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मौके की ताक में दक्षिण भारतीय नेता 

दक्षिण एक्सप्रेस एस श्रीनिवासन  वरिष्ठ पत्रकार

साल 2019 का संसदीय चुनाव शायद देश के सबसे मुश्किल चुनावों में से एक है। लेकिन दो खास सियासी बातें इस चुनाव में साफ-साफ उभरती दिख रही हैं- एक, उत्तर व दक्षिण भारत के बीच का राजनीतिक विभाजन और दूसरी, उत्तर भारत के भीतर शहरी व ग्रामीण विभाजन। उत्तर भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अब भी काफी आकर्षण है, मगर दक्षिण भारत का राजनीतिक मिजाज इससे अछूता दिखता है। उत्तर भारत में, खासकर इसके हृदयस्थल उत्तर प्रदेश में शहरी और ग्रामीण इलाकों में अब तक जिस तरह की वोटिंग हुई है, उनमें एक खास अंतर दिखा है।
दक्षिणी राज्यों में तो वैसे भी भाजपा की उपस्थिति काफी कम है। हालांकि पार्टी काफी मशक्कत करती रही है कि वह इन राज्यों में भी अपनी पैठ बना सके, मगर वह इसमें बहुत कामयाब नहीं हो पाई है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में दोनों राष्ट्रीय पार्टियों- भाजपा और कांग्रेस की कोई खास उपस्थिति नहीं है। ऐसे में इनका विश्लेषण करना बेहद आसान हो जाता है। इन दोनों प्रदेशों में चूंकि क्षेत्रीय पार्टियों की मौजूदगी बेहद मजबूत है, इसलिए भाजपा वहां अपना आकर्षण नहीं पैदा कर पा रही। अलबत्ता, कर्नाटक में उसने अपने लिए कुछ रास्ते जरूर बना लिए हैं, मगर उसे जिस रूप में पसंद किया जाता है, वही उसके विस्तार में बाधक भी है। उत्तर और तटीय कर्नाटक में भाजपा का जबर्दस्त प्रभाव है। राज्य के उत्तरी हिस्सों में लिंगायत फैक्टर ने उसकी काफी मदद की है, लेकिन कांग्रेस-जनता दल (एस) गठबंधन सूबे में भाजपा के विस्तार को रोकता दिखता है। विधानसभा में तो भाजपा को पछाड़ने के लिए इन दोनों दलों ने हाथ मिला लिया था, लेकिन अब 2019 का चुनाव परिणाम बताएगा कि इस गठबंधन का गणित जमीनी स्तर पर काम कर रहा है या नहीं।
केरल में अपनी जमीन तैयार करने के लिए भाजपा ने सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इस्तेमाल किया। हालांकि वह फैसला औरतों के हक में है। कांग्रेस पार्टी ने अपने अध्यक्ष राहुल गांधी को वायनाड से उतारने का जो अचानक फैसला किया, वह भाजपा के प्रभाव को कुंद करने के इरादे से ही उठाया गया कदम लगता है। विश्लेषक मानते हैं कि आसपास के तीन संसदीय क्षेत्रों में काफी मतदान हुआ है और यह मंदिर आंदोलन का असर है। अब 23 मई ही बताएगी कि इस मुद्दे पर लोगों ने क्या रुख अपनाया। तमिलनाडु में भाजपा ने एक व्यावहारिक पक्ष लिया और उसने अन्नाद्रमुक के गठबंधन के तहत सिर्फ पांच उम्मीदवार उतारे। यह एक मौन स्वीकार है कि वहां अपनी पकड़ बनाने में वह नाकाम रही है। चूंकि तमिलनाडु विधानसभा की 22 सीटों का उप-चुनाव वहां संसदीय चुनाव के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया है, ऐसे में पूरा फोकस ही उप-चुनावों पर केंद्रित हो गया।         
