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29 जनवरी, 2020|10:49|IST

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पुलिस सुधार से ही निकलेगी राह

यह क्षण शायद भारतीय पुलिस के सबसे शर्मनाक क्षणों में से एक था, जब देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक जेएनयू में मुंह पर कपड़े लपेटे गुंडे महिला छात्रावासों में तोड़-फोड़ कर रहे थे, अपने विरोधियों के हाथ-पैर तोड़ रहे थे, विश्वविद्यालय की संपत्ति को क्षति पहुंचा रहे थे, और तकनीक इन भयावह दृश्यों को पूरी दुनिया के लिए आंखों-देखा बना रही थी, तब दिल्ली पुलिस के अधिकारी विश्वविद्यालय गेट पर खड़े होकर दलील दे रहे थे कि अंदर घुसकर हिंसा रोकने के लिए उन्हें विश्वविद्यालय अधिकारियों की अनुमति की प्रतीक्षा है। कोई आश्चर्य नहीं कि यह अनुमति तब आई, जब गुंडे अपना काम खत्म कर कैंपस से जा चुके थे।
मैं भी उन असंख्य लोगों में से एक था, जो पूरे घटनाक्रम के दौरान अपने-अपने टीवी स्क्रीन से चिपककर बैठे थे। लोगों की दिलचस्पी के अलग-अलग कारण हो सकते हैं, पर मैं स्तब्ध था पुलिस अधिकारियों की ढिठाई और अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने की व्यग्रता पर। तीन दशकों से अधिक भारतीय पुलिस सेवा का सदस्य और एक केंद्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति रहने के बाद मैं इतना ही कह सकता हूं कि मेरी जानकारी में देश का कोई कानून ऐसा नहीं है, जो पुलिस को किसी शिक्षण संस्थान में प्रवेश करने के पूर्व उसके प्रधान से अनुमति के लिए बाध्य करता हो। जिन परिस्थितियों में 5 जनवरी की शाम पुलिस थी, उनमें उसकी कार्रवाई को लेकर दंड प्रक्रिया संहिता या सीआरपीसी बड़ी स्पष्ट है। पुलिस की आंखों के सामने गैर-कानूनी भीड़ संज्ञेय अपराधों में लिप्त थी और विधायिका द्वारा पारित कानून सीआरपीसी उनसे निर्णायक हस्तक्षेप की अपेक्षा करता था। कोई भी प्रशासनिक आदेश, यदि यह अस्तित्व में हो भी कि पुलिस बिना कुलपति की अनुमति परिसर में नहीं घुसेगी, सीआरपीसी का उल्लंघन नहीं कर सकता।
यह सभ्य समाजों की अलिखित परंपरा तो है कि पुलिस शिक्षण संस्थाओं में बिना अनुमति प्रवेश नहीं करती, पर कहीं भी विधायिका द्वारा पारित कानून से इसे बाध्यकारी नहीं बनाया गया है। अमेरिका और यूरोप में भी, जहां नागरिक समाज हमसे अधिक सक्रिय है, पुलिस शिक्षण संस्थानों में सशस्त्र हस्तक्षेप करती रहती है। फिर 5 जनवरी की देर शाम जेएनयू में जो घट रहा था, वह न तो किसी सभ्य समाज में होता है और न ही भारतीय पुलिस की इस मामले में बहुत गौरवशाली परंपरा रही है। फिर कुछ ही दिनों पहले दिल्ली पुलिस जामिया मिल्लिया इस्लामिया में लाइब्रेरी समेत कैंपस के तमाम हिस्सों में अपनी कार्रवाई के नमूने दिखा चुकी थी। वहां घुसने के लिए तो उसने विश्वविद्यालय अधिकारियों की इजाजत नहीं ली थी और यह शिकायत खुद वहां की कुलपति महोदया ने सार्वजनिक रूप से की है।
अब जब बहुत से स्टिंग-ऑपरेशन सामने आ गए हैं, कई वाट्सएप ग्रुप की सक्रियता का भंडाफोड़ हो चुका है और यह भी सिद्ध हो चुका है कि 5 जनवरी की दोपहर से ही जेएनयू परिसर में लठैत-गुंडों का जमावड़ा हो रहा था और कई जमावड़ों के विजुअल्स में तो उनके करीब कई पुलिसकर्मी भी खडे़ दिख रहे हैं। तब किसी ऐसी पुलिस के लिए आप किस संज्ञा का प्रयोग करेंगे, जो यह जानते हुए भी कि परिसर के अंदर ऐसे संज्ञेय अपराध
