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कालेधन के रिकॉर्ड तोड़ता चुनाव

नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

अपने यहां चुनावों में पैसों का खेल कोई नई बात नहीं है। ग्राम पंचायत जैसे चुनाव भी अब धनबल से प्रभावित किए जाते रहे हैं। पिछले 20-25 वर्षों में इसमें लगातार तेजी आई है। 2014 के संसदीय चुनावों में चुनाव आयोग ने लगभग 300 करोड़ रुपये नकद जब्त किए थे। इस बार 26 मार्च से 17 अप्रैल के दरम्यान ही 694.49 करोड़ रुपये बरामद किए जाने की खबर है। 25 मार्च से पहले तक चुनाव आयोग 143.47 करोड़ रुपये जब्त कर चुका था। आलम यह है कि तमिलनाडु की वेल्लोर सीट पर चुनाव रद्द करना पड़ा है, क्योंकि वहां एक उम्मीदवार के ठिकाने से भारी मात्रा में नकदी जब्त की गई है। पैसों की बरामदगी के कारण देश में पहली बार किसी लोकसभा सीट का चुनाव रद्द किया गया है।
इस सूरते-हाल से कई सवाल जेहन में उठते हैं। आखिर चुनाव-दर-चुनाव पैसों का खेल क्यों बढ़ता जा रहा है? क्या इसे रोकने के उपाय हैं? चुनाव आयोग इसे किस हद तक थाम सकता है? और, किस तरह की कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि धनबल लोकतंत्र पर हावी न होने पाए? राजनीतिक सत्ता के आस-पास जिस तरह तमाम ताकत सिमटती जा रही है, उससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि चुनावों में रुपये क्यों इतने मायने रखने लगे हैं। येन-केन-प्रकारेण कुरसी पाने की चाहत में उम्मीदवार और सियासी दल बेहिसाब धन खर्च करते हैं। उन्हें भरोसा होता है कि सत्ता पाने के बाद वे इस ‘निवेश’ की वसूली ब्याज सहित करेंगे। चूंकि इस ‘निवेश’ की कोई सीमा नहीं होती, इसलिए जाहिर तौर पर यह कालाधन होता है।
इस काले धन को बढ़ाने में ‘इलेक्टोरल बॉन्ड’ का भी बड़ा हाथ है। बेशक केंद्रीय बैंक इसकी जानकारी गोपनीय रखने की बात कहता है, लेकिन हमारा सिस्टम इस तरह का है कि अंदरखाने यह छिपा नहीं रहता कि किसने किसको कितना चंदा दिया? ऐसे में, विपक्षी पार्टी को बॉन्ड देने वाला व्यक्ति या संगठन सत्तापक्ष द्वारा प्रताड़ित किया जा सकता है। आम आदमी पार्टी ने शुरुआती दिनों में एक प्रयोग के तहत अपनी वेबसाइट पर उन तमाम लोगों के नाम बताने शुरू किए थे, जिनसे उसे चंदा मिलता था। मगर बाद में इसे बंद कर दिया गया, क्योंकि दानकर्ताओं की शिकायत थी कि उन्हें दूसरे राजनीतिक दल प्रताड़ित कर रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि जब तक हमारे देश में तंत्र और लोकतांत्रिक मूल्य मजबूत नहीं होंगे, चुनावी चंदे में पारदर्शिता की बात बेमानी होगी। मैं जब पहली बार अमेरिका गई थी, तो मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि वहां लोग खुलकर बता रहे थे कि वे डेमोक्रेट्स हैं या फिर रिपब्लिकन? इसकी वजह यही थी कि पार्टीगत प्रतिबद्धता के आधार पर वहां कभी किसी के साथ भेदभाव या दुव्र्यवहार नहीं किया जाता। आज जब दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपना महापर्व मना रहा है, तो क्या अमेरिका जैसा खुलापन वह अपनी व्यवस्था में नहीं उतार सकता? 
