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26 फरवरी, 2020|12:08|IST

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विरासत में मिली बड़ी लकीर

आरती आर जेरथ, वरिष्ठ पत्रकार

राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में जगत प्रकाश नड्डा को भारतीय जनता पार्टी में बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। बेशक संगठन पर नड्डा की पकड़ है, लेकिन बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की जगह लेना उनके लिए आसान नहीं। उन्हें अमित शाह द्वारा तय मानकों पर खरा उतरने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। नड्डा को उन रास्तों पर आगे बढ़ना होगा, जिसे अमित शाह ने तैयार किया है। जाहिर है, यह काफी चुनौती भरा काम है।
साल 2014 में जब अमित शाह भाजपा अध्यक्ष बने थे, तब उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी तक पार्टी का झंडा फहराने का एलान किया था। चार साल में, 2018 तक उन्होंने अपना यह वादा करीब-करीब पूरा भी किया। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हारने से पहले तक देश के 19 राज्यों में भाजपा या भाजपा गठबंधन सरकारें थीं, जबकि 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के समय सिर्फ सात सूबे भाजपा के पास थे।
देखा जाए, तो अमित शाह का सबसे बड़ा योगदान यही रहा कि उन्होंने भाजपा को जीत का पर्याय बना दिया। उनके नेतृत्व में पार्टी ने नए-नए प्रदेशों में जीत हासिल की। साल 2014 में महाराष्ट्र में अकेले चुनाव लड़ने का उन्होंने सफल दांव खेला। उत्तर प्रदेश में तीन-चौथाई सीटें दिलाईं। पूर्वोत्तर में पहली बार कमल खिलाया। पूर्वोत्तर राज्यों में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करके भाजपा या भाजपा समर्थित सरकारें बनाईं। त्रिपुरा में वामपंथ का किला तोड़ा। और भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बना दी। देश में पार्टी का वह दबदबा बना, जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था। यह कहा जा सकता है कि इन तमाम वर्षों में पार्टी का चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रहे, लेकिन जीत का श्रेय अमित शाह के हिस्से भी आया। जमीन पर वही काम करते दिखे। ‘पन्ना प्रमुख’ (मतदाता सूची में हर पन्ने का एक प्रमुख) की संकल्पना को नई धार देने का श्रेय उनको ही जाता है। जिस तरह से  उन्होंने ब्लॉक व जिला स्तर पर नेतृत्व तैयार किया और उन्हें पूरी छूट दी, उसका चुनावी जीत में बड़ा योगदान रहा। जाहिर है, संगठन को नया कलेवर अमित शाह ने ही दिया।
बतौर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की एक और विशेषता यह रही कि उन्होंने राजनीति में भावनात्मक रिश्ते को खत्म कर दिया। वह सख्त प्रशासक के तौर पर काम करते रहे। प्रधानमंत्री मोदी और उनमें जबर्दस्त जुगलबंदी है। मानो वह मोदी के मन की बात जानते हैं। दोनों नेताओं में किसी तरह का कोई मतभेद अब तक सामने नहीं आया है। यह प्रधानमंत्री मोदी के लिए भी अच्छा रहा, क्योंकि कठोर संदेश वह अमित शाह के माध्यम से ही पार्टी को पहुंचाते रहे। अमित शाह के दौर में यदि कोई पार्टी के लिए सफल रहा, तो उसे काम करने की पूरी छूट भी मिली, और जो विफल रहा, उसे किनारे कर दिया गया। 
तकनीक, खासकर सोशल मीडिया का भी उन्होंने बखूबी इस्तेमाल किया। उन्होंने वाट्सएप फोरम बनाए, ट्विटर से लोगों को जोड़ा, सीधे वोटर तक पहुंचने के लिए फेसबुक का इस्तेमाल किया। मीडिया के नए-नए मंचों का इस कदर इस्तेमाल शायद ही किसी दूसरी पार्टी या नेतृत्व ने सोचा होगा।
हालांकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में अमित शाह के हिस्से में एक बड़ी नाकामी भी है। उन्होंने दूसरी पीढ़ी का कोई नेता तैयार नहीं किया। जब लालकृष्ण आडवाणी पार्टी अध्यक्ष थे, तब उन्होंने नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे, बीएस येदियुरप्पा, प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली के रूप में नई पौध तैयार की। इसका फायदा यह हुआ कि आडवाणी-वाजपेयी युग की समाप्ति के बाद इन नेताओं ने ही पार्टी को संभाला। मगर आज ऐसा नहीं है। आज इस सवाल का जवाब हमें नहीं सूझता कि नरेंद्र मोदी के बाद कौन चेहरा होगा? देवेंद्र फडणवीस, योगी आदित्यनाथ, रघुवर दास, मनोहर लाल खट्टर जैसे तमाम नेताओं पर बेशक भरोसा जताया गया है, लेकिन यही बात यही है कि उन्हें भविष्य का नेता कहने की स्थिति अभी नहीं बनी है। 
यही वजह है कि जब जेपी नड्डा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए हैं, तो कई सवाल जेहन में उभरते हैं। क्या नड्डा अमित शाह द्वारा तैयार इस राह पर मजबूती से चल पाएंगे? हाल-फिलहाल के चुनावी समर में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। महाराष्ट्र में उसे मनमाफिक कामयाबी नहीं मिली, तो हरियाणा में जैसे-तैसे सरकार बनाने में वह कामयाब हुई। झारखंड तो हाथ से निकल ही गया, और दिल्ली भी दूर लग रही है। बेशक इन तमाम चुनावों (दिल्ली को छोड़कर) में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ही थे, लेकिन उनके पास गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी भी थी। इसीलिए जेपी नड्डा कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में संगठन में लाए गए थे। हालांकि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म करना, एक साथ तीन तलाक का अंत, नागरिक रजिस्टर, नागरिकता संशोधन कानून जैसे तमाम मसलों में उलझे रहने के बाद भी अमित शाह ने लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में पार्टी को बड़ी कामयाबी दिलाई है। लिहाजा देखना होगा कि नड्डा वहां के विधानसभा चुनाव में कितना सफल हो पाते हैं? शाह की ‘चुनावी मशीनरी’ को कितनी मजबूती से वह कायम रख पाते हैं?
उनकी दूसरी चुनौती अनुशासन के मोर्चे पर होगी। अमित शाह ने पार्टी को अनुशासन की मजबूत डोर से बांधा है। आज पार्टी में शायद ही कहीं से कोई असंतोष का स्वर उभरता है। क्या नड्डा इसे बरकरार रख पाएंगे? पिछले महीने उत्तर प्रदेश के 100 से अधिक विधायक विधानसभा में अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए थे। उन्होंने खुद के उपेक्षित होने का आरोप लगाया था। सूबे में अपनी ही सरकार के खिलाफ इस तरह से धरना देने का यह संभवत: पहला मामला था। उस स्थिति को कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर जेपी नड्डा को संभालना चाहिए था, पर वह विफल साबित होते दिखे।
जाहिर है, जिन खूबियों के लिए अमित शाह का कार्यकाल याद किया जा रहा है, जेपी नड्डा के लिए वही चुनौती बनने वाली है। उन्हें भाजपा की चुनावी राह भी आसान करनी होगी और पार्टी की कमजोरियों से भी पार पाना होगा। यह काम आसान नहीं है। हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बेहद करीब होने का उन्हें फायदा मिल सकता है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 21 january