हो रहे हैं, जिनमें हस्तक्षेप करना उसका अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य है, फिर भी दलील देती रहे कि वह एक ऐसे आदेश की प्रतीक्षा कर रही है, जिसके पीछे कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह एक मिलीभगत वाली पुलिस थी, जिसके लिए अंग्रेजी का शब्द ‘कांप्लिसिट’ प्रयोग करना ही उपयुक्त होगा।
ऐसा नहीं है कि जेएनयू की हालिया घटना आजाद भारत में पुलिस के दुरुपयोग की पहली घटना है। दुर्भाग्य से सभी सरकारों के मन में पुलिस के दुरुपयोग की ढकी-छिपी इच्छा रही है, पर इस बार फर्क सिर्फ इतना पड़ा कि तकनीक ने महाभारत  के संजय की तरह रणभूमि से सीधे आंखों देखा हाल चिंतित देशवासियों तक पहुंचा दिया था। सारी छीछालेदर के बावजूद दिल्ली पुलिस ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए अपनी गलतियों को छिपाने की दयनीय सी कोशिश की। उसने कुछ चुने हुए विजुअल्स दिखाकर दावा किया कि विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्षा समेत वे सभी छात्र, जिन्हें हम पिटते हुए देख रहे थे, दरअसल खुद ही हमलावर थे। उसने पिछली तारीखों से संबंधित कई एफआईआर भी दर्ज कर डाली, जिनमें फिर उन्हीं छात्रों को दोषी ठहराने की कोशिश की गई, जो पिछले काफी दिनों से विश्वविद्यालय की फीस-वृद्धि के खिलाफ आंदोलनरत थे। इनमें उन छात्रों को बचाने की कोशिशें साफ दिख रही थीं, जो एक खास विचारधारा से जुडे़ थे और अब स्टिंग-ऑपरेशनों से उनकी संलिप्तता काफी हद तक सिद्ध हो चुकी है। इसके बावजूद अगर पुलिस दावा करे कि हाथों में लाठी लिए दौड़ते नकाबपोश पीड़ित थे और टूटे-फूटे अंगों के साथ कैमरे पर आए लड़के-लड़कियां ही हमलावर थे, तो आप कांप्लिसिट के अलावा उसे क्या कहेंगे?
पिछले दिनों सिर्फ दिल्ली नहीं, उत्तर प्रदेश के कई शहरों में भी कांप्लिसिट पुलिस के नमूने देखने को मिले। खासतौर पर लखनऊ में जो कुछ हुआ, उसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं सदफ जफर, एसआर दारापूरी और दीपक कबीर की गलत तरीके से गिरफ्तारियां और फिर हिरासत में उनके साथ दुव्र्यवहार एक ऐसी पुलिस की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करती है, जो अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है। इसी तरह, मुजफ्फरनगर में एक समुदाय विशेष के साथ ज्यादतियां उत्तर प्रदेश पुलिस पर समय-समय          पर लगने वाले सांप्रदायिक आचरण के आरोपों की ही 
पुष्टि करती हैं।
पुलिस व्यवहार के ये सारे विचलन व्यापक पुलिस सुधारों की मांग करते हैं। यह सब अब अपवाद नहीं, बल्कि उसके व्यवहार का सहज स्वाभाविक अंग बन गए हैं। इनसे मुक्त होकर ही लोकतांत्रिक समाज के अनुकूल और कानून-कायदों का सम्मान करने वाली पुलिस मिल सकेगी। मगर क्या हम इसके लिए तैयार हैं? यदि हम सचमुच सभ्य पुलिस चाहते हैं, तो हमें चुनावों में व्यापक पुलिस सुधारों को भी मुद्दा बनाना चाहिए। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 14 january