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ज्ञान की खोज का अनथक यात्री

रामचंद्र गुहा

वर्ष 1998 में बर्कले में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान मेरी मित्रता एक ऐसे विद्वान से हुई, जो मुझसे काफी बडे़ व ज्यादा जानकार थे। पद्मनाभ जैनी बौद्ध और जैन धर्म पर आधिकारिक विद्वान, आधा दर्जन भाषाओं के गहन ज्ञाता। पद्मनाभ जैनी दो या तीन उन जीवित विद्वानों में से एक हैं, जिन्हें मैं बहुत पसंद करता हूं। प्रोफेसर जैनी ने हाल ही अपनी जीवनी का प्रकाशन करवाया है, 135 पृष्ठों की पतली किताब, शीर्षक है कोइंसीडेंस  (योगायोग)। यह किताब तटीय कर्नाटक के सामान्य जैन परिवार में 1923 में उनके जन्म के साथ शुरू होती है। इनके पिता गांव में स्कूल शिक्षक थे। माता गृहिणी थीं, उस देशकाल में कन्नड़ पत्रिकाओं में उनकी कविताएं और लेख प्रकाशित होते थे। 
पद्मनाभ के बचपन की सुस्पष्ट यादों में मूदबिदरी स्थित 15वीं सदी में निर्मित हजारों स्तंभों वाला मंदिर भी है। वह लिखते हैं, वहां का सबसे यादगार प्रसंग लक्ष-दीप होता था। मिट्टी के हजारों दीये एक साथ जगमगाते थे, मानो ‘जिन’ को प्राप्त अनंत ज्ञान (केवल्य ज्ञान) का हमें दर्शन कराते हुए। पद्मनाभ टुलु और कन्नड़ बोलते हुए बड़े हुए थे। उनके पिता ने उन्हें हिंदी पढ़ाया और थोड़ी-बहुत अंग्रेजी भी। मां ने उन्हें जैन परंपरा के सभी तीर्थंकरों के नाम याद करा दिए। पिता के मन में पुत्र के लिए बड़े सपने थे। दस वर्ष की उम्र में पद्मनाभ को एक आश्रम स्कूल में ऐसी पढ़ाई के लिए विदर्भ के कारंजा भेज दिया गया, जो उनके टुलुनाडु क्षेत्र में संभव न थी। 
तब पद्मनाभ तीन भाषाओं में धाराप्रवाह बात करते ही थे। हालांकि इन भाषाओं में नई जगह की भाषा शामिल नहीं थी। वह कारंजा में स्कूल के अपने पहले दिन को याद करते हैं- मैं वहां खेल के विशाल मैदान पर खड़ा था, अकेला बहुत देर तक, सोचता हुआ, मैं बिना मराठी जाने कैसे रहूंगा, यह क्या भाषा है और इसे कैसे सीखा जाए, डरा हुआ और घर की यादों से घिरा। 
विद्वता बढ़ी, तो घर की यादों से उबरने में मदद मिली। स्कूल का जीवन कड़ी दिनचर्या और नियमों से बंधा था। लड़के सुबह 5 बजे उठ जाते, स्नान करते, प्रार्थना के लिए जुटते। सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक औपचारिक कक्षाएं लगतीं। उसके बाद व्यायाम, रात्रि भोजन और सोने से पहले प्रार्थना। तीन वर्ष की कठिन पढ़ाई के बाद पद्मनाभ को जैन अध्ययन के और उन्नत स्कूल कोल्हापुर में स्थानांतरित कर दिया गया। 
घर छोड़ने के पांच साल बाद पहली बार अपनी घर वापसी को उन्होंने जीवनी में बहुत भाव से याद किया है- अनेक रेलों और बसों से लंबी यात्रा के बाद मैं अपने घर के अंदर दौड़ता गया और अपनी दादी के पैरों में गिर गया, जो जपमाला के साथ संध्या वंदन को बैठी थीं। मेरे चाचा पद्माराजा पहुंचे और हम रोने में लग गए। वह पहले मुझे शाम की आरती के लिए पास के मंदिर ले गए और मेरे लिए दुआएं मांगी। एक महीने तक मनपसंद व्यंजनों का आनंद, संबंधियों और दोस्तों के यहां आने-जाने, अनेक मंदिरों में प्रार्थना का दौर चला। उसके बाद पद्मनाभ दूर कोल्हापुर अपने स्कूल लौट आए। पद्मनाभ 1943 में मैट्रिक पास हुए। स्नातक उपाधि के लिए नासिक आ गए। यहां एक दयालु जैन व्यापारी ने उन्हें लड़कों के एक छात्रावास का वार्डन बना दिया, जहां कॉलेज की शिक्षा के लिए आवश्यक फीस के बदले उन्हें लड़कों को निर्देश देने का काम मिल गया। नासिक में उन्होंने संस्कृत और प्राकृत की पढ़ाई इतनी मेहनत व निपुणता से की कि प्रिंसिपल ने बोल दिया, छोटी जगह छोड़ किसी बड़े शहर में नाम कमाओ। उदीयमान विद्वान का अगला पड़ाव बना अहमदाबाद,जहां फिर एक 