बजाय इसके हमारे यहां राजनीतिक प्रतिबद्धता गोपनीय रखी जाती है, जिसकी एक वजह खुद सियासी दल हैं। कई जगहों पर मतदाताओं ने हमें यह बताया कि उन्होंने चुनाव में पैसे इसलिए लिए, क्योंकि पैसे ठुकराकर यदि उन्होंने अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता जाहिर कर दी, तो विरोधी दल के कार्यकर्ता उस पर हमला कर सकते हैं। नकदी लेने पर उन्हें उसी पार्टी का समर्थक माना जाता है, जो रुपये बांटती है। यही प्रवृत्ति जनमत सर्वे और एग्जिट पोल में भी दिखती है, जिसमें लोग अपनी मंशा सही-सही जाहिर नहीं करते। 
इस लिहाज से देखें, तो चुनाव आयोग द्वारा वेल्लोर सीट का चुनाव रद्द करने का फैसला स्वागतयोग्य है। देर से ही सही, आयोग को अपनी ताकत का अंदाजा तो हुआ। इस बार अब तक उसकी आलोचना ही रही है। उसे नख-दंत विहीन बताया जा रहा है। संभव है, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और आलोचनाओं ने आयोग को कुछ सख्त होने के लिए प्रेरित किया हो। मगर चुनाव में धनबल को रोकना सिर्फ नकदी की जब्ती से संभव नहीं है। चुनाव आयोग को मजबूत बनाना होगा, और आयोग तभी मजबूत होगा, जब चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कॉलेजियम व्यवस्था से होगी, सरकार द्वारा नहीं। सरकारी नियुक्ति के कारण चुनाव आयोग कई बार निष्पक्ष नहीं दिखा है। नियुक्ति की नई व्यवस्था के बाद यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले तमाम उम्मीदवारों या दलों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। सख्त कार्रवाई इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि हल्की-फुल्की सजा से नेताओं की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
एक उपाय यह भी है कि चुनावी खर्च के लिए तय 70 लाख रुपये की सीमा बढ़ा दी जाए। एक निर्वाचन-क्षेत्र में आमतौर पर 16-17 लाख मतदाता होते हैं। तमाम वोटरों तक पहुंच बनाने के लिए 70 लाख की राशि कम है। स्टेट फंडिंग यानी चुनावी खर्च सरकार द्वारा किया जाना भी कोई कारगर कदम नहीं है, क्योंकि जिन उम्मीदवारों को पैसों से प्रभाव जमाना है, वे किसी कीमत पर यही करेंगे। हालांकि ये तमाम उपाय तभी प्रभावी हो सकते हैं, जब राजनीतिक दल इसके लिए मजबूत इच्छाशक्ति दिखाएंगे। अब तक धनबल पर न जाने कितनी कमेटियां और आयोग बन चुके हैं, लेकिन सबका नतीजा          सिफर रहा है, क्योंकि इनकी सिफारिशों को अमल में         लाने के लिए सियासतदां तैयार नहीं। उनके लिए सत्ता मायने रखती है, लोकतांत्रिक प्रणाली की शुचिता और स्वच्छता नहीं।
एक प्रयास मतदाता अपनी तरफ से जरूर कर सकते हैं। वे अगर ‘कैश फॉर वोट’ को चुनावी मुद्दा बना लें, तो काम आसान हो सकता है। वे तय कर लें कि जो पार्टी उन्हें पैसों से लुभाने की कोशिश करेगी, वे उसे वोट नहीं देंगे। चुनाव सुधार के लिए सिविल सोसाइटी और नागरिकों को अपनी आवाज बुलंद करनी ही होगी। यह एक संस्था (एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स) की ही लड़ाई थी कि आज तमाम उम्मीदवारों को अपनी संपत्ति सार्वजनिक करनी पड़ रही है। इस कारण आम लोग अपने प्रतिनिधि की हैसियत आंकने लगे हैं। लोकतंत्र के इस मोड़ पर हम कई बाधाओं से निपटकर पहुंचे हैं। उम्मीद है, परिपक्व बनने के लिए हम ऐसी तमाम मुश्किलों से भी सफलतापूर्वक पार पाएंगे। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 19 april