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नेपाल में चीनी भाषा का नया खेल

पुष्परंजन संपादक  ईयू-एशिया न्यूज़

चिनियां भाषा सिकेर नेपाल मा के गर्ने? अर्थात, चीनी भाषा सीखकर नेपाल में क्या करेंगे? अपने विज्ञापन के जरिए इसे प्रोत्साहित करने वाले ‘नेपाल-चाइनीज एजुकेशनल ऐंड कल्चरल सेंटर’ ने पर्यटन, व्यापार और शिक्षा के तीन खांचे बनाकर इसके 13 फायदे गिनाए हैं। नेपाल में चीनी भाषा ‘मंदारिन’ सिखाना एक धंधा हो गया है। लंबे समय से जारी इस गोरखधंघे में कन्फ्यूशियस सेंटर समेत कई संस्थाएं शामिल हैं, जिन्हें चीनी दूतावास से संरक्षण प्राप्त है। इनके हौसले इतने बुलंद हुए कि बिना सरकारी अनुमति के ही स्कूलों में मंदारिन पढ़ाना अनिवार्य कर दिया। इसके वास्ते जो शिक्षक उपलब्ध कराए गए, उनका वेतन चीनी दूतावास के जरिए प्राप्त हो रहा था। 
भारत के सीबीएसई की तरह नेपाल सरकार की एक संस्था है- पाठ्यक्रम विकास केंद्र (सीडीसी), इसे हर शैक्षणिक सत्र के वास्ते विषय तय करना होता है, और उसकी सूचनाएं स्कूलों के लिए जारी करनी होती है। इस संस्था को भी नहीं पता था कि पिछले दरवाजे से किस तरह चीनी भाषा ने स्कूलों में प्रवेश कर लिया? ‘सीडीसी’ के महानिदेशक लेखनाथ पौडेल तक जब शिकायत पहुंची, तब उनकी नींद खुली। सरकारी इदारे से अलग, ‘नेपाल गार्जियन्स फेडरेशन’ और ‘प्राइवेट ऐंड बोर्डिंग स्कूल ऑर्गेनाइजेशन नेपाल’ (पीएबीएसओएन) तक को सूचना नहीं थी कि स्कूलों में मंदारिन अनिवार्य विषय के रूप में शामिल कर लिया गया है। स्कूल प्रबंधन द्वारा इन दोनों संस्थाओं को विधिवत सूचना देना अनिवार्य बताया गया है। इस गोरखधंधे की पोल जब नेपाली मीडिया के माध्यम से खुली, तब सरकार हरकत में आई। 
चीनी दूतावास इस हल्ला-हंगामे के बाद भी चुप्पी साधे हुए है। इसमें दो बातें गैर-कानूनी हैं। एक यह कि बिना सरकार की पूर्वानुमति के चीनी दूतावास ने अपने खर्चे पर मंदारिन पढ़ाने के लिए स्कूलों में शिक्षक नियुक्त किए। दूसरा, नेपाल के स्कूलों में कोई भी विदेशी भाषा स्कूल वाले समय में पढ़ाने की अनुमति नहीं है। किसी को विदेशी भाषा पढ़नी हो, तो इसके वास्ते स्कूल प्रबंधन पार्ट टाइम क्लास का इंतजाम कर सकता है। ऐसा नहीं कि काठमांडू और देश के प्रमुख शहरों का स्कूल प्रबंधन इस कायदे-कानून से अनजान था। मगर पैसे के लालच में और चीनी दूतावास की शह पर यह गैर-कानूनी धंधा जारी था। इस गड़बड़झाले में सरकारी और प्राइवेट, दोनों तरह के स्कूल बराबर के साझीदार थे। दिलचस्प यह है कि ओली सरकार ने विदेश मंत्रालय के माध्यम से एक बार भी चीनी दूतावास से विरोध व्यक्त नहीं किया। 
जून 2007 में कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट ने नेपाल में कदम रखा। अब इसका विस्तार त्रिभुवन विश्वविद्यालय और काठमांडू यूनिवर्सिटी तक हो चुका है। अपने दसवें स्थापना दिवस के समय कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट ने जानकारी दी थी कि केवल काठमांडू विश्वविद्यालय में 20 हजार छात्र चीनी भाषा सीख चुके हैं, यानी एक यूनिवर्सिटी से हर साल औसतन 2,000 छात्र मंदारिन सीखते रहे। यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी। कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट और चीनी दूतावास के सहकार से 2017 में 3,000 नेपाली छात्र मंदारिन में एडवांस कोर्स के लिए चीन भेजे जा चुके थे। उन्हीं छात्रों को लौटकर देश भर के स्कूलों व दूसरी संस्थाओं में मंदारिन पढ़ाना था। नेपाल में यह सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से चल रहा है। आज तो हालत यह है कि नेपाल के कई सारे तिब्बती मठों में मंदारिन की दीक्षा आरंभ हो गई है। उसके पीछे दोहरे लक्ष्य हैं। एक, तिब्बती भाषा का सफाया, साथ में शरणार्थी लामाओं की गतिविधियों पर नजर रखना।
