DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बदले समीकरण और मुखर मतदाता

आरती आर जेरथ, वरिष्ठ पत्रकार

हाल के वर्षों में मतदाताओं का सबसे अधिक ध्रुवीकरण मौजूदा आम चुनाव में ही दिख रहा है। एक तरफ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक अपने तरीके से मुखर हैं, तो दूसरी तरफ मोदी-विरोधी अपने तरीके से। बेशक राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ कोई एक विपक्ष नहीं है, लेकिन हर प्रदेश में पार्टी के सामने एक गठबंधन चुनावी मैदान में है। जैसे, उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन, तो बिहार में राजद, कांग्रेस, हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, झारखंड में कांग्रेस-झामुमो-झाविमो गठबंधन, महाराष्ट्र में एनसीपी-कांग्रेस और कर्नाटक में जेडीएस-कांग्रेस गठजोड़ आदि। इस वजह से हर राज्य में कमोबेश आमने-सामने की टक्कर है। हां, उत्तर प्रदेश में मुकाबला तिकोना लग रहा था, लेकिन वहां पर अब इतना ध्रुवीकरण हो गया है कि चार-पांच सीटों को छोड़कर कहीं भी कांग्रेस रेस में नहीं दिख रही। यही भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल भी है। साल 2014 में हर पार्टी अकेले-अकेले मैदान में थी, जिस कारण मतदाता भ्रम में थे और भाजपा ने इसका लाभ उठाया था। साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी विपक्ष के बंटे होने के कारण वह सत्ता तक पहुंची। लेकिन इस संसदीय चुुनाव में मुकाबला सीधा (गठबंधन बनाम भाजपा) हो चला है।
मतदाताओं में यह ध्रुवीकरण जाति व समुदाय के आधार पर हो रहा है। खासतौर से उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यों में। इन सूबों में मुसलमान, दलित और किसान खुलकर भाजपा के खिलाफ बोल रहे हैं। असल में, मुसलमानों के सामने पिछले पांच वर्षों का वह घटनाक्रम है, जो उन्हें कई तरह से असुरक्षा का बोध देता है, तो दलितों की नजर में उना से सहारनपुर तक घटी अत्याचार की घटनाएं सबसे बड़ा मुद्दा हैं। किसानों की नाराजगी सरकारी नीति में खुद को हाशिये पर धकेल दिए जाने के कारण है। हालांकि ऊपरी वर्ग और भाजपा के परंपरागत वोटर अब भी मोदी के मुरीद हैं। मैं ऐसे कई क्षेत्रों में गई, जहां मतदाताओं को अपने उम्मीदवार के नाम तक मालूम नहीं थे, पर वे मोदी के नाम पर भाजपा के साथ थे। कई जगहों पर सत्ताविरोधी रुझान भी दिखा, लेकिन चूंकि चुनाव नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा जा रहा है, इसलिए नाराज लोगों ने भी भाजपा को ही वोट देने की बात कही। कुछ ऐसी ही हालत गठबंधन में भी दिख रही है, जहां क्षेत्रीय क्षत्रपों के नाम पर मतदाता अपना वोट डाल रहे हैं।
मतदाता के इस रुझान को सभी दल बखूबी समझने लगे हैं। नरेंद्र मोदी ने शुरुआती दिनों में अपने भाषणों को कांग्रेस पर केंद्रित रखा। उस वक्त वह पचपन साल बनाम पचपन महीने, अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला, रॉबर्ट वाड्रा केस आदि का जिक्र करना नहीं भूलते थे। लेकिन अब हर राज्य में वह स्थानीय क्षत्रपों के खिलाफ बोल रहे हैं। महाराष्ट्र में शरद पवार, ओडिशा में नवीन पटनायक, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, उत्तर प्रदेश में ‘सराब’ (समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल और बहुजन समाज पार्टी) और बिहार में लालू प्रसाद यादव को वह निशाने पर लेने लगे हैं। जाहिर है, भाजपा को यह एहसास हुआ होगा कि उसकी चुनौती राहुल गांधी नहीं, क्षेत्रीय नेता हैं, इसलिए मोदी के ‘नैरेटिव’ अब बदलने लगे हैं। 
मतदाताओं के लिए भी मुद्दा मोदी ही हैं। वे इसी आधार पर अपना वोट दे रहे हैं कि नरेंद्र मोदी को फिर से सत्ता में आना चाहिए या नहीं? भाजपा के समर्थक मोदी को बहुत मजबूत नेता मानते हैं। उनकी नजर में बालाकोट में ‘एयर स्ट्राइक’ एक ऐतिहासिक घटना है, क्योंकि पाकिस्तान से बदला उसके घर में घुसकर लिया गया। वे उज्ज्वला, किसान सम्मान निधि जैसी तमाम सरकारी योजनाओं के फायदे भी गिना रहे हैं। वे मानते हैं कि चूंकि इन पांच वर्षों में मोदी वह सब कुछ नहीं कर पाए, जो वह करना चाहते हैं, इसलिए उन्हें एक मौका और मिलना चाहिए। हालांकि मोदी-विरोधियों के भी अपने तर्क हैं। नोटबंदी से हुए नुकसान, जीएसटी के जंजाल और फसलों के उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य न मिलने को वे अपने एजेंडे में सबसे ऊपर रखते हैं। उत्तर प्रदेश में पहले चरण के चुनाव में जहां गन्ना किसानों का बकाया भुगतान सुर्खियों में रहा, तो दूसरे चरण में आलू किसानों का दर्द प्रभावी रहा। राज्य में कई ऐसे लोग भी दिखते हैं, जो यह मानते हैं कि पिछले पांच वर्षों में सामाजिक-धार्मिक समरसता की भावना कमजोर हुई है। अब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्य कहीं ज्यादा बढ़ गया है। इसकी वजह वे भाजपा सरकार को बताते हैं।
उत्तर प्रदेश में एक और तस्वीर मुझे दिखी, जो भारतीय जनता पार्टी  के लिए सुखद नहीं कही जा सकती। पिछले संसदीय चुनाव में 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे ने भी एक बड़ी भूमिका निभाई थी। उस दंगे ने राज्य में चुनावी मुकाबले का सांप्रदायिक धु्रवीकरण कर दिया था। लोगों की पसंद अपने-अपने धर्म के उम्मीदवार हो गए थे। लेकिन इस बार सहारनपुर में जाटवों के साथ हुआ अत्याचार एक बड़ा मुद्दा बन गया है। 2017 के इस दंगे में कई जाटवों की जान गई थी। उनका आरोप है कि तब पुलिस-प्रशासन ने जान-बूझकर उनकी मदद नहीं की। नतीजतन, जो जाटव 2014 में भाजपा में उम्मीद देख रहे थे, वे फिर से बसपा में लौटते दिख रहे हैं। यानी अब मुकाबले के समीकरण बदल गए हैं। मतों का यह गणित किस पार्टी या उम्मीदवार के पक्ष में जाएगा, यह तो फिलहाल स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना तय है कि जिसका गुणा-भाग अच्छा होगा, जीत का सेहरा उसी के सिर सजेगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Opinion Hindustan column on 20 april