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वे बदल रही हैं चुनावी समीकरण

देश में चल रहे आम चुनाव को कवर करते हुए जो तस्वीर जेहन में बस जाती है और दिल खुश कर जाती है, वह है मतदान करती महिलाओं की लंबी कतारें। लंबी-लंबी कतारों में खड़ी औरतें अपनी बारी का इंतजार करते हुए। कई बार तो औरतों की कतार पुरुषों से ज्यादा लंबी दिखी और यह इस चुनाव की वह तस्वीर है, जो बहुत सारे शुभ संकेत देती है। इस चुनाव में यह बेहद महत्वपूर्ण है कि इस बार हर बार से ज्यादा महिलाएं मतदान करेंगी।
1962 के चुनाव में महिलाओं की कुल आबादी में से सिर्फ 47 फीसदी ने मतदान में हिस्सा लिया था। 2014 तक यह प्रतिशत बढ़कर 66 हो गया, यानी मतदान करने में महिलाओं ने पुरुषों की न सिर्फ बराबरी कर ली है, बल्कि अब आगे निकल रही हैं। चुनाव आयोग ने 2018 में जो आंकड़े जारी किए, उसके मुताबिक 42,11,41,073 महिलाएं इस चुनाव में वोट डालने की पात्रता रखती हैं। यह पिछले 50 साल में एक बहुत बड़ा बदलाव है। सवाल है कि क्या महिला मतदाता अब चुनाव की दिशा तय करने की ताकत रखती हैं?
हाल में हुए कई चुनावों में यह दिखा है कि महिलाओं ने बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा लिया। कुछ ही महीने पहले मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में महिलाओं ने बड़ी तादाद में वोट डाले थे और कहा गया कि यह भाजपा की हार का एक कारण रहा। हालांकि मामा के नाम से लोकप्रिय शिवराज सिंह चौहान ने महिला वोटरों को लुभाने के लिए साइकिल बांटने की योजना भी शुरू की थी। यह एक संकेत है कि नेता अब सियासी वादों और चुनावी जोड़-तोड़ में औरतों के मुद्दों को नजरंदाज नहीं कर सकते।
आंध्र प्रदेश में आम चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव भी हो रहे हैं। राज्य चुनाव में भी महिलाओं की भागीदारी के आंकड़े काफी उत्साहित करने वाले हैं। सूबे के 175 विधानसभा क्षेत्रों में से करीब 100 में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले ज्यादा तादाद में वोटिंग के लिए बाहर आईं। चुनाव आयोग के अनुसार, इस साल महिला मतदाताओं की संख्या में 2014 की तुलना में 1.36 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इससे एक अंदाज यह लगाया जा रहा है कि यह सत्ता-विरोधी लहर का सूचक हो सकती है कि मौजूदा सरकार या व्यवस्था से असंतुष्ट महिलाएं बड़ी संख्या में बदलाव के लिए बाहर आई हैं। दूसरी तरफ, तेलुगु देशम पार्टी भी महिला वोटरों के सहारे अपनी जीत की उम्मीद लगाए बैठी है। कांग्रेस भी आश्वस्त है कि महिलाएं उसी के लिए वोट करेंगी। ऐसा ही ट्रेंड गोवा में भी देखा गया। राज्य के 40 में से 35 विधानसभा क्षेत्रों  में महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा संख्या में वोटिंग की। दक्षिण और उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी महिला मतदाताओं की संख्या अच्छी रही है।
लेकिन क्या ये महिलाएं अपने तईं फैसले लेती हैं या लेने के लिए स्वतंत्र हैं? या फिर अधिकतर महिलाएं अपने परिवार की सियासी रुझान के मुताबिक वोट डालती हैं? क्या महिलाओं के लिए महिला सुरक्षा या महिला-हित सर्वप्रथम मुद्दे बन रहे हैं?
पिछले आम चुनाव के दौरान ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी’ ने एक सर्वे किया था। इस सर्वे में 70 फीसदी महिला वोटरों ने कहा कि वे वोट डालने में अपने पतियों से राय नहीं लेतीं। वे हंसकर कहती हैं कि उनकी बात सुनती जरूर हैं, पर वोट तो अपनी मरजी से ही डालती हैं। विश्लेषकों ने अंदाजा लगाया कि जितनी महिलाएं खुलकर यह बात मान रही हैं, स्वतंत्र फैसले लेने वाली औरतों की तादाद उससे कहीं ज्यादा हो सकती है। 
साफ है कि महिलाएं अब एक अलग वोट बैंक हैं, और चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक पार्टियों का फोकस उन पर लगातार बढ़ रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक, यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि महिलाओं के मुद्दों का चुनाव पर कोई असर पड़ेगा या नहीं, लेकिन यह सच है कि महिला मतदाताओं की बड़ी संख्या वोट को किसी भी दिशा में मोड़ने की क्षमता रखती है।
हिन्दुस्तान में महिलाओं की राजनीति में भागीदारी तो बढ़ रही है, लेकिन चुनाव आयोग के आंकडे़ बताते हैं कि महिला वोटरों की कुल संख्या अब भी पुरुषों के मुकाबले 92.7 फीसदी ही है, जबकि पिछली जनगणना के मुताबिक, 2019 तक महिलाओं की आबादी पुरुषों की आबादी की तुलना में 97.2 फीसदी हो जानी चाहिए, यानी बड़ी तादाद में अब भी महिलाएं चुनाव प्रक्रिया से बाहर हैं। और लोकसभा में उनकी भागीदारी भी सिर्फ 11 प्रतिशत है। विधायिका में 33 फीसदी आरक्षण का प्रस्तावित बिल अब भी सियासी दांव-पेच में फंसा है।
मतदाता के रूप में देश की महिलाओं के पास एक बड़ा बदलाव लाने की क्षमता है। ज्यादा महिलाओं की भागीदारी महिला-हितों और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कानून में बदलाव और नए कानून की मांग कर सकती हैं। ऐसे कानून, जो स्त्रियों के प्रति संवेदनशील हों। ज्यादा महिला मतदाता नेताओं को महिलाओं के मुद्दों को उठाने और उसे चुनावी मुद्दा बनाने के लिए बाध्य करेंगे। महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को पिछले कुछ चुनावों में कई राजनीतिक पार्टियों ने उठाया है। दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव में महिला सुरक्षा बहुत बड़ा मुद्दा थी। पिछले लोकसभा चुनाव में भी महिला सुरक्षा पर भाजपा के चुनावी अभियान में काफी जोर दिया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने इस कार्यकाल में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारों को अमल में लाने का प्रयास किया।  
इन सबके बावजूद इस चुनाव के दौरान चुनाव प्रचार में खास तौर पर महिलाओं के खिलाफ अपशब्दों और गिरती भाषा का प्रयोग धड़ल्ले से जारी है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 18 april