ण कार्यकाल तक चली, यदि वामपंथी कैबिनेट में शामिल होते, और शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे विभागों का दायित्व संभालते, तो इससे लोगों की जिंदगी सुधरने में मदद मिल सकती थी, साथ ही, पूरे देश में पार्टी की दृश्यता और कद में बढ़ोतरी होती। 
त्रासद है, माकपा लेनिनवादी हठधर्मिता से बंधी हुई थी, जिसने उसे एक बुर्जुवा सरकार में सहयोगी भूमिका में आने नहीं दिया। राष्ट्रीय स्तर पर संसदीय वामपंथी 2004 की उच्चता से 2019 की निम्नता तक आ गिरे हैं। वे त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में सत्ता से बाहर हैं और इन राज्यों में उनका फिर से सत्ता में आना संभव नहीं दिखता। केरल में सामान्य तौर पर वाम और कांग्रेस की बारी-बारी से सरकार बनती रही है, तो अब जब विधानसभा चुनाव होंगे, तब वामपंथी यहां भी खुद को विपक्ष में पाएंगे। 
आज भी भारत में कुछ प्रसिद्ध लेखक और कलाकार खुद को वामपंथ के साथ मानते हैं। हालांकि, राजनीति और जनजीवन पर प्रभाव के मामले में वामपंथी इतने खराब हाल कभी नहीं थे। क्या यह बदल सकता है? क्या यह राजनीतिक गिरावट परिवर्तनशील है? 
यह सोचना कठिन है कि वाम कभी अपने उस राजनीतिक रसूख को वापस पा सकेगा, जो उसे पहले हासिल था। इतिहास अजीब और अप्रत्याशित तरीके से व्यवहार करता है। किसने कल्पना की होगी कि समाजवाद अमेरिका जैसे सबसे पूंजीवादी देश में पुनरोत्थान का अनुभव करेगा? भारत आज भी व्यापक सामाजिक असमानताओं की भूमि है। व्यावहारिक रूप से न सही, सैद्धांतिक रूप से यह वाम के लिए उर्वर भूमि है। यदि वाम भारत में फिर राख से उठकर खड़ा होना चाहता है या ऐसी कोई आशा करता है, तो यह पहली चीज उसे अवश्य करनी चाहिए कि वह ज्यादा भारतीय बन जाए। 
वर्ष 1920 में, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना से कुछ ही वक्त पहले, मुंबई के माक्र्सवादी एस ए डांगे ने एक पर्चा लिखा था, जिसमें उन्होंने लेनिन को गांधी से ऊपर बताया था। तब से भारतीय वामपंथियों ने अपने नायकों को देश में नहीं, बल्कि देश से बाहर ही पाया है। लेनिन और माओ जैसों की भारत या भारतीय समाज के बारे में न तो कोई समझ थी और न उनमें बहुदलीय लोकतंत्र की खूबियों के प्रति प्रशंसा भाव था। गांधी और आंबेडकर जैसे स्वदेशी चिंतकों की कीमत पर विदेशी नायकों को पूजते हुए वामपंथी भारतीय सच्चाइयों से परे चले गए।
भारत में 1920 के दशक में साम्यवाद के विकास के समांतर स्वदेशी समाजवादी परंपरा ने भी आकार लिया था। कमलादेवी चट्टोपाध्याय, राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण इसके उदाहरण थे। इन सबकी भारतीय समाज के बारे में समझ अपने साम्यवादी समकालीनों की तुलना में ज्यादा वास्तविक थी। लैंगिक विषय पर कमलादेवी, वर्ग पर लोहिया, राजनीतिक विकेंद्रीकरण पर जेपी के विचार इन विषयों पर डांगे और नंबूदरिपाद के विचार से ज्यादा धारदार थे। यह इसलिए कि समाजवादी नेता जमीन पर जो देखते थे, उससे प्रेरित होते थे, जबकि वामपंथी नेता लेनिन और स्टालिन के बनाए मार्ग का यांत्रिक ढंग से अनुसरण करते थे। क्या समाजवादियों की विरासत से सीखने में भारतीय वामपंथियों ने काफी देर कर दी है? वे समाजवादियों की तरह ही अपना भारतीयकरण कर सकते हैं और शायद समाजवादी तमगा भी स्वीकार कर सकते हैं।
21वीं सदी के दिमाग के लिए कम्युनिस्ट शब्द शायद अत्याचार और अधिनायकवाद से जुड़ा है। दूसरी ओर, समाजवादी शब्द ज्यादा सौम्य है। सच है, अभी उत्तर प्रदेश में समाजवाद एक पारिवारिक दल द्वारा गलत ढंग से संचालित हो रहा है। लेकिन इस तमगे के पुनग्र्रहण का प्रयास कारगर हो सकता है, और इसके कारगर सिरों पर फिर से काम करना होगा। 
लोकसभा चुनाव के बाद विभिन्न वामपंथी दलों को एकजुट करने या एक ही मंच पर लाने की जरूरत पर चर्चा हो रही है। नई एकीकृत पार्टी को एक नए नाम की जरूरत पड़ेगी। मैं सलाह दूंगा कि ‘कम्युनिस्ट’ शब्द को छोड़ दिया जाए और इसकी जगह ‘डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट’ के रूप में खुद को चरितार्थ किया जाए। वाम के पुनर्नवा होने की दिशा में शायद यह पहला विनीत कदम होगा। तभी वाम अपने लिए भविष्य का दरवाजा खोलेगा, जबकि अभी तो उसके पास केवल अतीत है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 22 june