इसलिए दक्षिणी राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन 2014 से भी कमजोर हो सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में प्रखर-राष्ट्रवाद का मुद्दा खड़ा करने की कोशिश हो या गोरक्षा के बहाने हिंदुत्व का एजेंडा परोसने की, दक्षिण भारत में इन मुद्दों का कहीं कोई असर नहीं दिखता। यहां तक कि छह महीने पहले तमिलनाडु में आरएसएस-भाजपा ने रथयात्रा भी निकाली थी, मगर अयोध्या में राममंदिर के मुद्दे ने भी दक्षिणी राज्यों में कोई प्रभाव नहीं डाला। बल्कि भाजपा के प्रखर-राष्ट्रवाद पर इन राज्यों की भाषाई उप-राष्ट्रीयताएं कहीं ज्यादा भारी पड़ीं। शायद यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी निगाहें उत्तर भारत पर गड़ाईं और वहां उन्होंने रिकॉर्ड नंबर में रैलियां की हैं।
पिछले दिनों लखनऊ से अमेठी-रायबरेली होते हुए वाराणसी तक की एक सड़क यात्रा में मैंने दिलचस्प नतीजे हासिल किए। शहरी इलाकों में भाजपा से ज्यादा नरेंद्र मोदी के लिए लोग सकारात्मक दिखे। लोग प्रधानमंत्री द्वारा पेश किए जा रहे शक्तिशाली राष्ट्रवाद से खुश मिले और उन्हें लगता है कि मोदी देश के अब तक के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री हैं। स्वच्छ भारत अभियान के अलावा इमारतों के निर्माण और सड़कों के विद्युतीकरण, निचले स्तर की नौकरशाही के भ्रष्टाचार में आई कमी ने शहरी मतदाताओं को मोदी के समर्थन में खड़ा किया है। दिल्ली में ओला और उबर के ड्राइवर भाजपा के शासन से ज्यादा खुश मिले, क्योंकि उन्हें ट्रैफिक पुलिस को रिश्वत आदि नहीं देनी पड़ती, जो कि उनके मुताबिक कांग्रेस के शासनकाल में सर्वव्यापी थी। इन ड्राइवरों में से कई उत्तर प्रदेश के गांवों व पिछड़ी जाति के थे, लेकिन उनकी पसंद अब भी मोदी ही हैं। लेकिन छोटे कस्बों और गांवों की भावनाएं बिल्कुल अलग मिलीं। उत्तर प्रदेश में यह संदेश बहुत साफ मिला कि सपा-बसपा एक-दूसरे को अपने वोट ट्रांसफर कर गठबंधन उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित कर रही हैं। उनका जातिगत समीकरण प्रखर राष्ट्रवाद के नारे से मोर्चा ले रहा है।
टीआरएस मुखिया चंद्रशेखर राव और टीडीपी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू जैसे दक्षिण भारतीय नेता राष्ट्रीय गठबंधन खड़ा करने के लिए जो तत्परता दिखा रहे हैं, वह भी उत्तर-दक्षिण राजनीतिक विभाजन का एक संकेतक है। स्थानीय राजनीति की वजह से भी ये दोनों एक-दूसरे से होड़ ले रहे हैं, मगर यह कहानी का सिर्फ एक पहलू हैै। ये दक्षिण भारतीय नेता गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा मोर्चे के नेतृत्व का मौका देख रहे हैं, ताकि वे अपनी घरेलू जमीन को अक्षुण्ण रख पाएं। कुछ दक्षिण भारतीय पार्टियों का जन्म ही कांग्रेस से हुआ है और कई बिंदुओं पर उनका वैचारिक रुझान एक ही है। लेकिन ये पार्टियां भाजपा को एक बड़े खतरे के रूप में देखती हैं। ऐसे में, वे केंद्र में गैर-भाजपा सरकार के गठन के लिए गठबंधन खड़ा करना चाहेंगी।  
ग्रामीण बनाम शहरी विभाजक लाइन उत्तर भारत में पिछड़े बनाम सवर्ण ध्रुवीकरण के रूप में दिख रही है। जहां सवर्ण, (खासकर शहरी भारत के) मोदी के समर्थन में खड़े होते दिख रहे हैं, वहीं पिछड़े (विशेषकर ग्रामीण) जातिवादी धु्रवीकरण के पक्ष में। हालांकि, क्षेत्रीय दलों के गठबंधन की पहल दक्षिण भारतीय नेताओं की तरफ से हो रही है, लेकिन उनकी यह कवायद मानीखेज तभी होगी, जब वे उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से गठबंधन करेंगे, क्योंकि ये सभी दल समान सामाजिक आधार से अपना समर्थन प्राप्त करते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan Column on 14 may