अच्छे व्यापारी ने भोजन और आवास का प्रस्ताव दिया। इस शहर में, जहां कभी गांधीजी रहे थे, पद्मनाभ ने सड़कों पर गुजराती सीखी और कक्षा में पाली। वह बौद्ध अध्ययन की दिशा में बढ़े। 1949 में एमए की पढ़ाई पूरी हुई। इसके एक साल पहले गांधीजी का निधन हो चुका था, लेकिन उन्होंने अपनी शहादत से पहले अपने मित्र बौद्ध विद्वान धर्मानंद कोसांबी के नाम पर स्कॉलरशिप देने के लिए कहा था। संयोग से गांधी के एक चेले काका कालेलकर से पद्मनाभ की भेंट हुई और उन्हें प्रथम कोसांबी स्कॉलरशिप के लिए चुना गया। पाली का और गहन अध्ययन करने श्रीलंका भेज दिया गया। 

अपने बौद्धिक प्रतिपालकों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन पद्मनाथ की जीवनी का एक बड़ा आकर्षण है। वह टुलुनाडु, कारंजा, कोल्हापुर, नासिक, अहमदाबाद, मुंबई व कोलंबो के अपने शिक्षकों के लुभावने रेखाचित्र पेश करते हैं और बताते हैं कि उन्होंने क्या पढ़ाया। यहां विशेष रूप से आचार्य नरेंद्र देव का रेखाचित्र बेहतरीन है। आचार्य तब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति थे, जब 1952 में पद्मनाभ वहां पाली भाषा के लेक्चरर के रूप में नियुक्त हुए। आचार्य इतिहास और दर्शन के ख्यात विद्वान थे। आज न उनके जैसा राजनेता है और न उनके जैसा विश्वविद्यालय प्रशासक। नरेंद्र देव ने पद्मनाभ को ऐसे पोषित किया कि आज वैसा करना भारत में किसी भी कुलपति की व्यक्तिगत और बौद्धिक क्षमता से परे है। बीएचयू में उनकी भेंट इंग्लैंड से आए विजिटिंग प्रोफसर से हुई। प्रभावित प्रोफेसर ने पद्मनाभ को लंदन में सेवा का प्रस्ताव दिया। टुलुनाडु के शर्मीले निवासी ने ब्रिटिश मेट्रोपॉलिटन शहर में एक दशक बिताए। खूब अध्ययन, अध्यापन किया, यात्राएं कीं। 

पद्मनाभ ने अमेरिकी अकादमी का ध्यान खींचा और 1967 में पत्नी व दो बच्चों के साथ एन अर्बोर आ गए और उसके पांच साल बाद कैलिफोर्निया। वह लिखते हैं, हम वस्तुत: प्रशांत महासागर के तट पर हैं, और ऐसा लगता है मेरी ट्रेन, नेल्लीकर, मूदबिदरी, कारंजा, नासिक, अहमदाबाद, बनारस, लंदन और एन अर्बोर को छोड़ती अपने टर्मिनल पर पहुंच गई है, मेरा अंतिम पड़ाव सुंदर बर्कले। 
ज्ञान की खोज में पद्मनाभ जैनी की अथक यात्रा हमारे युग का एक अनुकरणीय पाठ है, जब हर तरह की सूचना ऑनलाइन उपलब्ध है। हालांकि, गूगल और यू-ट्यूब किसी को आलसी और आत्मसंतुष्ट भी बना सकते हैं। सचमुच, अपनी पृष्ठभूमि और शैली के मामले में पद्मनाभ अपनी पीढ़ी में विरल हैं। उनके समकालीन अमत्र्य सेन और जगदीश भगवती बहुत संपन्न, संयोजित, अंग्रेजी के माहौल में पले-बढ़े थे। सेन के पिता शांति निकेतन में प्रोफेसर थे, तो भगवती के पिता सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश। दोनों कैंब्रिज में पढ़े, नामी विद्वानों के संरक्षण में रहे। पद्मनाभ को जिन विद्वानों ने पढ़ाया-बढ़ाया, वे सब सामान्य पृष्ठभूमि के थे। वह अद्भुत इंसान व विद्वान हैं। मुझे आशा है, उनके संस्मरण खूब पढ़े जाएंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 18 march