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परेशान देश में घबराना नहीं का लतीफा

विभूति नारायण राय पूर्व आईपीएस अधिकारी

आम जन का हास्य बोध अक्सर प्रभु वर्गों से भिन्न होता है। इसलिए अगर किसी समाज में ‘घबराना नहीं’ लतीफा बन जाए, तो यह समझ लेना चाहिए कि वहां कुछ ऐसा घट रहा है कि लोग घबराए हुए हैं। कुछ दिनों पहले भारत में ‘अच्छे दिन’ के साथ जो सुलूक आम जन ने किया था, वही आज पड़ोसी पाकिस्तानी समाज में ‘घबराना नहीं’ के साथ हो रहा है। मुश्किल वक्त में आम जन का हास्य बोध ही उसे चुनौतियों से निपटने में मदद करता है, इसलिए कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आज जब रुपये की गिरती कीमत और बेतहाशा बढ़ती महंगाई से पिसते पाकिस्तान के साधारण लोग अपने प्रधानमंत्री के भाषणों में बार-बार दोहराए जाने वाले ‘घबराना नहीं’ की टेक पर तरह-तरह के लतीफे गढ़ रहे हैं।
अपने जुमलेबाज भाषणों से जनता को विश्वास दिलाकर कि वह डूबती पाकिस्तानी नैया के खिवैया बन सकते हैं, इमरान खान पिछले वर्ष सत्ता पर काबिज हुए थे, लेकिन इतनी जल्द इस महानायक से मोहभंग हो जाएगा, इसकी उम्मीद तो उनके धुर विरोधियों को भी नहीं थी। यह इसलिए भी चौंकाने वाला है कि सालों बाद पाकिस्तान को ऐसी सरकार मिली थी, जिसे फौज का पूरा समर्थन हासिल है। विरोधी आज भी उन्हें इलेक्टेड की जगह सेलेक्टेड पीएम कहने से नहीं चूकते हैं। फिर ऐसा 
क्या हुआ कि इतनी जल्दी स्थितियां उनके काबू से          बाहर हो गईं? 
अनुभवहीनता से अधिक बड़बोलापन इमरान की लोकप्रियता में गिरावट का कारण बना। उनका दावा था कि पाकिस्तानी समाज के समक्ष मौजूद तीनों मुख्य समस्याओं यथा भ्रष्टाचार, इस्लामी कट्टरपंथ और फलस्वरूप अंतरराष्ट्रीय जगत में पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जाने का आसन्न खतरा तथा चौपट हो चुकी अर्थव्यवस्था के फौरी हल उनके पास हैं। वह अपने विरोधियों को चोर-डाकू से संबोधित करते थे और सत्ता में आते ही सबको जेलों मे ठूंस देने के दावे करते थे। नई सरकार में आधे दर्जन से अधिक ऐसे मंत्री महत्वपूर्ण कुर्सियों पर बैठे हैं, जो पिछली सरकारों में भी थे और जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी थे। 
इसी तरह कट्टरपंथियों के खिलाफ भी इमरान की नीति एक कदम आगे और दो कदम पीछे वाली रही है। विपक्ष में रहते हुए तालिबान से उनके रिश्ते किसी से छिपे नहीं थे, यहां तक कि उनको तालिबान खान भी कहा जाता था। विपक्ष में रहते हुए तालिबान के खिलाफ फौज के इस्तेमाल और अमेरिकी ड्रोन हमलों का विरोध एक बात थी और शासन में आकर उनके खिलाफ कार्रवाई न कर अंतरराष्ट्रीय जगत में अलग-थलग पड़ जाने की संभावना एकदम भिन्न विकल्प था, जिसे कोई भी आधुनिक राष्ट्र-राज्य नहीं चुन सकता। इस मोर्चे पर इमरान का संकट इसी अंतर्विरोध की उपज है ।
