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हमें अपने बूते ही दबाव बनाना होगा

शशांक पूर्व विदेश सचिव

जैसी कि आशंका थी, चीन ने एक बार फिर जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को ‘वैश्विक आतंकी’ घोषित होने से बचा लिया है। चीन ने चौथी बार ऐसा किया है। पुलवामा हमले के बाद जिस तरह से दुनिया के अनेक बडे़ देशों ने भारतीयों के गुस्से और उनकी तकलीफ को साझा किया था; और जिस प्रकार पिछले साल फरवरी में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (आतंकियों की फंडिंग पर नजर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी) की पेरिस बैठक में पाकिस्तान को ‘ग्रे लिस्ट’ में डाला गया था, उनको देखते हुए एक उम्मीद बनी थी कि चीन शायद इस बार कुछ अलग रुख अपनाए। लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस द्वारा मसूद अजहर के खिलाफ सुरक्षा परिषद में पेश प्रस्ताव को उसने बुधवार को फिर वीटो कर दिया।
चीन के ताजा रुख से साफ है कि इस मामले में वह भारत की दलीलों को समझने को तैयार नहीं है। दरअसल, मसूद अजहर जैसे तत्वों से निपटने का उसका अपना ही तरीका है। वह अपने देश में गड़बड़ियां फैलाने वालों को या तो खत्म कर देता है या फिर उन्हें मजबूत सलाखों के पीछे फेंक देता है। लेकिन हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, इसलिए संविधान में मुकर्रर वैधानिक प्रक्रिया अपनाते हैं। हर बड़ी घटना के बाद हम इस्लामाबाद को डोजियर पर डोजियर सौंपते हैं, और वह बराबर यही दोहराता है कि ठोस सुबूत नहीं दिया। ऐसे में, चीन को भला हमारा कानूनी तरीका क्या समझ में आएगा? इस तरह के मामलों को यूएन सुरक्षा परिषद में ले जाने से पूर्व हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आम सहमति पहले बनानी होगी। एक भी सदस्य छूटा, जैसा कि चीन के मामले में है, तो फिर उसका नतीजा यही होगा। फिर चीन और पाकिस्तान के संबंधों के बारे में यह कोई छिपी हुई बात तो है नहीं कि पाकिस्तान ने बलोचिस्तान की काफी जमीन बीजिंग को औने-पौने दाम में बेची है। इसके बदले में जो भी अरबों डॉलर उसे चीन से मिलते हैं, उनमें से फूटी कौड़ी भी स्थानीय बलोचों को नहीं मिलती, वह पूरी रकम पाकिस्तानी फौज और उसकी सरकार के लोगों के बीच बंटती है। जाहिर है, पाकिस्तानी डीप स्टेट के साथ शीर्ष चीनी अधिकारियों के गहरे रिश्ते हैं।  
हमें यह बात अब अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि चीन और हमारा सिस्टम अलग है। हम कानूनी और न्यायिक प्रकिया से चलते हैं और यही सोचते हैं कि जिस तरह से हमारी आंतरिक न्यायिक व्यवस्था है, सुरक्षा परिषद भी वैसी ही अंतरराष्ट्रीय न्यायिक व्यवस्था है, जबकि  वह है नहीं। अपने वीटो से चीन हमको यही समझाने की कोशिश कर रहा है। जब तक यह बात हमें समझ में नहीं आएगी, हम सुरक्षा परिषद में बार-बार जाते रहेंगे और इस बीच मसूद अजहर को वक्त मिलता रहेगा कि वह नई साजिशें रचता रहे और हमारे देश में अपने नापाक इरादों को अंजाम देता रहे। पाकिस्तान तो आतंकियों को शह दे ही रहा है, अब चीन भी प्रकारांतर से यही कर रहा है।
हाल के दिनों में सर्जिकल स्ट्राइक जैसी सीधी और सख्त कार्रवाइयों के जरिये हमने इस्लामाबाद पर कुछ ठोस दबाव बनाया था, लेकिन यूएन में जाने की पुरानी नीति का मोह नहीं त्यागा। ऐसा हम 1947-48 से करते आ रहे हैं कि जब भी वे दबाव में आते हैं, हम यूएन पहुंच जाते हैं। सन् 1947 में भी हम कश्मीर से पाकिस्तानियों को खदेड़ रहे थे, लेकिन फिर हम उसे छोड़ संयुक्त राष्ट्र चले गए कि सुरक्षा परिषद यह विवाद सुलझा देगी। आज फिर वही कर रहे हैं। हम पाकिस्तान को दबाव में लेकर आए थे। फिर अपने रुख में कुछ नरमी लाते हुए यूएन चले गए। ठीक है, युद्ध जैसे संकट को हरसंभव टाला जाना चाहिए, लेकिन हमें अमेरिका और चीन से भी यह आस छोड़नी होगी कि वे इस्लामाबाद पर हमारे लिए एक हद के आगे जाकर दबाव डालेंगे। आखिर अमेरिका और चीन के अपने-अपने हित हैं। पूरी दुनिया जानती है कि अफगानिस्तान में अमेरिका को पाकिस्तानी मदद की कितनी दरकार है? फिर, चीन क्यों चाहेगा कि पाकिस्तान के आतंकी भारत आने की बजाय उसके यहां आ जाएं! यूएन में जाने का एक पहलू यह भी कि इससे पाकिस्तान को अपने मित्रों को जोड़ने और खुद को आंतरिक रूप से मजबूत करने का समय मिल जाता है। 
हमें यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी कि पाकिस्तान की जो कानूनी-न्यायिक व्यवस्था है, उसमें उसे डोजियर सौंपकर हम कानूनी रूप से कोई प्रभावी कामयाबी नहीं हासिल कर सकते। इसी तरह, सुरक्षा परिषद में जो हम हर बार पहुंच जाते हैं, यह प्रयास भी एक सीमा के आगे काम नहीं कर सकता, क्योंकि सुरक्षा परिषद की अलग-अलग शक्तियों के अपने-अपने खेल हैं। हमें विश्व मंचों पर पड़ोसी देश की कारस्तानियों को उजागर करते रहना चाहिए, लेकिन यह अतिरिक्त प्रयास होना चाहिए, मुख्य नहीं। 
एक मसूद अजहर के लिए हम चीन से अपने रिश्ते तोड़ नहीं सकते। आखिर जिस पाकिस्तान में मसूद बैठा है, उससे ही कहां अपने सारे रिश्ते हम तोड़ पाए हैं? पिछले 70 वर्षों से हम पड़ोसी देश की हरकतों से परेशान हैं, लेकिन कूटनीति के अपने तकाजे होते हैं, और इसीलिए हम यह कदम नहीं उठा सके। साफ है, हमें पाकिस्तान प्रायोजित दहशतगर्दी से निपटने के लिए अनेक मोर्चों पर साथ-साथ सक्रिय रहना पड़ेगा। मसूद अजहर पर हम पाकिस्तान के जरिए ही दबाव बना सकते हैं। कोर्ई आतंकवादी संगठन वहां से हमारे यहां आतंकी कार्रवाई के षड्यंत्र कर रहा है, तो हम उस पर काउंटर अटैक करके उसके मनसूबे ध्वस्त कर सकते हैं। जहां तक चीन की बात है, तो उसके साथ हमें अपनी बातचीत जारी रखनी होगी। हमें अपने बूते ही इस्लामाबाद पर दबाव बनाना होगा, इसका कोई विकल्प नहीं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 15 march