मंदारिन किस तरह से लोगों की जिंदगी में पैसे जोड़ रही है, इसका एक छोटा सा उदाहरण शिक्षा मंत्रालय में सेक्शन ऑफिसर देवी प्रसाद उपाध्याय हैं। 2006 में चीनी भाषा सीखने के वास्ते देवी प्रसाद दो साल के लिए चीन गए। चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने देवी प्रसाद उपाध्याय के बयान के हवाले से जानकारी दी कि यह अपने कार्यालय से निपटने के बाद टूरिस्ट एजेंसियों के वास्ते पार्ट टाइम काम करते हैं। इससे हुई आमदनी से इनकी जिंदगी बदल गई। राष्ट्रीय सचिवालय ‘सिंह दरबार’ में विभिन्न मंत्रालयों के ऐसे सैकड़ों अधिकारी मिल जाएंगे, जो पूर्ण स्कॉलरशिप पर मंदारिन सीखने चीन गए और लौटने पर किसी होटल, टूरिस्ट एजेंसी, बिजनेस हाउस के वास्ते पार्ट टाइम काम करने लगे। चीनी संस्थाएं किसी सरकार के सिस्टम को मंदारिन के माध्यम से कैसे हाईजैक करती हैं, इसका नेपाल से बढ़िया उदाहरण आपको कहीं नहीं मिलेगा।
कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट चीनी शिक्षा मंत्रालय का परोक्ष अंग है, जिसे दुनिया को दिखाने के वास्ते एनजीओ का रूप दिया गया है।  इसका संचालन हानपान (चाइनीज लैंग्वेज कौंसिल इंटरनेशनल) करता है। मार्च 2018 तक चीन की उप-प्रधानमंत्री लिउ यांगदोंग इसकी अध्यक्ष रहीं। अप्रैल 2007 में चीनी पोलित ब्यूरो के सदस्य ली छांगचुन जब ‘हानपान’ आए, तब उन्होंने ‘ऑन द रिकॉर्ड’ माना था कि कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट का उद्देश्य चीन के सांस्कृतिक वैभव को विस्तार देने के साथ प्रोपेगेंडा रणनीति को भी आगे बढ़ाना है। 
कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट की नीयत और तौर-तरीके को अमेरिकियों ने बड़ी तेजी से भांप लिया था। 25 सितंबर, 2014 को फंड की गड़बड़ी और गेस्ट टीचर्स की नियुक्तियों में कई घोटालों के पर्दाफाश के बाद शिकागो यूनिवर्सिटी ने कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट की पीठ को बंद कर दिया था। उन दिनों कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट का विस्तार अमेरिका के सौ विश्वविद्यालयों तक हो चुका था। इसके विरुद्ध बाकायदा अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ यूनिवर्सिटी प्रोफेसर्स ने प्रस्ताव पारित किया था। दिसंबर 2013 में ऐसी ही गड़बड़ियों के कारण कनाडियन एसोसिएशन ऑफ यूनिवर्सिटी टीचर्स ने कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर इसके कार्यक्रमों को रोका था। यूरोप, उत्तर अमेरिका, जहां भी चीनी भाषा के विस्तार के लिए यह संगठन गया, इसने नियमों की अवहेलना की।
नेपाल के संदर्भ में जो सबसे दुखद पहलू है, वह यह कि चीनी भाषा के विस्तार को रोक पाने में वहां का भारतीय दूतावास विफल रहा है। वह साल में एक बार काठमांडू के किसी फाइव स्टार होटल में हिंदी दिवस मनाता है और खानापूर्ति कर खुश हो जाता है। नेपाल के विश्वविद्यालयों में हिंदी की जो दुर्गति पिछले तीन-चार दशकों में हुई है, उसे वहां के रहने वाले अच्छी तरह जानते हैं। गलत-सही तरीके से चीनी भाषा की जडें़ नेपाल में मजबूत हुई हैं, इस सच को हम नकार नहीं सकते।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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