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अगली सरकार का सबसे बड़ा सिरदर्द

सौरभ चंद्र, पूर्व पेट्रोलियम सचिव, भारत सरकार

फारस की खाड़ी में एक बार फिर युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। तीन दिन पहले एक ‘रहस्यमय हमले’ में सऊदी अरब के दो टैंकरों को काफी नुकसान पहुंचा है। इस क्षेत्र में पहले से ही अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बना हुआ है। असल में, अमेरिका ने पिछले साल मई में तीन वर्ष पूर्व किए गए परमाणु समझौते को नकार दिया था। ईरान को झुकाने के लिए उसने बतौर शस्त्र आर्थिक प्रतिबंधों का इस्तेमाल किया। इन प्रतिबंधों का सीधा लक्ष्य ईरान द्वारा किए जा रहे कच्चे तेल का निर्यात था। प्रतिबंधों के लागू होने के पूर्व ईरान रोजाना लगभग 20 लाख बैरल कच्चे तेल का निर्यात कर रहा था, और कुल निर्यात से होने वाली आय का 80 प्रतिशत उसे कच्चे तेल, पॉलिमर्स और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों से हो रहा था।
भारत भी उन आठ देशों में शामिल था, जिन्हें नवंबर, 2018 में अमेरिका ने ईरान से कच्चे तेल के आयात पर आयद आर्थिक प्रतिबंधों से मई, 2019 तक छूट दी थी। इन आठ देशों में चीन और जापान भी थे। हालांकि छूट दिए जाने के लिए शर्त यह थी कि सभी देश ईरान से तेल आयात में अपेक्षित कटौती करेंगे। जाहिर है, अब यह छूट खत्म हो गई है, और ईरान द्वारा निर्यात किए जाने वाले कच्चे तेल पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए गए हैं।
फिलहाल यह साफ नहीं है कि कितने देश अमेरिका द्वारा लागू किए गए प्रतिबंधों की अवहेलना करके ईरान द्वारा उत्पादित तेल का आयात करते रहेंगे। हालांकि अनुभव के आधार पर यही कयास लगाया जा सकता है कि प्रतिबंधों को नजरंदाज करने वाली सभी कंपनियां अमेरिकी अर्थव्यवस्था से बाहर कर दी जाएंगी। अभी विश्व की रिजर्व मुद्रा डॉलर है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए यह सबसे मुफीद मानी जाती है। इसीलिए शक है कि एकाध भारतीय कंपनियों को छोड़कर कोई अन्य कंपनी इस प्रकार का जोखिम उठाएगी। इसके अतिरिक्त भुगतान का तंत्र भी एक बड़ी समस्या होगी, क्योंकि यह पूर्व की भांति रुपये या यूरो में करना होगा।
वैश्विक बाजार से लगभग 20 लाख बैरल कच्चे तेल के गायब होने का सीधा प्रभाव कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत पर पड़ेगा। यदि सऊदी अरब उत्पादन बढ़ाकर इस कमी की पूर्ति करता है, तब भी भारत के लिए यह सौदा महंगा पड़ेगा। ईरान दरअसल रियायती दरों पर कच्चा तेल देता था। एक समय हम लगभग छह लाख बैरल प्रतिदिन तेल ईरान से आयात कर रहे थे। सऊदी अरब शायद ही इस प्रकार की शर्तों को स्वीकार करेगा। इसके विपरीत अतीत का अनुभव यह भी रहा है कि सऊदी अरब द्वारा भारत को निर्यातित तेल पर ‘एशियन प्रीमियम’ लगाकर महंगी दरों पर बेचा गया।
सबसे अधिक चिंता की बात इन प्रतिबंधों के खिलाफ ईरान की प्रतिक्रिया है। ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। वहां की आंतरिक राजनीति में कट्टरपंथियों का प्रभाव बढ़ रहा है। वाशिंगटन में भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन तथा विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ताल ठोंक रहे हैं। ऐसे में, सऊदी अरब के दो टैंकरों में लगी आग ने स्थिति को विस्फोटक बना दिया है। इसकी प्रतिक्रिया में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट डालने की धमकी दी है। यह जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और लगभग 33 प्रतिशत प्राकृतिक गैस यहीं से गुजरती है। हालांकि ईरान की होर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित करने की क्षमता पर शक है, लेकिन वह समुद्री यातायात को अव्यवस्थित जरूर कर सकता है।
इन तमाम कारणों से कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता का दौर लौट आया है। अनिश्चितता मूल्यों में अस्थिरता पैदा करती है। इसमें सटोरियों की चांदी हो जाती है। जैसे, 2008 में जुलाई और दिसंबर के बीच कच्चे तेल के मूल्य में 30 डॉलर और 145 डॉलर के मध्य उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया। पिछले कुछ दिनों में तेल की मूल्यवृद्धि की प्रवृत्ति ने इसी के संकेत दिए हैं। ऐसे में, उम्मीद यही है कि अमेरिका अपने विवेक का प्रयोग करेगा और ऐसी कोई परिस्थिति पैदा नहीं होने देगा, जिससे ईरान द्वारा, अंजाम की परवाह किए बिना, लिए गए प्रतिरोधात्मक कदमों के कारण हालात नियंत्रण से बाहर चले जाएं।
पेट्रोलियम उत्पादों के मामले में भारत की स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। हमारी 80 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल की आवश्यकता आयात से पूरी होती है। राजकोषीय घाटा, चालू खाता घाटा, रुपये की कीमत और मूल्य-वृद्धि, सब कच्चे तेल के दाम से प्रभावित होते हैं। हालांकि भारत अभी ऊहापोह की स्थिति में भी है। हमारे लिए ईरान सामरिक महत्व का देश है। दोनों देशों के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक, वाणिज्यिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। पाकिस्तान से गुजरे बिना मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक हमारी पहुंच ईरान द्वारा आसानी से हो सकती है। ईरान में प्राकृतिक गैस प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, जो भारत की बढ़ती हुई गैस की आवश्यकता की पूर्ति के लिए भविष्य में एक महत्वपूर्ण स्रोत हो सकता है। उल्लेखनीय है कि हमारी कुल ऊर्जा खपत का 15 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक गैस का है, और हम एक स्वच्छ और हरित स्रोत से अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए कटिबद्ध हैं। इस लिहाज से नई सरकार को सत्ता संभालने के तत्काल बाद यह तय करना होगा कि ईरान से कच्चे तेल का आयात किस तरह जारी रखा जाए? यह फैसला लेने के लिए सिद्धांत और व्यावहारिकता, दोनों की पड़ताल आवश्यक होगी।
कच्चा तेल विश्व की सर्वाधिक ‘राजनीतिक कमॉडिटी’ है। इसके दाम भू-राजनीति से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। भू-राजनीति के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आर्थिक अस्रों का प्रयोग करना उपयोगी है। अमेरिका ईरान के विरुद्ध इस रास्ते पर चल रहा है। इसका प्रभाव कच्चे तेल के दाम पर सीधे-सीधे पड़ेगा। इसके तात्कालिक तथा दूरगामी परिणाम भारत की अर्थव्यवस्था और सामरिक नीति प्रभावित करेंगे। वर्तमान में लोकसभा चुनावों के शोर में पड़ोस में तेजी से बदलते इस नए घटनाक्रम पर हमारे नीति-नियंताओं को ध्यान देना चाहिए। नई सरकार के लिए तेल के मूल्य और ईरान के साथ रिश्ते एक बड़ी व तात्कालिक चुनौती होगी। देश को अनिश्चितता के दौर से गुजरने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना पड़ेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 16 may