प्रधानमंत्री इमरान और समूचे पाकिस्तानी राष्ट्र के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती लगभग तबाह हो चुकी अर्थव्यवस्था है। कर्जों के बोझ से दबे पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार उस खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है, जहां कभी भी ऐसी नौबत आ सकती है कि उसके लिए कर्जों की अदायगी की किस्तें चुकाना भी संभव न रह जाए। तमाम सदिच्छाओं के बावजूद निर्यात में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हो पा रही और आयात-निर्यात का फर्क बढ़ता ही जा रहा है। हालत यह है कि देश का छीजता विदेशी मुद्रा भंडार मुश्किल से कुछ हफ्तों के आयात बिल का भुगतान करने में ही समर्थ है। यह स्थिति सिर्फ पाकिस्तानी राष्ट्र के लिए अस्तित्व के संकट की तरह नहीं है, वरन इससे निपटते हुए इमरान की पूरी विश्वसनीयता ही संदिग्ध हो गई है। अपने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान इमरान विदेशी कर्जों के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं। यहां तक कि वह अपने भाषणों  में अक्सर ललकारते थे कि आईएमएफ के पास कर्जा मांगने जाने की जगह वह आत्महत्या करना पसंद करेंगे। प्रधानमंत्री बनने के बाद जब उन्हें देश की चौपट अर्थव्यवस्था का एहसास हो भी गया, तो वह पूरी कोशिश करते रहे कि आईएमएफ के पास न जाना पडे़। उनके खास तौर से चुने वित्त मंत्री असद उमर भी सुर में सुर मिलाकर यही कहते रहे कि बिना आईएमएफ की शरण में गए भी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को संभाला जा सकता है। सफलता के नशे में चूर इमरान ने खुद को एक ऐसे विश्व नेता के रूप मे देखना शुरू कर दिया, जो कम से कम इस्लामी दुनिया का नेतृत्व तो कर ही सकता है। उन्होंने ताबड़तोड़ सऊदी अरब और यूएई की एक से अधिक यात्राएं कीं, पुराने मित्र चीन के पास भी गए, पर यह समझने में ज्यादा वक्त नहीं लगा कि यथार्थ बड़ा खुरदरा होता है। 
सदिच्छाएं और भावुकता बहुत दूर तक काम नहीं आते। जितना और जिन शर्तों पर पैसा इन मुल्कों से आया, उनसे पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था का कोई बहुत भला नहीं होने वाला। इस समझ के बाद एक बार फिर पूरी तरह से पलटी मारते हुए इमरान ने आईएमएफ की राह पकड़ी, पर इस बार मामला इतना आसान नहीं था। एक दर्जन से अधिक बार आईएमएफ पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को उबार चुका है, पर इस बार परिस्थितियां काफी हद तक बदली हुई हैं। आईएमएफ के सबसे बडे़ भागीदार अमेरिका के लिए पाकिस्तान की रणनीतिक अहमियत अब समाप्त हो चुकी है, परिणामस्वरूप इस बार की शर्तें कुछ ज्यादा ही कड़ी थीं। महीनों के विचार-विमर्श के बाद झख मारकर पाकिस्तानी वार्ताकारों को उन्हें मानना ही पड़ा। यही नहीं, इमरान को वित्तीय प्रबंधन के लिए जिम्मेदार अपनी पूरी टीम को ही बदलना पड़ा। वित्त मंत्रालय और स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के मुखिया बदल दिए गए। 
उल्लेखनीय यह था कि ये दोनों आईएमएफ के कर्मचारी रहे हैं और पहले की सरकारों में जिम्मेदार पदों पर रह चुके हैं। कर प्रबंधन की नियामक संस्था एफबीआर का नेतृत्व भी एक गैर-नौकरशाह चार्टड अकाउंटेंट को सौंप दिया गया है। पर इन सारे कदमों का असर उलटा ही पड़ रहा है। रुपया एक डॉलर के मुकाबले डेढ़ सौ तक पहुंच गया है, बेतहाशा बढ़ी महंगाई ने रमजान के महीने में जनता की चीखें निकाल दी हैं। माना जा रहा है कि इन परिवर्तनों के पीछे सर्वशक्तिमान पाक सेना है, पर इसका मतलब कदापि नहीं है कि असफल होने पर जिम्मेदारियां बंटेंगी। पिछले अनुभव बताते हैं कि असफलता का ठीकरा तो नागरिक नेतृत्व यानी इमरान पर ही फूटेगा। 
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan Column on 21 may