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सूखे सावन की आशंकाओं के बीच

अनिल प्रकाश जोशी, पर्यावरणविद्

सावन आने को है, लेकिन उम्मीदों की जमीन सूखी है और आसमान सूना। वैसे तो इस बार शुरुआती दौर से ही मानसून के मिजाज बिगडे़ हुए थे। आषाढ़ का महीना आते-आते जो नदी-नाले भर जाते थे, वे सब के सब सूखे पड़े हैं। मानसून को केरल में जून महीने के शुरू होने के साथ ही दस्तक देनी थी, लेकिन वहीं पर उसने देरी कर दी और उसके बाद अभी तक जो हुआ, उसने निराश ही किया है। वैसे तो अब मानसून के पूरे भारत पर छा जाने के दावे हैं, कुछ जगहों से भारी वर्षा की खबरें भी हैं, लेकिन उत्तर भारत में उसका असर ज्यादातर जगहों पर नहीं दिख रहा। दक्षिण से भी कम वर्षा और सूखे की खबरें ही आ रही हैं। सिर्फ मुंबई ही अपवाद है, जो हर बारिश में हाहाकार करती है। हालात ये हैं कि सरकार ने कहीं-कहीं सूखे से जुड़े हुए निर्देश भी देने शुरू कर दिए हैं। पिछले वर्ष इस समय तक 135़ 65 मिलीमीटर वर्षा हो चुकी थी, लेकिन इस साल जून के अंत तक 86.5 मिलीमीटर ही वर्षा हुई है। कहा जा रहा है कि पिछले 118 वर्षों में इतनी कम बारिश वाला यह चौथा जून था। 
यह सब किस ओर इशारा करता है? मुंबई महानगर में अतिवर्षा और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में वर्षा का अधिक हो जाना या वर्षा में निरंतरता व समानता का न होना यही बताता है कि एक बड़ा पर्यावरणीय असंतुलन हमारे बीच में आ चुका है। यही हाल रहा, तो पानी के उस महासंकट से हम इसी साल जूझ रहे होंगे, जिसे अभी तक अपना भविष्य मान रहे थे। मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि जितनी बारिश हुई है, वह खेती के लिए पर्याप्त नहीं है। यह हालत उत्तर भारत, पश्चिम भारत, मध्य भारत और दक्षिण भारत, सभी जगहों की है। 
दुनिया भर के तमाम अध्ययनों ने पहले ही बता दिया था कि इस साल का जून अभी तक के इतिहास का सबसे गरम महीना रहा है। उसका असर कहीं न कहीं मानसून पर पड़ना ही था और इसलिए इस बार सावन की हरियाली को लेकर तमाम आशंकाएं पैदा होने लगी हैं। कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार,  साल 2019 दुनिया का सबसे गरम वर्ष है। और तो और, इस बार यूरोप के ठंडे माने जाने वाले देश भी गरमी में झुलसते दिख रहे हैं। यह दर्शा रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए प्रतिकूल हालात लेकर हमारे बीच आ चुकी है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इसी वजह से आज हम किसी भी मौसम को सामान्य रूप से नहीं देख पाते। मानसून में वर्षा समय पर नहीं हो रही, जाडे़ में तापमान बहुत नीचे गिर रहा है और गरमी तो खैर सारे रिकॉर्ड ही तोड़ रही है। यह सब लगातार और हर जगह पर हो रहा है। हर बार पिछली बार से ज्यादा परेशान करने वाला। एक तरफ मुंबई पिछले दो हफ्ते से लगातार हो रही बारिश में डूबती-उतराती दिख रही है, तो उसकी तुलना में देश के दूसरे कोने अभी पूरी तरह सूखे हैं। इन दोनों हालात के बीच में सावन के आगमन का कोई खुशनुमा संकेत दिखाई नहीं देता। 
पूरे विश्लेषण के लिए हमें इस बार की बारिश को शुरू से देखना होगा। शुरुआती दौर में जिस तरह मानसून को केरल में समय पर पहुंचना चाहिए था, वहां हवा के दबाव और विक्षोभ के कारण वह उतनी बारिश नहीं कर सका। इसी के साथ जो कुछ अन्य आंकड़े सामने आए हैं, उनके अनुसार देश के 21 शहर डे-जीरो के कगार पर हैं। यानी वहां वह दिन आने वाला है, जब शहर में पीने के पानी की एक बूंद भी उपलब्ध नहीं होगी। दुर्भाग्य यह है कि ये शहर देश के हर कोने में हैं। चाहे मुंबई हो, चेन्नई हो, बेंगलुरु हो, जमशेदपुर हो, धनबाद हो, कानपुर हो, जयपुर हो या फिर गुरुग्राम हो। 
इस पूरे हालात को हम चाहें, तो जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखें या मानसून के आने के वैज्ञानिक कारणों के हिसाब से, दोनों ही नजरिए से एक बात तो साफ है कि वर्षा की बूंदों केजो रास्ते प्रकृति और पर्यावरण ने तय किए थे, हमने एक-एक करके वे सब खत्म कर दिए। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई कभी इस बात के लिए जानी जाती थी कि वहां पर स्थानीय तालाब ही पानी की आपूर्ति करते हैं। लेकिन हमने एक-एक करके वहां तालाबों की बलि चढ़ा दी और जब हम उनसे कट गए, तो उसके बाद कोई ऐसा रास्ता नहीं था, जिससे जब भी वर्षा का पानी गिरे, तो वह हमें सतही पानी को उपलब्ध करा सके। 
दिक्कत यह है कि हमारा विश्वास पानी के वितरण में ज्यादा रहा, उसके संरक्षण पर नहीं। तमिलनाडु में पिछले तीन साल में मानसून में 62 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। जब वर्षा का पानी 62 फीसदी कम रहा हो, उस समय जो भी पानी उपलब्ध हो सकता था, वह जलाशयों के अभाव में सीधे समुद्र का रास्ता ही ढूंंढ़ता रहा। पूरे देश में हालात अभी भले ही चेन्नई जितने बुरे न लग रहे हों, लेकिन ध्यान रहे, मानसून में 21 फीसदी की कमी दर्ज हो चुकी है। और पानी को लेकर हमारा जिस तरह का रवैया है, उसमें यह खतरा बढ़ता जा रहा है कि देश का लगभग हर दूसरा शहर चेन्नई बनने की ओर बढ़ रहा है। बात सिर्फ पेयजल की ही नहीं है, मानसून का न होना खेती-बाड़ी और उद्योग-धंधे, लगभग सभी को प्रभावित करता है। हम बढ़ते तापक्रम को मात्र तापमान के रूप में नहीं देख सकते, बल्कि इसका सीधा और बड़ा असर पानी पर पड़ता है। यह असर अब हर जगह दिख रहा है। सूखे आषाढ़ के बाद सूखे सावन की आशंकाएं गहरा रही हैं। हम अगर अब भी नहीं संभले, तो बहुत देर हो जाएगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 15 june